Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ में उपचुनाव
Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।
तरकश, 15 फरवरी 2026
संजय के. दीक्षित
छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-1
चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 37 सीटों के लिए चुनाव का ऐलान किया है, उनमें छत्तीसगढ़ की दो सीटें भी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कोटे से राज्यसभा में गए केटीएस तुलसी और फूलोदेवी नेताम की सीटें अप्रैल में खाली हो रही हैं। चूकि विधानसभा में बीजेपी के अब 54 विधायक हैं, इसलिए इस बार पार्टी को एक सीट मिलना निश्चित है। बची एक सीट कांग्रेस की झोली में जाएगी। कांग्रेस से अबकी नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की दावेदारी की बड़ी चर्चा है। महंत विधानसभा से लेकर लोकसभा के लिए कई-कई बार चुने जा चुके हैं। कई मौकों पर उन्होंने राज्यसभा में जाने की इच्छा प्रगट भी की है। वैसे भी महंत जी किस्मत के बड़े धनी हैं...पद उनके पास खुद से चलकर आते हैं। इसलिए, इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि पाटीं कहीं उनकी अधूरी इच्छा इस बार पूरी न कर दें। महंतजी अभी 73 के हैं, राज्यसभा में जाने के बाद लगभग 80 साल तक दिल्ली में रहने का सम्मानजनक इंतजाम हो जाएगा। वैसे हर बड़े राजनीतिज्ञों की तरह महंतजी का भी अपना एक सपना है...उनके ठीकठाक रहते सियासत में उनके सूरज का उदय हो जाए। और इसके लिए राज्यसभा चुनाव से बढ़ियां मौका क्या हो सकता है...जांजगीर, सक्ती में इस समय सारे विधायक कांग्रेस के हैं...फिर बात बेटे की, तो महंतजी की पकड़ सभी पार्टियों में है...बेटे की नैया पार करा ही लेंगे। अगर ऐसा हुआ तो आजादी के बाद देश की सियासत में एक नया रिकार्ड बनेगा। एक परिवार के पति राज्यसभा, पत्नी लोकसभा और बेटा विधानसभा में।
छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-2
राज्यसभा के लिए टीएस सिंहदेव भी कांग्रेस से स्वाभाविक दावेदार होंगे। गांधी परिवार से नजदीकियों के बाद भी उनकी किस्मत बार-बार दगा दे जा रही। न वे मुख्यमंत्री बन पाए और न ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनने दिया जा रहा। दूसरा, अगर पीसीसी चीफ बदलना होगा तो राज्यसभा के लिए दीपक बैज की दावेदारी प्रबल हो जाएगी। तीसरा नाम भूपेश बघेल का है। वैसे, भूपेश का चांस कम प्रतीत होता है। भूपेश जननेता हैं...कांग्रेस पंजाब से लेकर असम तक उनका उपयोग कर रही है। मगर राजनीत में कब, क्या हो जाए कौन जानता है। भूपेश अगर राज्यसभा गए तो फिर पाटन से उनके बेटे चैतन्य की विधायकी तय हो जाएगी। याने पाटन में उपचुनाव होगा।
बीजेपी और सरप्राइज
राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से चरणदास महंत की दावेदारी हो या फिर फूलोदेवी नेताम को रिपीट करने की...कम-से-कम अटकलें तो लगाने की गुजाइश है। सत्ताधारी पार्टी की बात जुदा है। बीजेपी में आजकल इस कदर चौंकाने वाले फैसले हो रहे कि बड़े-से-बड़े लीडरों को कुछ पता नहीं होता। पिछली बार का राज्यसभा का वाकया याद ही होगा। बीजेपी के लोगों को नहीं पता था कि देवेंद्र प्रताप सिंह हैं कौन? उनका नाम इतना अनजान था कि सोशल मीडिया में यूपी के देवेंद्रप्रताप की फोटो लगाकर लोग भाजपा का लगे टारगेट करने...