Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पति-पत्नी की कलह को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता, ट्रायल कोर्ट के फैसले को किया रद्द

Bilaspur High Court : हाई कोर्ट ने कहा- पति-पत्नी के बीच विवाद या सामान्य कलह को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है.

Update: 2026-02-16 05:12 GMT
npg.news

High Court News: बिलासपुर, बिलासपुर हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306 आईपीसी) के आरोप निचली अदालत द्वारा सुनाई गई 4 साल की सजा को निरस्त कर दिया है. जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसाने के आवश्यक साक्ष्य साबित करने में असफल रहा है.

मामला जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा थाना क्षेत्र का है. बसंत कुमार सतनामी के खिलाफ आरोप था कि पत्नी टिकैतिन बाई ने विवाह के करीब चार वर्ष बाद प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी. ट्रायल कोर्ट (द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, एफटीसी जांजगीर) ने 31 जुलाई 2007 को आरोपी को धारा 306 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए 4 वर्ष का सश्रम कारावास और 500 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.

ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी. हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण अज्ञात बताया गया है. डॉक्टर ने गवाही में स्वीकार किया कि मृत्यु का कारण उल्टी-दस्त से हुई. एस्फिक्सिया भी हो सकता है. FSL रिपोर्ट पेश नहीं की गई.

गवाहों के बयान विरोधाभास रहे. कुछ गवाह ने जहर, कुछ ने शराब सेवन और कुछ गवाहों ने उल्टी-दस्त से मौत की बात कही. मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, केवल पति-पत्नी के बीच विवाद या सामान्य कलह को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता, जब तक कि स्पष्ट रूप से उकसाने या साजिश का प्रमाण न हो.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा और प्रत्यक्ष उकसाने का प्रमाण आवश्यक है. मात्र प्रताड़ना या पारिवारिक विवाद पर्याप्त नहीं हैं. हाई कोर्ट ने कहा कि, अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि मृतका की मौत आत्महत्या थी या आरोपी ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया. ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है. अदालत ने आरोपी को बरी करते हुए उसकी सजा रद्द कर दी.

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