Chhattisgarh Tarkash 2026: ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला

Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षि़्ात का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Update: 2026-03-29 00:00 GMT

तरकश, 29 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला

रमन सरकार 2.0 के दौरान शराब माफियाओं को झटका देते हुए गवर्नमेंट द्वारा शराब बेचने की नीति बनाई गई थी, उसमें शराब खरीदने-बेचने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी में चीफ सिकरेट्री को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। इसलिए, ताकि कोई गड़बड़ी न हो। बावजूद इसके 3200 करोड़ का घोटाला हो गया। हालांकि, मुख्य सचिव बनते के बाद विकास शील ने स्टेट मार्केटिंग कंपनी की पहली बैठक में ही शराब में ’वन टू का फोर’ के खेल को बंद करने की कवायद शुरू कर दी। उससे पहले शराब कंपनियां दुकानों में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की बजाए अपना ब्रांड रखवा देती थी। इससे लोग पसंदीदा ब्रांड के लिए भटकते रहते थे। स्टेट कंपनी के अफसरों से गठजोड़ कर इस खेल को अंजाम दिया जाता था। मगर आश्चर्य यह है कि बीजेपी की सरकार आने के बाद भी पिछले दो साल से ये खेल बदस्तूर जारी था। बहरहाल, सीएस ने अब ’मनपसंद’ ऐप्प चालू करवा दिया है। अब ऐप्प पर जाकर देखा जा सकता है कि किस शॉप में उनके पसंद का ब्रांड उपलब्ध है और कहां नहीं। दूसरा, अब शराब खरीदने के लिए यूपीआई से पेमेंट करना होगा। यानी नो कैश ट्रांजेक्शन। दरअसल, ईडी इसी खेल की जांच कर रही है...कई अफसर सलाखों के पीछे हैं। खेल था...सरकारी शराब के पैरेलेल प्रायवेट तौर पर शराब बेचकर करोड़ों अंदर करना। यूपीआई से पेमेंट होने पर अब गोलमाल संभव नहीं हो पाएगा। अलबत्ता, सीएस के इस एक्शन से कई शराब कारोबारियों को झटका लगा है। कसमसा तो आबकारी विभाग वाले भी रहे हैं और कुछ बीजेपी के नेता भी, क्योंकि उनके पेट पर चोट पहुंच रही।

सरकार संज्ञान ले

बात निकली चीफ सिकरेट्री के अहम संस्थाओं में चेयरमैन बनाने की तो सीजीएमएससी भी उनमें शामिल था। बता दें, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के दौर में सीजीएमएससी का गठन किया था और उसमें मुख्य सचिव को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। ताकि, नीचे के मुलाजिमों में भय बना रहे। मगर पिछली सरकार में इसे उलट सरगुजा से विधायक डॉ0 प्रीतम राम को ढाई करोड़ लोगों की जान की रक्षा करने वाले सीजीएमएससी का चेयरमैन बना दिया गया। चलिये प्रीतम राम तो पेशे से चिकित्सक थे, उन्हें दवा, मशीन के बारे में कुछ तो जानकारियां रही होगी। बीजेपी शासनकाल में दीपक महस्के को इस निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है, बीजेपी का आईटी सेल देखने वाले महस्के को मेडिकल लाइन का एबीसीडी का ज्ञान नहीं होगा। और जब डॉक्टर के चेयरमैन होने के बाद सीजीएमएससी में 400 करोड़ का रीएजेंट घोटाला हो गया...आधा दर्जन अफसर और सप्लायर जेल में हैं और आधा दर्जन कभी भी भीतर जा सकते हैं तो फिर इस समय क्या होगा, भगवान ही मालिक है।

वीआईपी एमडी

ऐसा जलवा तो निगम, बोर्डों में पोस्टेड आईएएस एमडी भी नहीं काटते होंगे, जैसा बिजली कंपनी के एक प्रबंध निदेशक काट रहे हैं। उनके काफिले में एक पायलट गाड़ी चलती है। उसमें बिजली कंपनी का खाकी वर्दी वाला सिक्यूरिटी अफसर चलता है। सिक्यूरिटी अफसर को इतना अपटूडेट रखा जाता है कि सड़क पर लोग भ्रम खा जाए कि छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स का कोई रंगरूट होगा। एमडी इतने शौकीन हैं कि उन्हें कलम भी सरकारी पैसे का चाहिए...वो भी हल्का-फुल्का नहीं...हाल में उन्होंने 5000 का पेन खरीदवाया है। रही बात, पायलेटिंग की तो छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की भी पायलेटिंग नहीं होती। सूबे में अब तक किसी डीजीपी की अगर पायलेटिंग हुई है तो वे थे विश्वरंजन। विश्वरंजन का पिछले हफ्ते ही स्वर्गवास हुआ है। दिल्ली आईबी से लौटे विश्वरंजन का रसूख भी ऐसा था कि उनका एक बार चलता था। मगर इंजीनियर से प्रमोट होकर एमडी बने अफसर अगर पायलेटिंग करवा रहा तो समझा जा सकता है छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है।

