Chanakya Niti: मित्र से नहीं खाएंगे धोखा,अगर याद रख लेंगे चाणक्य की यह नीति...

Update: 2023-06-07 08:35 GMT

Chanakya Niti : आचार्य चाणक्य, एक ऐसे प्रकांड विद्वान और कूटनीतिज्ञ थे, जिनके ज्ञान के आगे आज भी आम इंसान नतमस्तक है। वो दौर अलग था। आज का वक्त, परिस्थितियां कुछ अलग हैं। बावजूद इसके उनके दिए सूत्रों का सार यदि समझ लिया तो आज के दौर में भी चाल, घात- प्रतिघात यानी जानबूझकर चोट और नुकसान पहुंचाने वाले लोगों से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं, हमें अपने पारिवारिक जीवन को समझने और बेहतर बनाने की एक दृष्टि भी मिलती है। यही वो बात है जो हमें चाणक्य को समझने के लिए प्रेरित करती है। इसके लिए केवल आपको चाणक्य को पढ़ना है। जो विचार अपने जीवन के लिए आपको उपयोगी लगते हैं उनके हिसाब से अपने 'मन को प्रशिक्षित' करना है। निस्संदेह 'जीवन' नाम के इस युद्ध को लड़ना आपके लिए आसान हो जाएगा।

आज बात मित्रता की, मित्र यानी कि जीवन का संबल, एक भरोसा, एक सहारा। हो सकता है कि आप अपने परिजनों से भी अधिक भरोसा किसी मित्र पर करते हों। चाणक्य कहते हैं कि मित्रता करने में कोई दोष नहीं, बस ज़रूरी यह है कि आप में परख हो, साथ ही अपना जीवन किसी के सामने खुली किताब की तरह न रखें, यह बात भी ध्यान में रखें।

चाणक्य लिखते हैं -

  • न विश्वसेत कुमित्रे च मित्रे चाsपि न विश्वसेत।
  • कदाचित कुपितं मित्रों सर्व गुह्यं प्रकाशयेत॥

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मित्रता करने में विशेष सावधानी की ज़रूरत है। आप अगर दैनिक व्यवहार में दोस्त के मन का खोट परख लें तो तत्काल उससे दूरी बना लें। क्योंकि कुमित्र पर तो आगे विश्वास करने का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि आज आप इसे छोटी- मोटी बात मानकर दोस्ती आगे बढ़ाएंगे तो कल को आपको भारी क्षति होना तय है।

यही नहीं, जिसे आप अपना विश्वस्त और बेहद करीबी मित्र समझते हैं, उस पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। जीवन परिस्थितियों के वश है। इसमें कभी भी ऐसा दौर आ सकता है कि जब आपका सबसे करीबी दोस्त भी आपसे नाराज़ हो जाए और धुर विरोधी बन जाए।

चाणक्य कहते हैं कि आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि ऐसा मित्र कितना घातक हो सकता है। उसके पास अगर आपके सारे राज़ हैं, अगर वह आपके सभी कमज़ोर पक्ष जानता है तो उसके लिए आपको मात देना या बर्बाद कर देना कठिन नहीं है। इसलिए अच्छे से अच्छे मित्र के सामने भी अपने पूरे जीवन को खोल कर न रख दें।

  • एक अन्य श्लोक में चाणक्य कहते हैं-
  • परोक्ष कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम।
  • वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम॥

आचार्य का मन्तव्य है कि जो मित्र मुंह पर भली-भली बातें करे और पीठ फिरते ही बुराई करे और आपके काम बिगाड़े, ऐसे दोस्त को तुरंत छोड़ देना चाहिए। ऐसा मित्र दरअसल ऐसे घड़े के समान है जिसके मुख पर तो दूध भरा है जिसे देखकर आपने घड़ा उठा लिया। पर असल में उस घड़े में केवल ऊपर ही दूध है, भीतर सिर्फ़ विष भरा है।

आशय स्पष्ट है कि दोस्ती करते समय आपका सचेत रहना बेहद ज़रूरी है वर्ना आप अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने का प्रबंध कर सकते हैं।

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