Chhattisgarh Tarkash 2026: अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Update: 2026-02-14 23:30 GMT

तरकश, 15 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

जिले के एक पुलिस कप्तान द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि एक डीएफओ ने अपने विभाग के सिकेट्री को फोन पर गरिया दिया। गाली भी छोटी-मोटी नहीं...सरकार को निलंबन आदेश में लिखना पड़ा...डीएफओ ने लैंगिक गालियां दी। आश्चर्य तो यह कि सिकेट्री भी आईएफएस हैं। इसके बाद भी डीएफओ ने कोई कंजूसी नहीं की। सिकेट्री साहब को पहले विश्वास नहीं हुआ...उन्हीं के कैडर का कोई अधिकारी भला ऐसा कैसे कर सकता है...शायद रांग नंबर लग गया होगा। इसलिए उन्होंने लैंडलाइन से दोबारा फोन लगवाया, मगर फिर गालियों की बौछारें। इसके बाद फिर कुछ बचता नहीं था। बात एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा तक पहुंची और जाहिर है, वे किसी की सुनती नहीं...इसलिए दाल गल नहीं पाई। सस्पेंशन आदेश में गालियों तक को कोट किया गया। सवाल यह है कि ऐसे उदंडता को संरक्षण दे कौन रहा है? इससे पहले डीएफओ ने बीजेपी नेताओं को ऑफिस से भगा दिया था। फिर भी पार्टी के मुखिया किरण सिंहदेव को गुस्सा नहीं आया। इसके बाद डीएफओ का हौसला इतना बढ़ गया कि अपने बॉस की ही लानत-मलानत कर दी। अनुशासनहीनता के बढ़ते केसों में कार्रवाई करने में आगे-पीछे होते सिस्टम को समझना चाहिए नेता और मंत्री नहीं, मोदी गारंटी बड़ा है और इसी मोदी गारंटी से बीजेपी सत्ता में लौटी। बहरहाल, ऐसा ही रहा तो एसपी, डीएफओ के बाद अब किसी कलेक्टर की बारी होगी। सिस्टम को कौंवा मारकर लटकाना होगा।

कांग्रेस का मजबूत गढ़!

राजधानी रायपुर से लगे गरियाबंद में शिक्षिकाओं का दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स का मामला सामने आया तो कार्रवाई के खिलाफ बीजेपी के लोग ही खड़े हो गए। ऐसे में, स्कूल विभाग के अधिकारी कैसे पीछे रहते। शिक्षिकाओं को बचाने की एवज में 20-20 हजार वसूल डाले। कहने का आशय यह है कि रुलिंग पार्टी के लोग ही जब सिस्टम की राह में रोड़ा बनेंगे तो अफसर और निरंकुश होंगे ही। इससे सिस्टम का नुकसान हो रहा है। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए कि मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन की ब्यूहरचना के चलते छत्तीसगढ़ में पांच साल में ही कमल खिल गया। वरना, ये मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं, छत्तीसगढ़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है और आज भी काडर खतम नहीं हुआ है। जाहिर सी बात है कि बीजेपी के लोकल बॉडी में इतना ही दमखम होता तो 2018 में 15 सीटों पर थोड़ी ही सिमटती। कहने का मतलब यह है कि पार्टी को अपने काडर को कंट्रोल में रखने की जरूरत है। बेलगाम हो चुके कैडर से नुकसान राज्य सरकार की छबि का हो रहा। सरकार कोई महत्वपूर्ण सुधार का काम करती है मगर इस तरह की घटनाओं से साख को डेंट लगता है। सरकार ने स्कूल शिक्षा में सुधार के कई ऐतिहासिक कार्य किए थे। पहली बार स्कूलों का युक्तियुक्तकरण हुआ। मगर पीएमश्री स्कूल की शिक्षिकाएं दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स बना रही हैं और बीजेपी के लोग उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो जा रहे। पुलिस कप्तान को भी पार्टी के लोग बचा रहे तो डीएफओ के पीछे ढाल बनने वाले भी रुलिंग पार्टी के बड़े नेता हैं। सिस्टम को अपना औरा दिखाना चाहिए।

