Makar Sankranti har sal ek Hi din kyon manai jaati Hai: मकर संक्रांति का त्योहार हर साल 14 या 15 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है? जानिए इस दिन होने वाली खगोलीय घटनाओं के बारे में!

Makar Sankranti har sal ek Hi din kyon manai jaati Hai: क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि इन सभी त्योहारों को मनाए जाने वाले दिन हर साल अलग-अलग क्यों होते हैं? जन्मदिन की तरह ही हर साल एक ही दिन हम इन त्योहारों को क्यों नहीं मानते? लेकिन यह सवाल मकर संक्रांति के लिए उल्टे पड़ जाते हैं क्योंकि यह त्यौहार हर साल एक ही तारीख को पड़ता है। इसके पीछे ग्रहों का बहुत बड़ा खेल है। आइए समझते हैं मकर संक्रांति के दिन होने वाली खगोलीय घटनाओं के बारे में।

Update: 2026-01-13 10:16 GMT

Makar Sankranti har sal ek Hi din kyon manai jaati Hai: विविधताओं के देश भारत में रास्ते चलते ही संस्कृति और परंपराएं बदल जाते हैं और भारतीय परंपरा में त्योहारों का विशेष महत्व है, यहां होली, दीपावली, नवरात्रि और रक्षाबंधन जैसे त्योहार काफी धूमधाम से मनाए जाते हैं। इन्हीं त्योहारों की लिस्ट में मकर संक्रांति भी अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। क्या आपके मन में कभी यह सवाल आया है कि इन सभी त्योहारों को मनाए जाने वाले दिन हर साल अलग-अलग क्यों होते हैं? जन्मदिन की तरह ही हर साल एक ही दिन हम इन त्योहारों को क्यों नहीं मानते? लेकिन यह सवाल मकर संक्रांति के लिए उल्टे पड़ जाते हैं क्योंकि यह त्यौहार हर साल एक ही तारीख को पड़ता है। इसके पीछे ग्रहों का बहुत बड़ा खेल है। आइए समझते हैं मकर संक्रांति के दिन होने वाली खगोलीय घटनाओं के बारे में।

जानिए भारतीय पंचांग क्या कहते हैं?

भारत में दो प्रकार के पंचांग पद्धति संचालित है एक चंद्र कैलेंडर और दूसरा सूर्य कैलेंडर। भारत में मनाए जाने वाले अधिकांश त्यौहार चंद्र कैलेंडर पर आधारित होते हैं, जिसमें चंद्रमा की गति की गणना करके त्योहारो की दिन तिथि तय की जाती है, जो हर साल अलग-अलग होती है। लेकिन मकर संक्रांति ही एक ऐसा त्यौहार है जो चंद्र कैलेंडर पर नहीं बल्कि सौर कैलेंडर से निर्धारित होती है, जो सूर्य की गति की गणना पर आधारित है साथ ही पृथ्वी, सूर्य का पूरा चक्कर लगाने में 365 दिन और कुछ घंटों (5–6 घंटे) का समय लेती है, इसी कुछ घंटों के अतिरिक्त समय की वजह से मकर संक्रांति हर साल कभी 14 या फिर कभी 15 जनवरी को ही पड़ता है।

इस दिन होता है सूर्य का मकर राशि में प्रवेश

मकर संक्रांति का शाब्दिक अर्थ देखें तो इसमें संक्रांति का मतलब होता है एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना और इस दिन कुछ ऐसा ही होता है। सूर्य साल के 12 महीने अलग-अलग 12 राशियों में विचरण करता है और जब सूर्य धनु राशि से चलकर मकर राशि में प्रवेश करता है तो इसी घटना को ही मकर संक्रांति कहते हैं। लेकिन यहां एक सवाल उठता है कि मकर राशि में प्रवेश करना ही इतना खास क्यों है? तो मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य के साथ एक और खगोलीय घटना होती है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होना शुरू हो जाता है अर्थात सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ने लगता है जिस वजह से ठंड के बाद गर्मी का मौसम आता है और दिन बड़े साथ ही रातें छोटी होने लगते हैं।

सूर्य के उत्तरायण होने की घटना को काफी पवित्र माना जाता है जिस वजह से आज हम इसे एक त्योहार के रूप में मनाते हैं। लेकिन यहां भी एक समझने वाली बात है कि सूर्य का उत्तरायण 21 दिसंबर से प्रारंभ हो जाता है लेकिन प्राचीन समय में मकर संक्रांति का दिन सूर्य के उत्तरायण होने के दिन ही अर्थात दिसंबर में ही पड़ता था। जिस वजह से आज तक इन दोनों घटनाओं को एक ही दिन जोड़कर त्यौहार की तरह मनाया जाता है।

72 साल वाली प्रचलित मान्यता

मकर संक्रांति को लेकर एक प्राचीन मान्यता यह भी है कि यह खास दिन हर 72 साल में एक दिन आगे खिसक जाता है। इसके पीछे भी एक खगोलीय कारण है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 22.3 डिग्री झुकी हुई है और अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है, जिसे अक्षीय घूर्णन या प्रिसेशन ऑफ इक्विनॉक्स कहते है। पृथ्वी की इसी घूर्णन गति के कारण सूर्य ग्रह का मकर राशि में प्रवेश हर साल 20 सेकंड के लिए आगे बढ़ जाता है और 72 सालों में यह समय पूरा एक दिन का हो जाता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति की तारीख अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। ऐसा बताया जाता है की सातवीं से आठवीं शताब्दी के बीच मकर संक्रांति दिसंबर के महीने में मनाई जाती थी जो 20वीं शताब्दी से जनवरी महीने के 14 या 15 तारीख में स्थिर हो गई है। भारत में इस दिन तिल और गुड़ के बने लड्डू बनाने और पतंग उड़ाने की भी परंपरा है।

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