Chhattisgarh tarkash: पुलिस में मेजर सर्जरी

Chhattisgarh Tarkash: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय दीक्षित का लगातार 15 साल से प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

Update: 2024-01-07 01:36 GMT

Chhattisgarh tarkash: तरकश, 7 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

पुलिस में मेजर सर्जरी

विष्णुदेव सरकार की पहली प्रशासनिक सर्जरी की सूबे में बड़ी चर्चा है। सरकार ने सिंगल लिस्ट में 88 अफसरों को बदल डाला। मगर सीएम साहब...इससे भी खराब हालत पोलिसिंग की है। बिहार, यूपी की तरह आए दिन गोलियां चल रही, चाकूबाजी आम हो गई है। प्रदेश की गलियों में नशे की सामग्री धड़ल्ले से बिक रही। राजधानी रायपुर में नशे की हालत में एक युवती ने चाकू से गोदकर युवक की हत्या कर दी। दरअसल, छत्तीसगढ़ में वर्दी का खौफ अब पुरानी बात हो गई। हो भी क्यों न...जिनके उपर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है, वे अपराधियों और भूमाफियाओं से गलबहिया कर धन-व्यवस्था में लग गए हैं...पुलिस के सिस्टम में अब भूमिकाएं बदल गई हैं...एसपी वसूली अधिकारी हो गए हैं और दरोगा वसूली एजेंट। पहले के जमाने में एसपी का औरा ऐसा होता था कि उसके सामने जाने के नाम से दरोगा की कंपकंपी छुटने लगती थी। किन्तु एसपी जब दरोगा से महीना लेने लगे तो फिर वो एसपी का क्या लिहाज करेगा। सूबा में कुछ ऐसे एसपी भी हैं, जो अपने खास टीआई के साथ रोज शाम को महफिले जमाते हैं। पहले एसपी लोग टीआई से ट्रेन या फ्लाइट की टिकिट, मोबाइल, बच्चों के लिए गिफ्ट जैसी चीजें मंगवा लेते थे। और अब...? सब तो नहीं... अधिकांश एसपी ज्वाईन करते ही दरोगा को बुलाकर थाने का एमाउंट फिक्स कर दे रहे। ऐसे में, सीएम साहब पोलिसिंग में आमूल चूल बदलाव कर कौंवा टांगने जैसा कुछ कीजिए, ताकि वर्दी पर आम आदमी का भरोसा बहाल हो सके।

सीएम साब ये भी...

सीएम विष्णुदेव साय के खिलाफ विधानसभा चुनाव के दौरान कुनकुरी थाना ने अपराध दर्ज करने में कोई देरी नहीं की। सीएम साब...इसका मतलब ये नहीं कि छत्तीसगढ़ की पुलिस एफआईआर दर्ज करने में बड़ी मुस्तैद है। उस समय की बात अलग रही, सो पुलिस अपना नंबर बढ़ाने के चक्कर में गच्चा खा गई। खैर बात बेहद अहम, आपके संज्ञान लेने लायक। आमतौर पर पुलिस सिर्फ इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं करती कि उनके जिले का आंकड़ा बढ़ जाएगा। इसका नुकसान यह होता है कि छोटे-मोटे अपराध करते-करते अपराधियों का हौसला बढ़ जाता है और फिर बाद में वे बड़े क्राईम करने लगते हैं। दिल्ली पुलिस के एक सीनियर आईपीएस अफसर का कहना है, हर मामले में अपराध दर्ज होने लगे तो उसे झक मारकर कार्रवाई करनी पड़ेगी और कार्रवाई होगी तो अपराधियों का हौसला टूटेगा। सो, सीएम साहब आपकी सरकार नई है। आप कड़ाई से एफआईआर करने का निर्देश दीजिए...यह छूट देते हुए कि दो-एक साल आकंड़े बढ़ता है, तो बढ़ने दें मगर किसी भी केस में ढिलाई न करें, भले ही वह मोबाइल और पर्स लूट का ही क्यों न हो। मगर बात फिर वहीं...यह संभव तभी है, जब एकाध कौंवा मारकर....।

सिकरेट्री की फौज

2008 बैच के आईएएस अधिकारियों के स्पेशल सिकरेट्री से सिकरेट्री प्रमोशन के बाद छत्तीसगढ़ में सचिवों की अब फौज खड़ी हो गई है। 1999 बैच के सोनमणि बोरा प्रमुख सचिव प्रमोट हुए हैं। उनके बाद 2000 से लेकर 2008 बैच तक कुल 48 सिकरेट्री इस समय छत्तीसगढ़ में हैं। इनमें से आठ डेपुटेशन पर। फिर भी 40 का फिगर बड़ा होता है। वो भी उस छत्तीसगढ़ जैसे स्टेट में, जहां एक दशक पहले तक सिकरेट्री लेवल पर बड़ा टोटा था। खासकर रमन सिंह की तीसरी पारी के दौरान सचिवों की कमी की वजह से स्पेशल सिकरेट्री को कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व सौंपा पड़ा था। हालांकि, प्रमुख सचिव इस समय सिर्फ एक हैं...निहारिका बारिक। मनोज पिंगुआ एक समय तक अकेले पीएस थे, वे भी इस महीने एसीएस हो गए। प्रमुख सचिव की कमी अभी चार-पांच साल बनी रहेगी। जब तक 2005 बैच का पीएस में प्रमोशन नहीं हो जाता, जो कि 2030 से पहले संभव नहीं।