नया हेड ऑफ फॉरेस्ट

हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव करीब तीन महीने बाद मई में रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह वन विभाग का मुखिया कौन होगा, इसको लेकर महकमे में उत्सुकता बढ़ती जा रही है। सीनियरिटी के हिसाब से देखें तो पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय श्रीनिवास के बाद दूसरे नंबर पर है। सरकार अगर पोस्टिंग में सीनियरिटी को वेटेज देगी तो अरुण की किस्मत खुल सकती है। मगर ओपी यादव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जाहिर है, अरुण पाण्डेय का नाम पिछले एक साल से हेड ऑफ फॉरेस्ट के लिए चल रहा है। मगर अरुण की ताजपोशी संभव नहीं हो पाई। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ हैं। वन महकमे में हेड ऑफ फारेस्ट के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पद है। मगर पिछले कुछ सालों से मिथक चल रहा कि वाइल्डलाइफ चीफ हेड ऑफ फॉरेस्ट नहीं बन पा रहे। ओपी यादव को हल्के में न लेने के पीछे अहम बात यह है कि वे इस समय कैम्पा के प्रमुख हैं। श्रीनिवास राव भी जब हेड ऑफ फॉरेस्ट बने, तब कैम्पा के ही हेड थे। उनके बाद अरुण का नाम कैंपा के लिए चला था मगर ऐसा होने नहीं दिया गया। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति में सीनियरिटी को वेटेज दिया जाएगा या फिर ओपी को मौका मिलेगा।

कलेक्टरों की हाजिरी

पिछले हफ्ते मुख्य सचिव विकास शील ने कलेक्टरों की वीडियोकांफ्रेंसिंग की। इसमें वे अफसरों की टाईमिंग की चर्चा करते हुए उन 10 कलेक्टरों के नाम गिना दिए, जो सुबह 10 बजे ऑफिस पहुंच जा रहे। बाकी को उन्होंने इशारे में बता दिया...निर्देशों को हल्के में न लें, उनके स्तर पर इसे वॉच किया जा रहा है। पता चला है, मुख्य सचिव ने जिलों के बायोमेट्रिक सिस्टम का एक्सेज अपने पास रखा है। इससे उन्हें मालूम चल जाता है कौन कलेक्टर टाईम पर ऑफिस आए और कौन लेट। बताते हैं, सीएस के वीडियोकांफ्रेंसिंग के बाद अधिकांश कलेक्टरों ने अपनी टाईमिंग अब दुरूस्त कर ली है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सीएस सार्वजनिक तौर से टोकने में गुरेज नहीं करते।

बायोमेट्रिक का फायदा

छत्तीसगढ़ में अटेंडेंस के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम लागू करने से एक बड़ा फायदा यह हुआ कि क्लर्कियल कैडर पटरी पर आ गया। वरना, मंत्रालय का ही लें...कर्मचारी आराम से 11.30 बजे तक आते थे। चाय-वाय पीने के बाद डेढ़ बजे लांच हो जाता था। फिर शाम को तीन बजे गांव की देसी सब्जी खरीदने मंत्रालय के सामने चौपाटी पर हाजिर। सब्जी लेकर आने के बाद फिर चार बजे से घर जाने के लिए सामान समेटना शुरू। आश्चर्य की बात...ये तब हुआ जब आदेश में अवर सचिव से नीचे के मुलाजिमों को शामिल नहीं किया गया है, मगर अफसर टाईम पर पहुंच जा रहे इसलिए कर्मचारियों ने भी बिना कहें टाईम पर आना प्रारंभ कर दिया है। रही बात बड़े अधिकारियों की, तो जो फाइलें महीनों तक लटकी रहती थीं, अब लगभग डेली डिस्पोजल हो जा रहीं। इसलिए, क्योंकि पहले साहबानों के आने और जाने पर कोई बंदिशें नहीं थीं। मन पड़े तो मंत्रालय आए, नहीं तो पीए का रटा-सा जवाब....साब फलां जगह मीटिंग में गए हैं...भले ही साब घर में आराम फरमा रहे हों। लेकिन, अब अफसर सुबह सवा दस बजे तक मंत्रालय पहुंच जा रहे तो फिर बैठकर क्या करेंगे। लिहाजा, फाइलें भी तेज गति से हो रही हैं।

