Tribal's unique tradition "Ancestors spirit home" : अबूझमाड़, जहाँ पूर्वजों की आत्माएं बसती हैं हांडियों के अंदर, बनता है उनके लिए अलग घर, जानें आदिवासियों की इस अनोखी परंपरा के बारे में
NPG DESK
अबूझमाड़ वाकई अबूझ है। यहाँ आदिवासी समाज ऐसी-ऐसी परंपराओं का पालन करता है, जिसके बारे में जानकर आप हैरत में पड़ जाएंगे। ऐसी ही एक परंपरा है आना कुड़मा की। आदिवासी अपने बुजुर्गों के गुज़र जाने के बाद उनकी आत्माओं को हांडी में सहेज कर गांव में बने एक घर में रखते हैं। चाहे पहली फसल हो या शादी का निमंत्रण, सबसे पहले आना कुड़मा यानि पूर्वजों के घर में उसे चढ़ाया जाएगा, पूजा-पाठ होगा, उसके बाद ही कुछ और होगा। आदिवासी मानते हैं कि ऐसा कर वे अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लेते हैं और गांव पर विपदा नहीं आती। आइए जानते हैं इस परंपरा के बारे में।
*क्या है आना कुड़मा -
आना कुड़मा गोंडी भाषा का शब्द है। आना यानि आत्मा और कुड़मा यानि घर। इसलिए इसे समझें "आत्माओं का घर"। खासकर नारायणपुर और अबूझमाड़ में गांवों के किनारे आपको ऐसे आना कुड़मा आसानी से देखने मिल जाएंगे। मंदिरनुमा इन घरों के भीतर आपको बहुत सारे मृदभांड लटके हुए नज़र आएंगे। इन हांडियों के अंदर आदिवासी अपने दादा-परदादा, माता-पिता का 'जीव' सुरक्षित रखते हैं। इन सुरक्षित जीवों यानि आत्माओं के प्रति आदिवासियों में बहुत आदर भाव है। इन आना कुड़मा में आदिवासी अपने पित्रृ देव का आवास मानते हैं और उनकी अवहेलना को दंडनीय भी।
*आत्माओं की संयुक्त शक्ति होती है असीमित
आदिवासी कहते हैं कि एक स्थान पर सुरक्षित इन आत्माओं की शक्ति असीमित होती है। इसलिए बुरी आत्माओं और शक्तियों का नाश कर वे अपने वंशजों की रक्षा करते हैं। आदिवासी पितर नहीं मानते लेकिन पूर्वजों को बड़े आदरभाव से पूजते हैं। सालभर इनकी पूजा होती है।और त्योहारों पर विशेष पूजा भी। आदिवासी मानते हैं कि आत्मा में ही परमात्मा का वास है। इसलिए वे अपने पूर्वजों की आत्मा को पूजते हैं। कोई भी शुभ कार्य हो, शादी की कोई भी रस्म हो, पहला निमंत्रण आना कुड़मा में जाकर ही दिया जाता है। नई फसल भी सबसे पहले आना कुड़मा में अर्पित की जाती है, उससे पहले फसल का उपयोग वर्जित है।
*और यदि भूल हो जाए तो?
अगर भूलवश कोई भी आदिवासी परिवार पहला निमंत्रण आना कुड़मा में न दे, तो इसे अशुभ का सूचक माना जाता है। जिसके कारण गाँव पर विपत्ति आ सकती है। इसके बचाव के लिए ग्रामवासी मिलकर "गायता" के पास जाते हैं। गायता को आदिवासियों का पुजारी मान सकते हैं। गायता के समक्ष भूल स्वीकार की जाती है। फिर वह पूजा-पाठ के द्वारा पूर्वजों से क्षमा याचना करवाता है, उसके बाद ही शुभ कार्य की विधिवत शुरुआत होती है।
* महिलाओं का प्रवेश वर्जित है यहाँ
आना कुड़मा में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है। इस बात को लेकर आदिवासी कट्टर हैं। महिलाओं और युवतियों के कदम भी आना कुड़मा में नहीं पड़ने चाहिए।
आदिवासियों की संस्कृति और परंपराएं बेहद खास और अनोखी हैं। अबूझमाड़ के आदिवासियों की यह परंपरा पूर्वजों के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती है। आना कुड़मा में अपने पित्रृदेव को स्थापित कर, पूर्वजों की आत्माओं को सुरक्षित कर, उन्हें यथोचित सम्मान दे कर वे जाने कितने ही दशकों और पीढ़ियों से गाँव की रक्षा के लिए जतन करते आ रहे हैं।