आईजी भी अब पर्याप्त

जो स्थिति आईएएस में सिकरेट्री की रही, कमोवेश वही हालत आईपीएस में आईजी की थी। एक समय तो पांच रेंज के लिए मुश्किल से पांच आईजी होते थे। उस समय के आईजी का बड़ा जलवा होता था क्योंकि सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था। यही वजह है कि लांग कुमेर जैसे आईजी कई साल बस्तर में रह गए। बहरहाल, इस समय आईजी की संख्या नौ हो गई है। अमरेश मिश्रा और धु्रव गुप्ता डेपुटेशन पर हैं। वरना, 13। उपर से 2006 बैच क डीआईजी मयंक श्रीवास्तव और आरएन दास का इसी महीने प्रमोशन होना है। उनके बाद यह संख्या दो और बढ़ जाएगी। हालांकि, मयंक अब जनसंपर्क आयुक्त बन गए हैं। फिर भी संख्या एक दर्जन रहेगी ही।

बिना नाम के बधाई

प्रशासनिक फेरबदल में अगर पोस्टिंग अच्छी मिली हो तो अफसरों को खूब बधाइयां मिलती है। मगर इस दफा विष्णुदेव सरकार ने जब 89 अधिकारियों की लिस्ट निकाली तो उसमें दो कलेक्टरों का नाम नहीं था, उसके बाद भी उन्हें बधाइयों की झड़ी लग गई। कलेक्टर हैं बिलासपुर के अवनीश शरण और रायगढ़ के कार्तिकेय गोयल। दोनों 2009 और 2010 बैच के आईएएस हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान इन दोनों को आयोग ने वहां पोस्ट किया था। बधाई इसलिए इन्हें मिल रही थी कि चुनाव आयोग ने टेंपोरेरी पोस्टिंग की थी। आमतौर पर चुनाव के बाद सरकार फिर नए सिरे से लिस्ट निकालती है। मगर राज्य सरकार ने इन दोनों कलेक्टरों को कंटीन्यू करने का निर्णय लिया। लिहाजा, लिस्ट में उनका नाम होने का सवाल पैदा नहीं होता। लोगों की बधाइयों पर ये दोनों अफसर इस बात को लेकर चुटकी लेते रहे कि लिस्ट में बिना नाम के फिर बधाई क्यों...?

पोस्टिंग की मंडी

89 अफसरों की प्रशासनिक सर्जरी को भले ही एक युवा आईएएस और एक युवा मंत्री ने अंतिम रुप दिया मगर सब कुछ सीएम की नोटिस में रहा। बताते हैं, लिस्ट निकलने में विलंब इसलिए हुआ कि मुख्यमंत्री अफसरों के बारे में कंप्लीट फीडबैक ले रहे थे। एक-एक अफसर के बारे में उन्होंने तीन-तीन, चार-चार लोगों से क्रॉस चेक किया। जनसंपर्क आयुक्त के लिए मयंक श्रीवास्तव और कोरबा कलेक्टर सौरभ कुमार का नाम था। मगर मुख्यमंत्री ने मयंक के नाम पर मुहर लगा दिया। और नया रायपुर चूकि सरकार का प्राइम प्रोजेक्ट है, उसमें सौरभ कुमार को बिठा दिया। सरकार से जुड़े अफसरों का कहना है, पोस्टिंग के लिए एक लाईन का फार्मूला तय किया गया था...पिछली सरकार से जुडे़ अधिकारियों को कुछ दिन के लिए सही...किनारे कर ब्यूरोक्रेसी को संदेश दिया जाए कि अब पोस्टिंग की मंडी नहीं चलने वाली।