5000 करोड़ की बचत, मगर...

धान खरीदी में सिस्टम को कसने का फायदा यह हुआ कि अबकी 141 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी रुक गई। वरना, पिछले साल 149 लाख मीट्रिक टन हुआ था और इस बार बढ़कर उसे करीब 160 लाख मीट्रिन टन पहुंचने का अंदेशा था। वैसे सरकार की योजना पहले 120 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी को रोकने की रही मगर सरकार के भीतर से ही सहयोग नहीं मिला। जिम्मेदार नेता लगे बवाल काटने...ऐसा रहा तो अगला चुनाव हार जाएंगे। यही वजह है कि दो-तीन जिलों में ही राईस मिलरों पर कलेक्टर छापा मार पाए। दरअसल, सूबे के 80 परसेंट से अधिक राईस मिलें राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हैं। और इतने ताकतवर कि कई मंत्री, नेता उनके लिए दुखी हो गए थे। कुछ चूक सिस्टम के एंड से भी हुई। पता नहीं टोकन का साफ्टवेयर कैसा बनाया गया कि किसानों को टोकन के लिए काफी परेशान होना पड़ा और कुछ माहौल राईस मिल माफियाओं ने बना दिया। इस चलते प्रारंभ में कड़े तेवर दिखा रही सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। फिर भी, कसावट से करीब 5000 करोड़ बच गया। वरना, बिचौलियों की तैयारी राज्य का खजाना साफ करने की थी।

सीएस पर जिम्मेदारी

सीजीएमएससी को ठीक करने सरकार ने दिल्ली रिटर्न आईएएस अमित कटारिया को सिकेट्री हेल्थ बनाया। सीजीएमएससी से प्रमोटी आईएएस को हटाकर डायरेक्ट आईएएस को एमडी की कमान सौंपी गई। इसके बाद भी हाई कोर्ट को मेडिकल इक्विमेंट्स खरीदी में अक्षमता को लेकर तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही है तो फिर समझा जा सकता है कि सीजीएमएससी किस कदर डिरेल्ड हो चुका है। सीजीएमएससी में कई सालों से अराजकता की स्थिति यह है कि पैसा होते हुए भी दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट नहीं खरीद पा रहा। अस्पताल वालों की मजबूरी यह है कि मेडिकल से संबंधित सारी खरीदी का अधिकार सरकार ने सीजीएमएससी को दे रखा है। सीजीएमएससी को दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट से ज्यादा फायदा बिल्डिंग बनाने में नजर आता है। फिर, दवा सप्लायर जेम पोर्टल में ऐसे कंडिशन डलवा देते हैं कि दूसरी कंपनियां टेंडर में हिस्सा ले नहीं सकें। हाई कोर्ट यह खेल समझ गया, तभी चीफ जस्टिस की डबल बेंच ने कहा है कि मुख्य सचिव इसे देखें। कोर्ट अगर सीएस को व्यवस्था देखने को कह रहा, इसका मतलब तो ये ही हुआ कि सीजीएमएससी का सिस्टम फेल हो चुका है। अब चीफ सिकरेट्री कोई रास्ता निकालेंगे कि सीजीएमएससी दवा खरीदने में सक क्यों नहीं पा रहा।