कांग्रेस की तरह बीजेपी ने भी आयातित नेता को राज्यसभा भेज दिया। बीजेपी की लिस्ट आने के करीब आधे घंटे बाद जाकर क्लियर हो पाया कि देवेंद्र प्रताप सिंह रायगढ़ के रहने वाले हैं। इस बार भी राज्यसभा चुनाव में कुछ वैसा ही होगा। हां, इतना जरूर है कि प्रदेश की सियासत में ओबीसी और आदिवासी का कोटा फुल है। आदिवासी मुख्यमंत्री हैं, तो ओबीसी से डिप्टी सीएम समेत सात मिनिस्टर। लिहाजा, अनुसूचित जाति या सामान्य वर्ग से गुंजाइश बन सकती है।
बाहरी प्रत्याशी
छत्तीसगढ़ बनने के बाद अप्रैल 2002 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए पहला चुनाव हुआ था। उसमें कांग्रेस से मोतीलाल वोरा और रामाधार कश्यप चुने गए थे। उसके बाद अभी तक 22 राज्यसभा सदस्यों के चुनाव हुए हैं। इसमें बीजेपी ने हमेशा लोकल को मौका दिया, कांग्रेस ने पांच बार बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा में भेजा। सबसे पहले जून 2004 में मोहसिना किदवई छत्तीसगढ़ से निर्वाचित हुई। जून 2020 में उन्हें फिर रिपीट किया गया। उसके बाद 2018 से 2023 के बीच सबसे अधिक तीन बाहरी उम्मीदवारों को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला और रंजीता रंजन। मोतीलाल वोरा चूकि कद्दावर नेता रहे इसलिए वे 18 साल तक एक कोटा अपने पास रखा। वरना, और दो-एक बाहरी प्रत्याशी कांग्रेस से राज्यसभा में पहुंच गए होते। हालांकि, लोकल बॉडी की अनिच्छा के बाद भी एक सरकार में तीन-तीन बाहरी लोगों को राज्यसभा में भेजकर कांग्रेस अंजाम भुगत चुकी है, इसलिए इस बार कांग्रेस के लोगां को डरने की जरूरत नहीं है।
नेता प्रतिपक्ष चेंज?
कांग्रेस पार्टी ने चरणदास महंत के राजनीतिक कद और संसदीय अनुभवों को देखते भले ही नेता प्रतिपक्ष बना दिया मगर उनका स्वभाव नेता प्रतिपक्ष वाला नहीं है। यही वजह है कि पार्टी सदन में जैसी आक्रमकता चाहती है, वैसा कुछ हो नहीं रहा। अलबत्ता, एकाधिक बार नेता प्रतिपक्ष सरकार की भी सराहना कर चुके हैं। महंतजी राज्यसभा में जाएं या नहीं, कांग्रेस पार्टी नेता प्रतिपक्ष को लेकर संवेदनशील है। अगर नया नेता चुनने का अवसर आया तो जाहिर तौर पर दो नाम केंद्र में होंगे। उमेश पटेल और देवेंद्र यादव। भूपेश बघेल का नाम बड़ा जरूर है मगर पार्टी उनका उपयोग दूसरों प्रदेशों में कर रही है। देवेंद्र तेज-तर्रार विधायक होने के साथ सतनामी समुदाय के मसले पर जेल जाकर अपना कद बढ़ा चुके हैं तो उमेश पटेल के साथ नंदकुमार पटेल का नाम जुड़ा है। विधानसभा में इस समय उमेश बढ़ियां परफार्म कर रहे हैं। भविष्य में अगर नेता प्रतिपक्ष चुनने का समय आया तो बहुत संभावना है कि उसके लिए ये दो नेता ही तगड़े दावेदार होंगे।
पूत के पांव पालने में
छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य कहें या एसडीएम का? शायद ही किसी स्टेट में ऐसा हुआ होगा, जब कोई सब डिवीजन मजिस्ट्रेट दो बार जेल गया हो। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ, जब सात साल की सर्विस में अफसर को दो बार जेल जाना पड़ा और दो बार सस्पेंड। राप्रसे अधिकारी करुण डहरिया को गरियाबंद में 20 हजार रिश्वत लेते एसीबी ने ट्रेप किया था। वे तीन महीने जेल में रहकर छूटे और फिर जैसा कि देश के सिस्टम में होता है, निलंबन से बहाल होकर फिर से एसडीएम बन गए। पूत के पांव जब पालने में दिख गया था, तब तो बलरामपुर कलेक्टर रिमजिएस एक्का को उन्हें एसडीएम नहीं बनाना था। मगर पिछले दो साल से वे कुसमी सब डिवीजन के प्रमुख बने बैठे थे। और ग्रामीणों से मारपीट और मौत केस में उन्हें जेल जाना पड़ गया।
