Sanwaliya Seth Mandir Ka Itihas: इस भगवान को कहते है भारत का बिजनेस गॉड; व्यापारियों द्वारा होता है करोड़ों का चढ़ावा! जानिए सांवलिया सेठ मंदिर रहसमयी इतिहास
Sanwaliya Seth Mandir Ka Itihas: भारत का राजस्थान राज्य अपने प्राचीन विरासतों और कई अनेक धार्मिक तीर्थ स्थलों के लिए जाना जाता है। राजा–महाराजाओं के किले हो या कई प्रसिद्ध आस्था के केंद्र, इस राज्य में आपको घूमने की कई जगहें मिल जाएगी। लेकिन आज हम आपको राजस्थान के ऐसे कृष्ण मंदिर के बारे में बताने वाले हैं जहां का रहस्य और चमत्कार आपको काफी चौंका देगा और जब इस मंदिर के चढ़ावों को देखा जाता है तो आंखें फटी रह जाती है। यहां भगवान स्वयं लोगों के बिजनेस पार्टनर बनते हैं, आईए जानते हैं इस मंदिर का अनोखा इतिहास।
Sanwaliya Seth Mandir Ka Itihas: भारत का राजस्थान राज्य अपने प्राचीन विरासतों और कई अनेक धार्मिक तीर्थ स्थलों के लिए जाना जाता है। राजा–महाराजाओं के किले हो या कई प्रसिद्ध आस्था के केंद्र, इस राज्य में आपको घूमने की कई जगहें मिल जाएगी। लेकिन आज हम आपको राजस्थान के ऐसे कृष्ण मंदिर के बारे में बताने वाले हैं जहां का रहस्य और चमत्कार आपको काफी चौंका देगा और जब इस मंदिर के चढ़ावों को देखा जाता है तो आंखें फटी रह जाती है। यहां भगवान स्वयं लोगों के बिजनेस पार्टनर बनते हैं, आईए जानते हैं इस मंदिर का अनोखा इतिहास।
सांवलिया सेठ मंदिर का इतिहास
राजस्थान के जिस मंदिर की बात हम कर रहे हैं वह है सांवलिया सेठ मंदिर, जो चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया गांव में स्थित है। यह मंदिर कृष्ण भक्तों के लिए बहुत बड़ा आस्था केंद्र है जिस वजह से यहां हजारों–लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। इस मंदिर में सांवलिया सेठ के रूप में भगवान श्री कृष्णा विराजमान है।
इस मंदिर से जुड़ी एक अनोखी कहानी भी प्रचलित है। यह कहानी कृष्ण भक्त मीरा से जुड़ी हुई है। 1527 में जब मुगल शासक बाबर और मेवाड़ के शासक राणा सांगा के बीच खानवा का युद्ध हुआ और इस युद्ध में हारने के 1 वर्ष बाद राणा सांगा की मृत्यु हो गई फिर इनके ज्येष्ठ पुत्र भोजराज जो भक्त मीराबाई के पति थे, उनकी भी मृत्यु विवाह के 7–8 साल पश्चात हो जाती है।
इस दौरान मीराबाई अकेली पड़ जाती है और लोग उन्हें मारने का पूरा प्रयास करते हैं। इसी समय साधु संतों का एक बड़ा समूह भारत भ्रमण के दौरान मेवाड़ क्षेत्र में पहुंचा। इनके पास गिरधर गोपाल श्री कृष्ण की चार मूर्तियां थी। वे जहां भी जाते इन मूर्तियों को अपने साथ ले जाते और पूरे निष्ठा के साथ भजन कीर्तन करते थे। मीरा बाई भी इनके कीर्तन में शामिल होती थी और सांवलिया जी के एक मूर्ति पर अत्यंत मोहित हो गई। मीराबाई पर कृष्ण भक्ति ऐसी चढ़ी की 1547 के आस पास कहते है वह द्वारका के रणछोड़जी मंदिर में श्री कृष्ण की मूर्ति में समा गईं।
मुगल सेना इस समय इस्लाम का खूब प्रचार–प्रसार कर रही थी जिस वजह से ये सभी हिंदु मंदिरों और भगवानों की मूर्तियों को तोड़ रहे थे और जब मुगलों ने सांवलिया जी की प्रसिद्ध मूर्ति के बारे में सुना तो वे इसे भी तोड़ने के लिए आए पर संत दयाराम और टोली के सभी संतों ने मिलकर इन चारों मूर्तियो को बागुंड गांव में एक बरगद पेड़ के नीचे छिपा दिया जिससे ये मूर्तियां मुगलों से बची रही।
लगभग 250 साल पहले मंडफिया गांव में भोलाराम गुर्जर नाम का एक साधारण व्यक्ति रहता था। एक रात उसे सपने में भगवान के दिव्य दर्शन हुए जिसमें उसे बताया गया कि बागुंड गांव के एक बरगद पेड़ के नीचे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियां दबी हुई हैं। भोलाराम ने इस संकेत को माना और गांववालों को इसकी जानकारी दी। जब इसी जगह पर खुदाई की गई तो सच में चार मूर्तियां मिली थी, जिसमें से एक टूटी हुई थी।
टूटी हुई मूर्ति को वहीं छोड़कर बाकी तीनों मूर्तियों को मंडफिया, भादसोड़ा और चापर में अलग-अलग जगह पर स्थापित किया गया। इसमें एक है सबसे फेमस मंडफिया गांव का सांवलिया सेठ गोपाल मंदिर। इन मंदिरों में स्थापित मूर्तियां सांवले अर्थात काले रंग की हैं। यहां भव्य मंदिर का निर्माण सन 2000 में 50 करोड़ की लागत से किया गया था। कृष्णजन्माष्टमी और जलझूलनी एकादशी के समय यहां तीन दिनों का मेला भी आयोजित किया जाता है। मंदिर में दर्शन के लिए आपको खाली हाथ ही जाना पड़ेगा। यहां किसी प्रकार की नारियल, फूल, अगरबत्ती ले जाना माना है। मंदिर के खुलने का समय सुबह 5:30 बजे से 12:00 बजे तक फिर दोपहर 2:30 बजे से रात 11:30 बजे तक रहता है।
हर महीने करोड़ों का होता है चढ़ावा
व्यापारी वर्ग सांवरिया सेठ के प्रति अपनी गहरी आस्था रखते है। वे सांवलिया गोपाल को सेठों का सेठ मानते है और अपनी कमाई का कुछ हिस्सा इनके लिए भागीदारी के रूप में हर महीने दान करते है। ऐसा कहते है कि आप जितना सांवलिया सेठ को दान करेंगे उससे सौ गुना ज्यादा आपको वापस भी मिलेगा। हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को सांवलिया सेठ का 125 किलो का चांदी से बना हुआ दान पेटी खोला जाता है, जिसमें हर महीने करोड़ों रुपयों का दान होता है, इनमें तो कुछ विदेशी रूपये भी होते है। इन पैसों का इस्तेमाल मंदिर ट्रस्ट द्वारा स्कूल, सड़क, और अस्पताल जैसे कार्यों में किया जाता है।