सीएस, डीजीपी का प्रोटोकॉल

बात चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की पायलेटिंग की आई तो ये दोनों कार्यपालिका और सिक्योरिटी के सुप्रीम पद हैं। इनके सिकरेट्री प्रोटोकॉल में भी पायलेटिंग और फॉलोगार्ड आता है। सीएस को वाय और डीजीपी को जेड केटेगरी की सुरक्षा होनी चाहिए। मगर फोकस में आने से बचने के लिए छत्तीसगढ़ में सीएस और डीजीपी इसका इस्तेमाल नहीं करते। मगर कायदे से दोनों को अपने पद के औरा का खयाल रखना चाहिए। ठीक है, सरकारी मुलाजिम लोक सेवक होता है मगर पद के अनुरूप उसका तामझाम और सिक्योरिटी होनी चाहिए। वरना, कलेक्टर और सीएस तथा एसपी और डीजीपी में क्या फर्क रहेगा।

100 अटेंडेंस

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में एक जनवरी से बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू किया गया, उस टाईम एकमात्र अफसर टाईम से आ रहे थे। याने दिसंबर का फिगर सिर्फ एक रहा। इसके बाद जनवरी में 10 बजे तक मंत्रालय पहुंचने वालों की संख्या 18 हुई और फरवरी में 100 । मार्च में लगभग दुगुना होने का अंदेशा हैं। जीएडी का प्रयास है कि इसके बाद इसे पब्लिक के लिए ओपन कर दिया जाए। याने कोई भी सरकार के वेबसाइट पर जाकर देख सकेगा कि कितने अफसर कितने बजे तक ऑफिस आते हैं और शाम को कितने बजे जाते हैं। हालांकि, इसमें अफसरों का नाम नहीं रहेगा, संख्या रहेगी।

ई-ऑफिस के फायदे?

अब इसे ई-ऑफिस में फंसना कहें कि टेक्नालॉजी का फायदा, विभिन्न राज्यों में चुनाव कराने गए कई आईएएस अफसर रायपुर में न रहने के बाद भी ई-ऑफिस पर फाइलें क्लियर कर रहे। यदि ऐसा रहा तो सरकार को लिंक अफसर बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अफसरों के अवकाश में रहने के बाद भी महत्वपूर्ण फाइलों के लिए लिंक अफसर नियुक्त किए जाते हैं। चीफ सिकरेट्री को इसकी रिपोर्ट मांगनी चाहिए कि चुनाव ड्यूटी में रहने के बाद भी कितने अफसरों ने ई-ऑफिस से सरकारी काम भी करते रहे...उन्हें सम्मानित करना चाहिए।

पोस्टिंग में सियासत?

प्रदेश के दूसरे बड़े शहर मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व के मामले में दुर्भाग्यशाली तो है ही अफसरों की पोस्टिंग के मामले में इस शहर के साथ दोयम व्यवहार किया जा रहा है। बिलासपुर नगर निगम में अजीत जोगी सरकार के समय से डायरेक्ट आईएएस कमिश्नर रहे। कभी-कभार राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर आयुक्त बने भी तो वे पारफर्मेंस वाले रहे। मगर अभी जो पोस्टिंग हुई है, उसके बाद स्थिति यह है कि एक सड़क को पीडब्लूडी ने ठेका दे दिया और उसी ठेकेदार को नगर निगम ने भी ठेका दे डाला। निगम के अफसरों का खेल ये था कि पीडब्लूडी सड़क बनवाएं और निगम से भी उसका बिल पास कर करोड़ों रुपए अंदर कर लिया जाए। मगर उससे पहले खेल का भंडाफोड़ हो गया। हो सकता है, इसमें दोष निगम कमिश्नर का न हो। काफी लो प्रोफाइल के वे सीधे-साधे अफसर हैं। तभी तो स्मार्ट सिटी के मद से 16 करोड़ में बनवाए गए मल्टीलेवल पार्किंग में एक आटो डील वाले ने कब्जा कर लिया है। पार्किंग के एक फ्लोर पर डीलर ने 500 मोटरसायकिलें लाकर खड़ी कर दी। वो भी निगम मुख्यालय के ठीक सामने स्थित पार्किंग में। इससे समझा जा सकता है, नगर निगम में क्या चल रहा होगा। बहरहाल, बात पोस्टिंग में सियासत की तो जिस एसडीएम को एसीबी छापे के बाद हटा कर बस्तर भेजा गया, आश्चर्यजनक तौर से उसकी पोस्टिंग फिर बिलासपुर कर दी गई। सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो कम-से-कम बीजेपी को देखना चाहिए। अभी तो जांजगीर गड्ढा हुआ है, कोई भरोसा नहीं कि 2028 के इलेक्शन में बिलासपुर जिला भी बड़ा गड्ढा बन जाए। कलेक्टर संजय अग्रवाल को टीम अच्छी नहीं मिलेगी तो वे अकेले क्या कर लेंगे। वैसे भी किसी जमाने में अविभाजित बिलासपुर जिले की 19 की 19 सीटें कांग्रेस की झोली में जाती थी।