कमाऊ पूत
कलेक्टर पहले काबिल डिप्टी कलेक्टरों को एसडीएम बनाते थे। मगर अब एसडीएम बनाने के पैरामीटर बदल गए हैं। मैदानी इलाकों में 25 परसेंट तक काबिलियत चल जाता है, बस्तर, सरगुजा में हंड्रेड परसेंट कमाऊ पूत चाहिए। जो एसडीएम ज्यादा पैसा लाकर देगा, कलेक्टर के वे उतने ही करीबी और चेहेते होते हैं। कलेक्टरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह डिप्टी कलेक्टर किन-किन धतकरमों में लिप्त है या लिप्त रहा है। कलेक्टर हों या नेता-मंत्री सभी को आखिर कमाऊ पूत ही तो चाहिए।
बड़ा सवाल
बलरामपुर के एसडीएम कांड से सवाल उठता है, क्या रिश्वत लेते पकड़े गए अधिकारियों, कर्मचारियों को फिर से महत्वपूर्ण पोस्टिंग दी जानी चाहिए? छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में सरकारी मुलाजिम ऐसे हैं, जो रिश्वत लेते जेल की हवा खाकर लौटने के बाद फिर से मलाईदार कुर्सी पर बैठे हैं। जीरो टॉलरेंस पर काम कर रही सरकार को ऐसे मुलाजिमों की एक लिस्ट बनानी चाहिए, ताकि उन्हें अहम पदस्थापनाओं से अलग रखा जा सकें। क्योंकि, ऐसे अफसरों के साथ ऑन बिल्ट प्राब्लम रहता है...आगे चलकर फिर सरकार की साख को डेंट करते हैं।
बस्तर हनीमून डेस्टिनेशन
80 की दशक में जैसा बस्तर था...अफसरों के लिए वैसा ही...हनीमून डेस्टिनेशन जैसा बनता जा रहा है। माओवादियों के चलते पहले तो जान सांसत में पड़ी होती थी, न जाने किस पल क्या हो जाएगा? अधिकारी बस्तर से मीटिंग में रायपुर आने से डरते थे। बहुत आवश्यक हुआ तो देर रात प्रायवेट गाड़ी में बिना गनमैन के, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए निकलते थे। कोशिश रहती थी, सुबह के पहले-पहले कम-से-कम कांकेर क्रॉस कर जाएं। मगर अमित शाह ने बस्तर की रौनक फिर से लौटा दी है। सरकार भी युवा अधिकारियों पर इनायत बरत रही है। न्यू कपल को अगल-बगल के जिलों में पोस्टिंग दी जा रही। इससे हो ये रहा कि वीकेंड में कई-कई जिला मुख्यालय खाली हो जा रहे। न्यू कपल हैं तो दोनों करना चाहिए। काम भी खूब और इंजॉय भी।
चना-मूर्रा जैसे आईएएस
एक तो दिग्विजय सिंह ने छंटे हुए अफसरों को छत्तीसगढ़ भेज दिया। उपर से रही-सही कसर पीएससी ने पूरी कर दी। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पीएससी परीक्षा निरस्त कर दी थी मगर सरकार ने उदारता बरतने में कोई कमी नहीं की...सबके सब आईएएस बन गए। पिछले साल भी दर्जन भर अधिकारियों में से एकाध ही आईएएस बनने लायक रहे होंगे, और इस बार सात में भी कमोवेश वही हाल रहा। छत्तीसगढ़ में अब हालात ऐसे बनते जा रहे कि लोग दिग्विजय सिंह को कोसना बंद कर देंगे। इस समय मुआवजा घोटालों से लेकर अनेक कर्मकांडों में डिप्टी कलेक्टर दागदार हो रहे...जेल जा रहे, देखिएगा कुछ सालों बाद ये सबके सब भारतीय प्रशासनिक सेवा का तमगा लगाकर घूमेंगे। क्योंकि, 50 खोखा कमा लिया तो उसमें से पांच-सात खोखा फेंकने में उनके घर से क्या जाएगा? फंडा यह है कि जमकर कमाओ, जमकर खर्च करो और फिर आईएएस बन जाओ। बाकी आम पब्लिक छत्तीसगढ़ियां, सबले बढ़ियां...पर ताली बजाता रहे।
संगठन मंत्री का प्रमोशन!
