Supreme Court News: सुप्रीम फैसला: शिकायत वापस लेने के बाद बीसीआई की अनुशासनात्मक समिति अधिवक्ता पर नहीं लगा सकती दंड, समिति की कार्रवाई रद्द

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अगर शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत वापस ले ली है, तो ऐसी स्थिति में बार कौंसिल ऑफ इंडिया को संबंधित अधिवक्ता पर दंड देने का अधिकार नहीं रह जाता।

Update: 2026-01-30 09:11 GMT

Supreme Court News: दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि अगर शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत वापस ले ली है, तो ऐसी स्थिति में बार कौंसिल ऑफ इंडिया को संबंधित अधिवक्ता पर दंड देने का अधिकार नहीं रह जाता। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अनुशासन समिति के उस फैसले को रद्द कर दिया है जिसमें अधिवक्ता को व्यवसायिक कदाचरण का दोषी मानते हुए दंड दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता की अपील को स्वीकार करते हुए कहा,जब शिकायतकर्ता ने अधिवक्ता द्वारा दी गई पेशेवर सेवाओं से संतोष व्यक्त करते हुए शिकायत वापस ले ली है, तब ऐसी स्थिति में अनुशासनात्मक कार्रवाई का मूल आधार ही समाप्त हो जाता है। लिहाजा अनुशासन समिति द्वारा अधिवक्ता को व्यवसायिक कदाचरण का दोषी ठहराने वाला आदेश, तथ्य और कानून दोनों ही आधार पर अस्थिर हो जाता है।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता अधिवक्ता को शिकायकर्ता ने पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए नियुक्त किया था। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सशर्त राहत दी थी। कोर्ट ने लागत जमा कराने की शर्त पर याचिकाकर्ता को राहत दी थी। इसके लिए कोर्ट ने समय सीमा भी तय कर दिया था। लागत जमा कराने में विलंब के कारण हाई कोर्ट का आदेश रद्द हो गया। इसी के साथ आपराधिक कार्रवाई की फाइल दोबारा खुल गई। हालांकि बाद में अधिवक्ता द्वारा दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने अधिक लागत जमा करने की शर्त पर अपना आदेश वापस ले लिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया। बाद में हाई कोर्ट ने याचिकाककर्ता पर लगाए लागत की शर्त को भी माफ कर दिया।

इस बीच याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए स्टेट बार कौंसिल में शिकायत दर्ज करा दी। शिकायत के बाद आपसी सहमति से मामला सुलझ गया। सहमति के बाद दिसंबर 2022 में शिकायतकर्ता ने शपथ पत्र पेश कर अपनी शिकायत वापस लेने के साथ ही अधिवक्ता के आचरण को सही बताते हुए संतोष व्यक्त किया। शिकायत वापस लेने के बाद भी बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने शिकायत वापसी को नजरअंदाज करते हुए एक लाख रुपये का दंड अधिरोपित किया था।

बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अनुशासन समिति के निर्णय को चुनौती देते हुए अधिवक्ता ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 38 के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील पेश की थी। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा,

कदाचार का निष्कर्ष केवल मूल शिकायत में किए गए निराधार आरोपों पर आधारित था। रिकॉर्ड से यह नहीं दिखता कि शिकायतकर्ता ने आरोपों के समर्थन में कोई साक्ष्य पेश किया हो। मात्र आरोपों के आधार पर व्यवसायिक कदाचरण का आरोप ठहराना कानूनन अस्थिर है। डिवीजन बेंच ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया अनुशासन समिति के फैसले को रद्द कर दिया है।

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