मंडल, कल्लूरी और राजू

सुनामी में कई अच्छे और मजबूत घर भी बिखर जाते हैं। उसी तरह 88 आईएएस के प्रशासनिक फेरबदल में ऐसा नहीं कि सभी नॉन पारफर्मिंग अफसरों को ही किनारे किया गया है। ऐसा पहले भी होता रहा है। आरपी मंडल, एसआरपी कल्लूरी और डॉ0 एसके राजू इसके सबसे बढ़ियां उदाहरण हैं। ये तीनों अफसर अजीत जोगी सरकार में बेहद पावरफुल थे, सीएम के करीबी भी। 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान इलेक्शन कमीशन ने इन तीनों की छुट्टी कर दी थी। तब समझा गया कि पांच साल के लिए ये गए। सरकार बनने के बाद मंडल को राजस्व सिकरेट्री बनाया गया, कल्लूरी को बिना विभाग पीएचक्य और राजू को हेल्थ में डिप्टी सिकरेट्री। मंडल और कल्लूरी बिलासपुर के कलेक्टर, एसपी थे और राजू सरगुजा जैसे जिले के कलेक्टर, जब सूरजपुर, बलरामपुर जिला नहीं बना था। आपको जानकर हैरत होगी कि मंडल छह महीने के भीतर सिकरेट्री से रायपुर के कलेक्टर हो गए। कल्लूरी को भले ही बलरामपुर जैसे पुलिस जिले का एसपी बनाया गया मगर वहां उन्होंने नक्सलियों का ऐसा पांव उखाड़ा कि ईनाम स्वरूप उन्हें बस्तर का आईजी बना गया। राजू को साल भर के भीतर पहले कांकेर का कलेक्टर और उसके बाद रायगढ़ की कमान सौंपी गई। यही नहीं, राजू यहां से डेपुटेशन पर गए तो पंजाब में उन्होंन न केवल तीन जिले की कलेक्टरी की बल्कि वहां मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रहते पंजाब का चुनाव भी कराया। याने जिस अफसर को चुनाव आयोग ने हटाया, उससे पंजाब का चुनाव कराया। कहने का मतलब कि प्रशासन में कोई चीजे स्थायी नहीं होती। सभी जानते हैं कि जिसका झंडा होता है, उसके अफसर होते हैं। कुछ ब्यूरोक्रेट्स चूक यही करते हैं कि वे सत्ता के पार्ट बन जाते हैं...लिमिट से ज्यादा सरेंडर हो जाते हैं। फिलवक्त, संकेत ऐसे हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद रिजल्ट देने वाले अफसरों की मुख्य धारा में वापसी की जाएगी। क्योंकि, सरकार को आखिरकार रिजल्ट चाहिए। ऐसा पिछली सरकार में भी हुआ था...शुरूआत में सारे डिफेक्टेड आईएएस रमन सरकार को कोस कर बढ़ियां पोस्टिंग पा लिए थे। बाद में इनमें से कुछ को किनारे किया गया, कुछ अपनी बाजीगरी से बच गए।

भाई का बंगला

वित्त और आवास पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी को राजधानी के शंकर नगर स्थित बी5 बंगला मिला है। यह बंगला इसलिए खास है कि पांच बरस पहले तक यह चीफ सिकरेट्री का ईयर मार्क बंगला रहा। पी जाय उम्मेन से लेकर सुनील कुमार, विवेक ढांड और अजय सिंंह तक इस बंगले में रहे। 2018 में जब सरकार बदली तो ब्यूरोक्रेसी को हतप्रभ करते हुए ईयर मार्क बंगले को मंत्री जय सिंह अग्रवाल को आबंटित कर दिया गया। उस बंगले के गेट पर मंत्री का नाम देख वहां से गुजरने वाले नौकरशाहों की आत्मा कलप उठती थी। क्योंकि, चीफ सिकरेट्री सिर्फ प्रशासनिक मुखिया नहीं होता बल्कि एक संस्था होता है...ब्यूरोक्रेट्स का गुरूर। अब किसी का गुरूर छीन जाए तो आप समझ सकते हैं। चलिये, ओपी के इस बंगले में जाने से नौकरशाहों का कलेजा ठंडा हुआ होगा। क्योंकि, भाई ही रहेगा अब इस बंगले में...भले ही वह मंत्री क्यों न बन गया हो। लास्ट में, ओपी को सुझाव...ठीक-ठाक पंडित को बुलाकर बंगले की पूजा-पाठ करवा लें...क्योंकि भांति-भांति की शख्सियतें वहां रही हैं...उनके कुछ अनोखे, शौकीन मिजाज के पूर्वज भी।

कैडर का मान

छत्तीसगढ़ कैडर के 1994 बैच के आईएएस विकास शील एशियाई बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाए गए हैं। ब्यूरोक्रेसी में ये बड़ी अहम पोस्टिंग मानी जाती है। वो भी तब, जब उन्होंने इस पद के लिए अप्लाई भी नहीं किया था और उन्हें सलेक्ट कर लिया गया। फिलिपिंस की राजधानी मनीला में एशिआई बैंक का हेडक्वार्टर है। ईडी का वेतन सुनकर भी आप चौंक जाएंगे। विकास शील एसीएस रैंक से करीब छह गुना। महीने का 15 लाख के लगभग। ईडी, आईटी और जेल के झंझावत से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के आईएएस कैडर का इस पोस्टिंग से मान बढ़ा है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पीएससी के किस रिटायर पदाधिकारी के साढ़ू भाई ने डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी के सलेक्शन में कैशियर की भूमिका निभाई?

2. लोकसभा चुनाव से पहले लाल बत्ती बांटने की बातें क्यों उड़ाई जा रही है?

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