चौपट सिस्टम

छत्तीसगढ़ बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग में एक से बढ़कर एक मंत्री बने और सचिव मगर सूबे में एक बढ़ियां सरकारी अस्पताल मयस्सर नहीं हो पाया। भारत सरकार के पैसे से दो सुपर स्पेशिलिटी अस्तपाल जरूर बने मगर वे अपने किस्मत पर रो रहे हैं। जगदलपुर को प्रायवेट पार्टनरशिप में दिया गया, वो अभी तक प्रारंभ नहीं हो पाया और बिलासपुर में सिर्फ ओपीडी चल रहा है। 250 करोड़ खर्च करने के बाद भी अभी मरीजों की भर्ती की सुविधा नहीं शुरू हो पाई है। सवाल उठता है, छत्तीसगढ़ सरकार से जमीन लेकर जब एम्स इतना बढ़ियां बिल्डिंग बनाकर अस्पताल का संचालन कर सकता है तो फिर राज्य के हेल्थ डिपार्टमेंट द्वारा गरीबों के लिए अदद एक ठीकठाक अस्पताल क्यों नहीं शुरू किया जा सकता? मगर इस पर किसी को सोचने का टाईम नहीं। प्रायवेट अस्पतालों में गरीब लूटते रहे, और आयुष्मान के नाम पर सरकारी खजाना लूटता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं, एम्स को देखकर सिस्टम में बैठे लोगों को कुछ लगता क्यों नहीं? इस माईनिंग स्टेट में अगर डीएमएफ की ठीक से प्लानिंग की गई होती तो एम्स के समकक्ष रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर में तीन अस्पताल खुल गए होते। और नहीं, तो लखनउ जैसा रायपुर में एक पीजीआई तो खुल ही सकता है।

सीएस का वेतन, सबसे बड़ा लोचा

देश के सरकारी अस्पतालों की सेहत खराब होने में मुख्य सचिवों के वेतन का भी लोचा है। दरअसल, राज्यों की ब्यूरोक्रेसी डॉक्टरों का वेतन चीफ सिकरेट्री से अधिक होने नहीं देना चाहती। और नीट में सलेक्ट होने के बाद पांच साल एमबीबीएस, तीन साल पीजी और दो साल सुपरस्पेशिलिटी याने 10 साल दिमाग घिसने के बाद कोई स्पेशलिस्ट दो-ढाई लाख पगार में सरकारी अस्पताल में काम करने आएगा नहीं। अलबत्ता, सीएस के पद को उसकी सेलरी से नहीं तौला जा सकता। सीएस कार्यपालिका का हेड होता है। प्रोटोकॉल में मंत्री जरूर सीएस से उपर होते हैं मगर ओवरऑल पकड़ और प्रभाव में सीएस उनसे आगे होते हैं। बिना उसके दस्तखत के एक फाइल आगे नहीं सरक सकती। मुख्य सचिव कैबिनेट के पदेन सचिव होते हैं। लिहाजा, लखनउ की तर्ज पर अलग एक्ट पारित कर पीजीआई जैसा इंस्टिट्यूट तो खोला ही जा सकता है। अपने मुख्य सचिव विकास शील प्रैक्टिकल सुधार में विश्वास रखते हैं। वे छत्तीसगढ़ में हेल्थ सिकरेट्री रह चुके हैं और भारत सरकार में भी इस विभाग में सेवा दे चुके हैं। उनसे अधिक हेल्थ सिस्टम को भला कौन समझ सकता है। इस गरीब प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने उन्हें कोई रास्ता निकालना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. धुरंधर फिल्म की अपार सफलता क्या विपक्षी पार्टियों को अपनी रीति-नीति पर सोचने के लिए मजबूर करेगी?

2. सिस्टम में घुस चुके एक आत्मविश्वासी मंत्री का नाम बताइये, जिन्हें यकीन है कि उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं?

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