Murud Janjira kile ka itihas: इस किले को जीतने में अंग्रेजों और मराठों के छूट गए थे पसीने, जानिए कभी गुलाम न बनने वाले मुरुड जंजीरा किले का इतिहास
Murud Janjira kile ka itihas: क्या आपने कभी ऐसे प्राचीन किले के बारे में सुना है जो चारों ओर समुद्र के खारे पानी से घिरा हुआ है।
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Murud Janjira kile ka itihas: क्या आपने कभी ऐसे प्राचीन किले के बारे में सुना है जो चारों ओर समुद्र के खारे पानी से घिरा हुआ है। वैसे तो प्राचीन भारत की वास्तुकला को वर्तमान की वैज्ञानिक दुनिया भी समझ नहीं पाई है। ऐसा ही एक अभेद्य किला महाराष्ट्र में अरब सागर के बीच में स्थित है। किले का निर्माण और बाहरी संरचना इस तरह से बनाया गया है कि इसे कब्जा करने वाले 20 अलग-अलग शासको को खाली हाथ ही लौटना पड़ा था। इस किले को अपने राज्य में मिलाने की मंशा से आए अनेक आक्रमणकारियों को यहां सिर्फ समुद्र के खारे पानी के अलावा कुछ भी नहीं मिला और आज भी यह किला स्वतंत्र रुप से वहीं खड़ा हुआ है। चलिए जानते हैं इस अमर और अभेद्य किले का इतिहास।
मुरुड जंजीरा किले का इतिहास
यह किला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में आने वाले मुरुड तट से थोड़ी दूर अरब सागर में बना हुआ है। एक अंडाकार टापू में बनाया गया किला आज भी पूरे शान से खड़ा हुआ है। मुरुड जंजीरा किले के नाम का मतलब होता है सिद्दियों का द्वीप। उस समय सिद्दी एक समुदाय हुआ करता था जो यहां निवास करते थे। सर्वप्रथम इस द्वीप में रहने का कार्य राजापुरी के कोली मछुआरों के द्वारा किया गया था। पंद्रहवीं शताब्दी के आसपास जब समुद्र में अधिक मात्रा में लुटेरे बढ़ गए थे तब ये इसी टापू पर लकड़ी से किले बनाकर रहने लगे।
समुद्र के बीच किसी द्वीप पर लकड़ी के किले बनाना काफी अद्भुत कार्य था। इसी समय अहमदनगर के निजामशाही सुल्तान ने इस द्वीप पर कब्जा करना चाहा लेकिन कोली सरदार राजा रामराव ने इनके प्रस्तावों को ठुकरा दिया। फिर
पीराम खान, जो राजा के सेनापति थे उन्होंने धोखे से इस द्वीप के सारे लोगों को मरवा दिया। निजामशाही के बाद इस द्वीप का नियंत्रण सिद्दी सल्तनत के हाथों में चला गया। ये लोग इथियोपिया के मूल निवासी हुआ करते थे और मलिक अंबर नाम के एक शक्तिशाली रीजेंट ने 1567 ईस्वी में यहां बने लकड़ी के किलो को ध्वस्त कर पत्थर से किले बनाए गए थे। फिर 1621 में यह किला सिद्दीयो से निकलकर एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। जंजीरा
आज तक कोई नहीं जीत पाया यह किला
यह किला इसलिए भी सबसे खास है क्योंकि आज तक इसे कोई भी नहीं जीत पाया है। मुगल, पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और यहां तक की छत्रपति शिवाजी भी इस किले पर कब्जा नहीं कर पाए थे, इसलिए इन्होंने 1675 में इस किले के पास में ही एक और किला बनवाया जिसे पद्मदुर्ग कहते है। 22 एकड़ में फैला पद्मदुर्ग का निर्माण सिर्फ इसलिए किया गया था ताकि मुरुड जंजीरा किले पर हर समय नजर बनाई जा सके। फिर 1682 के आसपास संभाजी महाराज ने यह कोशिश किया लेकिन इसी समय मुगलों का रायगढ़ पर आक्रमण करने की वजह से इन्हें इस द्वीप ख्वाब छोड़ना पड़ा।
किले की स्थापत्य शैली
यह किला प्राचीन स्थापत्य कला का सबसे अनोखा उदाहरण है। इस किले का डिजाइन इस तरह से किया गया है कि यह हर समय किसी भी मौसम में दुश्मनों से लोहा ले सकती है। इस किले की दीवारों को 40 फीट ऊंचा बनाया गया है और साथ ही 19 बुर्ज यानी मीनारे भी बनाई गई है जहां से पूरे किले की सुरक्षा पर नजर रखी जाती थी। इस किले में 572 तोपों को तैनात किया गया था, जिसमें कलाल बांगड़ी, चावरी और लांडा कसम तोपें शामिल है। 22 टन वजनी इन तोपों की मारक क्षमता से हर आक्रमणकारी के पसीने छूट जाया करते थे। इस किले का मुख्य द्वार भी अदृश्य था जो सिर्फ तभी दिखाई देता था जब व्यक्ति 40 फीट की दूरी पर हो। इस दरवाजे की एक पहचान थी कि है राजापुरी की दिशा में ही खुलता था।
इस बात को जानने के बाद आप काफी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि यह किला पूरी तरह से अरब सागर के खारे पानी के बीच स्थित है फिर भी इस किले में 60 फीट गहरे दो मीठे पानी के तालाब बने हुए हैं। ये तालाब कई दिनों तक युद्ध के समय लोगों के लिए जल की पूर्ति करता है। समुद्र के खारे पानी के बीच में मीठे पानी का तालाब होना पूरी तरह से एक चमत्कारी घटना है। ऐसा भी माना जाता है कि इस किले के नीचे से 40 किलोमीटर दूर राजापुरी गांव तक एक सुरंग भी है जिसे आपातकाल के दौरान उपयोग किया जाता था। इस किले तक पहुंचने के लिए नाव का ही इस्तेमाल किया जाता है।