Akka Mahadevi ki kahani: निर्वस्त्र शिव भक्त अक्का महादेवी की कहानी; ऐसी शिव भक्ति आपने पहले कभी नहीं देखी होगी!
Akka Mahadevi ki kahani: भगवान महादेव और उनके भक्तों से जुड़ी कोई भी बात हमेशा रहस्यमयी और अनोखी होती है। हर युग में महादेव के अखंड भक्त पैदा होते रहे हैं और कई भक्तों को समाज ने बिल्कुल भी नहीं समझा जिस वजह से यह सभी परंपराओं को चुनौती देते हुए आध्यात्मिकता के मार्ग पर ही आगे बढ़े। कहते हैं कि मीरा, कृष्ण के भक्ति में इतनी लीन हो गई थी कि वह उन्हें अपना पति मानने लगी थी ठीक ऐसी ही एक शिव भक्त बारहवीं शताब्दी के आस पास हुई, जिसने भगवान शिव को अपना पति माना और पूरी तरह से सांसारिक मोह, यहां तक की अपने वस्त्रों को भी त्याग कर भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गई। आईए जानते हैं प्रसिद्ध शिव भक्त अक्का महादेवी की कहानी...
Akka Mahadevi ki kahani: भगवान महादेव और उनके भक्तों से जुड़ी कोई भी बात हमेशा रहस्यमयी और अनोखी होती है। हर युग में महादेव के अखंड भक्त पैदा होते रहे हैं और कई भक्तों को समाज ने बिल्कुल भी नहीं समझा जिस वजह से यह सभी परंपराओं को चुनौती देते हुए आध्यात्मिकता के मार्ग पर ही आगे बढ़े। कहते हैं कि मीरा, कृष्ण के भक्ति में इतनी लीन हो गई थी कि वह उन्हें अपना पति मानने लगी थी ठीक ऐसी ही एक शिव भक्त बारहवीं शताब्दी के आस पास हुई, जिसने भगवान शिव को अपना पति माना और पूरी तरह से सांसारिक मोह, यहां तक की अपने वस्त्रों को भी त्याग कर भगवान शिव की भक्ति में लीन हो गई। आईए जानते हैं प्रसिद्ध शिव भक्त अक्का महादेवी की कहानी...
अक्का महादेवी का प्रारंभिक जीवन
सन 1130 के आसपास कर्नाटक के शिवमोगा जिले के उदुतड़ी नामक स्थान पर एक असाधारण बालिका का जन्म हुआ। यही बालिका आगे चलकर शिव की सबसे बड़ी भक्त बनी। महादेवी के अंदर शिव भक्ति उसके पिता निर्मलशेट्टी और माता सुमति से आई थी, क्योंकि ये दोनों भी भगवान शिव के उपासक थे। बचपन से ही महादेवी भगवान शिव की पूजा करती व आरती करती थी। धीरे-धीरे शिव भक्ति इतनी बढ़ी की वह शिव को अपना पति मानने लगी और शिवजी के चेन्न मल्लिकार्जुन स्वरूप पर अत्यंत मोहित हो गई।
16 की उम्र में संतो जैसा व्यवहार
किशोरावस्था में अक्सर बच्चे सांसारिक चीजों में डूबे रहते हैं लेकिन महादेवी ऐसी नहीं थी वह इस उम्र में संतों की तरह व्यवहार करती थी। उसका पूरा समय चेन्न मल्लिकार्जुन के बारे में सोचते हुए ही बीतता था। महादेवी स्वयं भी एक काफी सुंदर स्त्री थी। इसकी सुंदरता और आध्यात्मिकता पर मोहित होकर इस क्षेत्र के राजा कौशिक ने महादेवी से विवाह कर लिया। लेकिन महादेवी तो अपने पूरे मन से चेन्न मल्लिकार्जुन को ही अपना पति मान चुकी थी। ऐसे में राजा और उसका साथ ज्यादा दिन तक नहीं चला और वे अलग हो गए।
महादेवी का कठोर त्याग
राजा ने महादेवी से इस शर्त पर विवाह किया था कि विवाह के बाद उसके परिवार और उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाएगा और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी ली जाएगी। लेकिन जब महादेवी राजा से अलग होकर जा रही थी तभी राजा ने दावा किया कि महादेवी के पास जो कुछ भी है वह सब राजा का है, यहां तक की उसके पहने हुए वस्त्र भी। राजा को लगा की महादेवी को ऐसा कहने पर वह काफी शर्मिंदा महसूस करेगी लेकिन इतना सुनते ही महादेवी ने अपने सारे वस्त्र और आभूषण वहीं उतार कर रख दिए और ऐसा कहते हैं कि उसने अपने बालों से पूरे शरीर को ढंक लिया। भरी सभा में दिगंबर साधुओं की तरह अपने आप को निर्वस्त्र कर लेना, यह एक शक्तिशाली सामाजिक और अध्यात्मिक संदेश था।
राजमहल छोड़ने के बाद की यात्रा
राजमहल छोड़ने के बाद महादेवी अन्य संतों की तरह यात्राएं करने लगी। वह महान साधु, संतों और गुरुओं की खोज में निकली। वह अपने यात्रा के दौरान बीदर जिले में बसवकल्याण नाम के स्थान पर पहुंची जहां एक मंटप स्थापित किया गया था। मंटप वह स्थान होता है जहां कई प्रसिद्ध दार्शनिक और आध्यात्मिक व्यक्ति चर्चाएं और विचार विमर्श करते हैं। इस मंटप की अध्यक्षता महान संत अल्लम प्रभु करते थे।
जब महादेवी अपनी नग्न अवस्था में मंटप पहुंची तो संत अल्लम प्रभु द्वारा उसकी योग्यता की कई परीक्षाएं ली गई, जिसमें उसने सभी संतों का भरोसा जीत लिया और संतों ने उसे मंटप में शामिल होने की अनुमति दे दी। इसी अनुभव मंटप के संतों ने महादेवी को अक्का शब्द से संबोधित किया था। कन्नड़ भाषा में अक्का का अर्थ होता है बड़ी बहन और इसी समय से ही महादेवी, अक्का महादेवी के नाम से प्रसिद्ध हो गई। अक्का महादेवी ने लगभग 430 वचनों की एक साहित्य भी लिखी, जो कन्नड़ भाषा में है। इसके साथ ही इसने मंत्रोगोप्य और योगांगत्रिविधि नामक दो महत्वपूर्ण ग्रंथों की भी रचना की, यह ग्रंथ मंत्र साधकों के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
महादेवी का अंतिम जीवन
मंटप में अपना कुछ समय व्यतीत करने के बाद महादेवी आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम की ओर प्रस्थान कर गई। यह स्थान प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन के लिए विश्व विख्यात है। यहां पहुंच कर मंदिर के पास ही कदली वन की गुफाओं में महादेवी ने अपनी तपस्या आरंभ कर दी। कहते हैं कि भगवान शिव इसी गुफा में स्वयं महादेवी को दर्शन दिए थे और दर्शन पाते ही महादेवी, भगवान शिव में विलीन हो गई। आज भी महादेवी की वह गुफा श्रीशैलम के नल्लामाला पहाड़ियों में अपनी पूरी आध्यात्मिकता के साथ स्थित है। इस गुफा तक कृष्णा नदी को नाव द्वारा ही पार करके पहुंचा जा सकता है।