मूंछ और चोटी वाले अफसर

नाम जरूर हायर है मगर इस विभाग में आमतौर पर हायर प्रोफाइल वाले अफसर कभी रहे नहीं और कोई जाना भी नहीं चाहता। बात हायर एजुकेशन की हो रही है। सरकार ने इस विभाग में अभिनंदन स्टाईल वाले मूंछेले अफसर और चोटी वाले आईएएस को बिठाया है। और इस समय विभाग का हाल ये है कि सालों से अटके सलेक्शन, पोस्टिंग और सस्पेंशन धड़ाधड़ हो रहे हैं। इससे पहले कभी कालेजों के प्रोफेसरों को निलंबित होते नहीं देखा गया। लेकिन पिछले छह महीने में कई प्रिंसिपल और असिस्टेंट प्रोफेसर निलंबित हो गए हैं। ऐसा तो नहीं...मूंछ और चोटी रखने से एक्स्ट्रा एनर्जी मिल जाती है?

कमजोर कलेक्टर-1

छत्तीसगढ़ ने कभी उदय वर्मा, प्रशांत मेहता, शैलेंद्र सिंह, नजीब जंग, सुनिल कुमार, अजय नाथ, देवराज बिरदी, विवेक ढांड, एमके राउत जैसे दमदार कलेक्टरों को देखा है। मगर अब आलम यह है कि 33 में से 25 से अधिक 'पठरू' कलेक्टर हैं। दरअसल, कलेक्टरों में दमदारी दिख नहीं रही। छोटे-मोटे लॉ एंड आर्डर होने पर वे मुख्य सचिव और सीएम सचिवालय की ओर देखने लगते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के कलेक्टरों की बात करें, तो सुबोध सिंह रायपुर और बिलासपुर में किसी से मिलने से कतराते नहीं थे। दलित समाज के एक बड़े धर्मगुरू अक्सर उनके चेंबर में बैठे पाए जाते थे। इन्हीं संपर्को के जरिये उन्होंने गिरौदपुरी और बिल्हा की कई हिंसक घटनाओं पर काबू पाने में कामयाबी पाई। तो रायपुर में एक व्यापारी समुदाय के युवक की मौत के बाद मामला काफी बिगड़ गया था। भगत सिंह चौक पर लाश लेकर समाज के लोग बैठ गए थे। सुबोध सिंह बिना घबराये मौके पर पहुंच गए थे। अब तो हालत यह है कि कलेक्टर की तो दूर की बात एसपी, आईजी बिना फॉलोगार्ड लेकर मौके पर नहीं पहुंचते। कलेक्टर तो कोई घटना होती है तो बंगले में दुबक जाते हैं। बलौदा बाजार में जैसे ही हिंसा शुरू हुई, कलेक्टर शहर से बाहर चले गए थे।

कमजोर कलेक्टर-2

सरकार और जीएडी सिकेट्री रजत कुमार को कलेक्टरों की कमजोरी का कोई सौल्यूशन निकालना चाहिए। रजत खुद भी दमदार रहे हैं...कोरबा के लोगों ने देखा भी है। दरअसल, दिक्कत वहां से शुरू हुई, जब राज्य बनने के बाद आईएएस अधिकारियों को बिना एडीएम बनाए कलेक्टर बनाया जाने लगा। एक तो इस समय छत्तीसगढ़ में सबसे कम समय सिर्फ छह साल में कलेक्टरी मिल जा रही। उसमें एसडीएम की एक पोस्टिंग, उसके बाद जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर और उसके बाद फिर सीधे जिले में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। इससे प्रशासन की बारीकियों से वे अनभिज्ञ रह जा रहे। चीफ सिकेट्री को पता होगा, मध्यप्रदेश के दौर में कलेक्टर बनने से पहले एडीएम बनना अनिवार्य था, फिर उस समय डीआरडीए का सीईओ, तब जाकर कलेक्टरी मिलती थी। एडीएम कलेक्टर और एसडीएम के बीच की कड़ी होते थे। हर धरना, प्रदर्शनों पर एडीएम को भेजा जाता था तो ज्ञापन भी एडीएम लेते थे। उससे कलेक्टरों को जिले के लिए प्लानिंग करने का टाईम मिलता था और एडीएम को एडमिनिस्ट्रेशन का अनुभव। एडीएम बनने का मतलब था कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही दलों के नेताओं से बढ़ियां कनेक्शन बन जाना। कलेक्टर या उसके उपर की पोस्टिंगों में ये चीजें बडे काम आती थी। मगर अब तो ये हाल है कि अधिकांश कलेक्टरों को नेताओं या आम आदमी से कोई वास्ता नहीं रह गया है। सरकारें बदलती है, जनदर्शन लगाने का आदेश जारी करती हैं और फिर वह कूडे़दान में चला जाता है।

