Mahakal Bhasm Aarti Live : उज्जैन से महाकाल लाइव : साल 2026 के पहले शुक्रवार पर भोलेनाथ का दिव्य श्रृंगार, भस्म आरती में उमड़ा आस्था का सैलाब, घर बैठे आप भी करें दर्शन
Mahakal Bhasm Aarti Live : नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही धर्म नगरी उज्जैन में भक्तों का तांता लगा हुआ है। आज, 2 जनवरी 2026 को साल के पहले शुक्रवार के अवसर पर बाबा महाकाल के दरबार में विशेष रौनक देखने को मिली।
Mahakal Bhasm Aarti Live : उज्जैन से महाकाल लाइव : साल 2026 के पहले शुक्रवार पर भोलेनाथ का दिव्य श्रृंगार, भस्म आरती में उमड़ा आस्था का सैलाब, घर बैठे आप भी करें दर्शन
Bhasm Aarti 2 January 2026 : उज्जैन। नए साल 2026 की शुरुआत के साथ ही धर्म नगरी उज्जैन में भक्तों का तांता लगा हुआ है। आज, 2 जनवरी 2026 को साल के पहले शुक्रवार के अवसर पर बाबा महाकाल के दरबार में विशेष रौनक देखने को मिली। भोर में होने वाली विश्व प्रसिद्ध भस्म आरती में भगवान शिव का ऐसा अद्भुत श्रृंगार किया गया कि भक्त मंत्रमुग्ध हो गए।
Bhasm Aarti 2 January 2026 : महाकाल का दिव्य श्रृंगार: सूखे मेवे और भांग से सजे भोलेनाथ आज सुबह 3:00 बजे मंदिर के पट खुलने के बाद बाबा महाकाल का जलाभिषेक और पंचामृत पूजन दूध, दही, घी, शहद और शक्कर किया गया। इसके बाद बाबा का मस्तक पर त्रिपुंड और चंदन से विशेष श्रृंगार हुआ।आज के श्रृंगार की विशेषता यह थी कि भोलेनाथ को भांग, सूखे मेवे और ताजे पुष्पों से राजा के रूप में सजाया गया। महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से भस्म अर्पित की गई, और शंख-डमरू की गूँज के साथ पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
दिन भर की आरती और अनुष्ठान कार्यक्रम
बाबा महाकाल के दरबार में रोज की तरह आज भी 2 जनवरी को भक्ति का अनवरत प्रवाह जारी रहेगा, जहाँ सुबह से लेकर देर रात तक विशेष आरतियों और अनुष्ठानों का सिलसिला चलेगा। भस्म आरती के दिव्य दर्शनों के पश्चात, सुबह 7:30 से 8:15 बजे के मध्य 'दद्योदक आरती' की जाएगी, जिसमें भगवान को विशेष रूप से दही और पंचामृत का भोग लगाया जाएगा। इसके बाद, दोपहर के समय बाबा की भव्य 'भोग आरती' का आयोजन 10:30 से 11:15 बजे तक होगा, जहाँ महाकाल को पूर्ण राजसी भोजन अर्पित किया जाएगा।
जैसे-जैसे दिन ढलेगा, शाम 5:00 बजे से विशेष संध्या पूजा और अभिषेक शुरू होगा, जो भक्तों के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र रहेगा। इसके तुरंत बाद, शाम 6:30 से 7:15 बजे के बीच मंदिर परिसर झालर, शंख और नगाड़ों की मंगल ध्वनि से गूँज उठेगा, जब बाबा की भव्य 'संध्या आरती संपन्न होगी। अंत में, दिन भर की सेवा के उपरांत बाबा को विश्राम कराने के लिए रात्रि में शयन आरती की जाएगी, जिसके साथ आज के इन दिव्य अनुष्ठानों का समापन होगा।
विशेष अनुष्ठान और दर्शन व्यवस्था
आज शुक्रवार होने के कारण मंदिर समिति ने भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए विशेष प्रबंध किए हैं। गर्भगृह में प्रवेश को लेकर कड़े नियम लागू हैं ताकि सभी श्रद्धालु सुगमता से दर्शन कर सकें। मंदिर परिसर में आज दिन भर 'शिव महिम्न स्तोत्र' और 'रुद्राभिषेक' के पाठ चलते रहेंगे, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक बना हुआ है।
श्री महाकालेश्वर मंदिर की अद्वितीय और अलौकिक विशेषताएँ
काल का नियंत्रण करने वाला दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग विश्व के समस्त 12 ज्योतिर्लिंगों में उज्जैन के महाकालेश्वर ही एकमात्र ऐसे देव हैं जो दक्षिणमुखी विराजमान हैं। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को मृत्यु के देवता यमराज की दिशा माना गया है, और भगवान शिव यहाँ 'महाकाल' के रूप में इस दिशा के अधिपति हैं। ऐसी मान्यता है कि दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही भक्त अकाल मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ब्रह्मांडीय विज्ञान और पृथ्वी का नाभि केंद्र उज्जैन का यह पावन धाम केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय विज्ञान का भी केंद्र है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, महाकाल मंदिर को पृथ्वी का नाभि स्थल माना जाता है। यहाँ से कर्क रेखा गुजरती है, जिसके कारण प्राचीन काल से ही इस स्थान को समय की गणना का मुख्य केंद्र माना गया है। यही कारण है कि शिव यहाँ 'महाकाल' बनकर समय और मृत्यु दोनों पर शासन करते हैं।
तीन लोकों का प्रतीक: त्रितल मंदिर संरचना महाकालेश्वर मंदिर का स्थापत्य अत्यंत भव्य और रहस्यमयी है, जो तीन खंडों में विभाजित है। मंदिर के सबसे निचले हिस्से यानी पाताल में स्वयं महाकालेश्वर विराजमान हैं। मध्य खंड में भगवान ओंकारेश्वर का वास है, जो पृथ्वी लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, सबसे ऊपरी तल पर भगवान नागचंद्रेश्वर की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसके दर्शन भक्तों के लिए साल में केवल एक बार नागपंचमी के दिन ही सुलभ होते हैं।
भस्म आरती: जीवन और मृत्यु के चक्र का जीवंत दर्शन मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा यहाँ की भस्म आरती है, जो दुनिया भर में कहीं और नहीं होती। ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली इस आरती में भगवान महाकाल को ताज़ा भस्म अर्पित की जाती है। यह प्रक्रिया इस सत्य का बोध कराती है कि यह शरीर अंततः भस्म होना है, लेकिन आत्मा अमर है। भस्म की राख से भगवान का श्रृंगार होने के बाद, शंख और डमरू की ध्वनि भक्तों को एक अलग ही लोक में ले जाती है।
उज्जैन के राजा और शाही सवारी की परंपरा उज्जैन में महाकाल को केवल एक देवता नहीं, बल्कि यहाँ का राजा माना जाता है। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि उज्जैन का असली शासक कोई और नहीं बल्कि महाकाल हैं। यही कारण है कि विशेष अवसरों पर बाबा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं, जिसे शाही सवारी कहा जाता है। इस दौरान पूरा उज्जैन शहर अपने राजा के स्वागत में पलकें बिछाए खड़ा रहता है।