छत्तीसगढ़ के संगठन मंत्री पवन साय के प्रमोशन की इन दिनों बड़ी चर्चा है। वैसे भी पिछले तीन महीने से छत्तीसगढ़ से लगभग वे बाहर ही हैं। बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के मोर्चे पर लगा रखा है। जाहिर है, पवन साय ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान काफी काम किया था। पार्टी अब उन्हें इसका ईनाम देना चाहती है। पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाया जा सकता है। क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनने का मतलब होगा, वे एकाधिक राज्यों के प्रभारी होंगे। पवन साय के प्रमोशन से उनके समर्थक क्या सोच रहे हैं, ये तो नहीं मालूम। मगर ये जरूर पता है कि पार्टी में जल्द कुछ अहम बदलाव होंगे। जाहिर है, प्रमोशन होने पर पवन की जगह कोई नया आदमी संगठन प्रभारी बनकर आएगा। फिर नितिन नबीन की जगह प्रदेश प्रभारी की भी नियुक्ति होगी।
ओपी के पिटारे से क्या?
जिस राज्य में बजट का 40 परसेंट हिस्सा कर्मचारियों, अधिकारियों के वेतन और 35 परसेंट फ्रीब्रीज में निकल जा रहा हो, वहां के बजट से कोई चमत्कारित उम्मीद कैसे रखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ के खजाने की यह स्थिति है कि कोई महीना ऐसा नहीं जाता, जब 15 तारीख क्रॉस करते ही वित्त विभाग के अधिकारियों की पेशानी पर बल नहीं पड़ते हों। हर महीने 2500 करोड़ वेतन और करीब 800 करोड़ महतारी वंदन याने 3200 करोड़ चाहिए-ही-चाहिए। फिर भी, ओपी पढ़े-लिखे मिनिस्टर हैं, किल्लतों के बावजूद कुछ हटके करने का प्रयास करेंगे ही। अंदेशा है कि इस बार बजट में शहरी क्षेत्रों के डेवलपमेंट के लिए ठीकठाक राशि का प्रावधान किया जाएगा। खासकर, बिलासपुर और रायपुर को संवारने पर। युवाओं और रोजगार से जुड़ी कुछ अहम घोषणाओं की भी उम्मीदें हैं।
नेताओं की आंखों में धूल
छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स को मजबूत करने सरकार कई मोर्चो पर काम कर रही है। एजुकेशन में नित नए प्रयोग और नवाचार किए जा रहे हैं। मगर यह भी सनद रहे कि रिजल्ट को लेकर अफसरशाही नेताओं की आंखों में धूल झोंकने का भी काम करती है। खासकर, स्कूल शिक्षा में। नकल के नाम पर यूपी-बिहार बदनाम थे। वहां अब स्थिति बदल गई है। और छत्तीसगढ़ में? स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ पिछले 25 सालों से देश में नीचे से तीसरे स्थान से उपर नहीं आ पाया। बता दें, कुछ बरसों पहले दो कलेक्टरों के बारे में पुख्ता जानकारी मिली थी कि अपने जिले का नंबर बढ़ाने स्कूल वालों को कुछ भी करने के लिए कह डाला था। जाहिर है, छत्तीसगढ़ के कलेक्टरों में अभी भी श्रेय लेने की होड़ है कि उनके जिले से इतने लोग मेरिट में आए। चिंतन पर इस पर भी होनी चाहिए कि रिमोट एरिया के स्कूलों में रिजल्ट इतने बढ़ियां कैसे आ जाते हैं। और, अगर ऐसा ही रहा तो सवाल उठता है...छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स का क्या होगा? इस पर मनन करना चाहिए।
बजट सत्र में ट्रांसफर
ब्यूरोक्रेसी में ऐसा परसेप्शन चला आ रहा, बजट सत्र में ट्रांसफर नहीं होते। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कई बार हो चुका है। इसी सरकार ने मानसून सत्र के दौरान ट्रांसफर किया था। बहरहाल, 23 फरवरी से बजट सत्र प्रारंभ हो रहा है। और 24-25 फरवरी के आसपास बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव होंगे। 24-25 इसलिए क्योंकि 24 को गिरौदापुरी मेला समाप्त हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कार्यमुक्त कर देगी। सवाल उठता है, बलौदा बाजार का अगला कलेक्टर कौन होगा? कलेक्ट्रेट को जलाने जैसी घटना के बाद तो सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहेगा। लिहाजा, बतौर कलेक्टर दो-एक जिला करने वाले अनुभवी आईएएस अफसर को ही बलौदा बाजार भेजा जाएगा। हो सकता है, इस चक्कर में एक छोटा चेन बन जाए।
अंत में दो सवाल आपसे
1. क्या छत्तीसगढ़ के इस बजट में रायपुर-भिलाई में मेट्रो रेल की घोषणा हो सकती है?
2. एक मंत्री का नाम बताएं, जो कुर्सी की स्थिरता के लिए कामख्या के एक पंडित से यज्ञ करवाएं हैं?