कलेक्टर-एसपी भाई-भाई

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद तत्कालीन जीएडी सिकेट्री मुकेश बंसल ने फर्स्ट व्हाट्सएप कलेक्टर-एसपी के पारफर्मेंस और ट्यूनिंग को लेकर किया था। मगर वो बेमतलब निकला। अधिकांश जिलों के कलेक्टर-एसपी एक सूत्रीय एजेंडा में डटे हुए हैं। रही बात जनदर्शन की तो ऐसे जिले उंगलियों पर गिने जाने वाले होंगे। वैसे, वर्तमान दौर में जनदर्शन का कोई औचित्य नहीं भी नहीं रह गया है। इससे पब्लिक में नाराजगी और बढ़ती है। रमन सिंह के दौर तक अफसरशाही पटरी पर थी। मगर अब सब डिरेल्ड है। आखिर, पटवारी, आरआई और तहसीलदार, एसडीएम से जब न्याय नहीं मिलता तो आम आदमी कलेक्टर के पास पहुंचता है और कलेक्टर साब लोग समस्या ठीक से सुने बिना....नीचे रीडर को मार्क कर देते हैं। रीडर आवेदन को फिर उन्हीं खटराल तहसीलदार, एसडीएम के पास भेज देते हैं जांच के लिए, जहां से आदमी पहले ही आजिज आ चुका होता है। यही हाल कप्तान साब लोगों का है। एसपी से थाना या सीएसपी की शिकायत लेकर जाओ तो कलेक्टर जैसे ही नीचे मार्क कर देते हैं। ऐसे में आम आदमी को टाईम और पैसा खर्च होने के अलावा कुछ हासिल होता नहीं। फिर चुनाव आता है तो लोग सबक सिखाते हैं। जैसे कांग्रेस गवर्नमेंट में हुआ। उस समय विडबंना ये थी कि मुख्यमंत्री तेज-तर्रार थे मगर किन्हीं कारणों से प्रशासनिक सिस्टम निरंकुश हो गया था। उसकी कीमत कांग्रेस सरकार को चुकानी पड़ी।

सीएस का तीर?

कैबिनेट की बैठकों में अफसरों की बढ़ती भीड़ पर सख्ती दिखाते हुए चीफ सिकरेट्री ने इस पर अंकुश लगाने सचिवों को कड़ा पत्र लिखा है। भीड़ बढ़ने की एक बड़ी वजह सचिवों का सब्जेक्ट की स्टडी न होना भी है। अधिकांश सिकेट्री विभागों के कामकाज पर पकड़ नहीं रखते। इसलिए अपने डायरेक्टर, एमडी को तो बुलाते ही हैं, विभाग के सौ ताले की एक चाबी या श्रमजीवी मुलाजिम को कैबिनेट की बैठकों में बुला लेते हैं, ताकि चर्चा के दौरान कहीं गाडी अटकी तो तुरंत उनसे पूछ जवाब दे सकें। बहरहाल, सीएस के लेटर रुपी तीर ने कई और लोगों को जख्मी किया है, जो बिना काम कैबिनेट में घूस आते थे।

गॉड गिफ्टेड

विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह कोयंबटूर में इलाज कर रायपुर लौट आए हैं, और अब बिल्कुल स्वस्थ हैं। इसमें खबर ये है कि उनके आए लगभग पखवाड़ा गुजर चुका है, बावजूद उनसे मिल कुशल क्षेम पूछने वालों का तांता लगा है। कह सकते हैं...मुख्यमंत्री पद से हटे सात साल गुजर जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कम नहीं हुआ तो इसमें कुछ उपर वाले का भी हाथ है। 2018 में विधानसभा चुनाव बुरी कदर हारने के बाद लोगों ने अफसरशाही पर ठीकरा फोड़ा...मंत्रियों की अहंकार को कोसा...मगर रमन को एक शब्द नहीं। इसका निहितार्थ यह कि सूबे की राजनीति में रमन का रुतबा कायम है। ऐसा सम्मान छत्तीसगढ़ के किसी और नेता को नहीं मिला।

अंत में दो सवाल आपसे

1. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पत्नियां आजकल बिलासपुर की पोस्टिंग से क्यों घबरा रही हैं?

2. खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के 33 में से किन पांच कलेक्टरों को लंगोट का ढीला बताया गया है?

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