घोर नक्सल इलाका, टीन की छत, घर के बाहर जंगली जानवरों का खतरा, फिर भी नहीं रुकी चिकित्सा सेवाएं! जानिए CG के डॉक्टर दंपत्ति की प्रेरणादायक कहानी...
Dr. Godbole inspiring story: साल 2026 का पद्मश्री पुरस्कार जब दिया जा रहा था तो उस लिस्ट में छत्तीसगढ़ के एक डॉक्टर दमपत्ती का नाम भी शामिल था– डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता ताई गोडबोले। इनके परिश्रम की कहानी सुनकर आपको यह लगेगा कि पद्मश्री पुरस्कार इनके सामने कुछ भी नहीं है।
Dr. Godbole inspiring story: साल 2026 का पद्मश्री पुरस्कार जब दिया जा रहा था तो उस लिस्ट में छत्तीसगढ़ के एक डॉक्टर दमपत्ती का नाम भी शामिल था– डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता ताई गोडबोले। इनके परिश्रम की कहानी सुनकर आपको यह लगेगा कि पद्मश्री पुरस्कार इनके सामने कुछ भी नहीं है। इन दंपतियों ने छत्तीसगढ़ के घोर नक्सली इलाकों में अपनी अमूल्य चिकित्सा सेवाएं देकर लोगों को कई बीमारियों से छुटकारा दिलाया है। सोचिए यदि आप डॉक्टर होते तो शहर में एक अच्छी लाइफस्टाइल जीना पसंद करते लेकिन इन दोनों ने बारसूर के दो कमरे वाले मकान में रहकर जहां छत भी टीन की और चारों तरफ घना जंगल चिकित्सा सेवाएं दी। इन इलाकों में मरीजों तक एंबुलेंस पहुंचना तो दूर की बात है सामान्य सर्दी बुखार की गोली भी इन्हें नहीं मिलती। आइए जानते हैं इन डॉक्टर दंपतियों का बस्तर क्षेत्र में अमूल्य योगदान।
डॉक्टर गोडबोले का प्रारंभिक जीवन
डॉ रामचंद्र का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। अपनी चिकित्सा के क्षेत्र में रुचि के वजह से उन्होंने आयुर्वेदिक एवं शल्य चिकित्सा में औपचारिक शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके मन में अपनी डिग्री को लेकर सिर्फ धन कमाने की आशा नहीं थी बल्कि वे अपने ज्ञान को समाज के कल्याण में लगाना चाहते थे। शुरुआत में वे वनवासी कल्याण आश्रम (Vanvasi Kalyan Ashram) से जुड़े और इन्हें नासिक जिले के कनाशी गांव में रहने वाले भील जनजाति के लोगों को स्वास्थ्य उपचार देने के लिए भेजा गया। फिर अपने 28 वर्ष की आयु में डॉ रामचंद्र छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले आए जहां इन्हें बारसूर स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया। नक्सल हिंसा से ग्रसित इस क्षेत्र में स्वास्थ्य केंद्र के नाम पर लंबे समय से बंद पड़ा एक खाली कमरा इनका इंतजार कर रहा था।
डॉ रामचंद्र के जीवन में होती है सुनीता ताई की एंट्री
जैसे ही वनवासी कल्याण आश्रम ने इन्हें छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में भेजा तो सबसे पहले यह सुझाव दिया कि वे विवाह कर ले। पुणे की डॉक्टर सुनीता भी वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ी हुई एक सामाजिक कार्यकर्ता थी। इन्हें भी आश्रम द्वारा रायगढ़ जिले में स्थित जाँभिवली स्वास्थ्य केंद्र पर भेजा गया था। इसी दौरान इन दोनों की मुलाकात होती है और ये विवाह भी कर लेते हैं। जैसे कि ये दोनों एक ही संगठन से जुड़े हुए व्यक्ति थे और उनके लक्ष्य भी समान थे इसलिए विवाह के मात्र दो सप्ताह में ही बस्तर क्षेत्र पहुंच कर सेवाएं प्रारंभ कर देते हैं।
डॉक्टर दंपत्तियां स्वयं जाकर करते थे इलाज
बस्तर जैसे सुदूर इलाकों में यदि एंबुलेंस की सुविधा भी उपलब्ध करा दी जाए तो वह सभी गांवो तक नहीं पहुंच सकती ऐसे में इन दोनों डॉक्टरों ने स्वयं गांव गांव जाकर लोगों का इलाज प्रारंभ किया। शुरुआत में आदिवासी भौतिक चिकित्सा पर विश्वास नहीं करते और वे अपने पारंपरिक तरीके बैगा गुनिया का सहारा लिया करते थे। डॉक्टर गोडबोले बताते हैं कि आदिवासियों में शहर और आर्थिक भय इतना है कि वे डॉक्टर को क्लिनिक तक बुलाने भी नहीं जाते थे बल्कि जंगलों में आग लगाकर धुएं से इशारा दिया जाता था और इसी धुएं के माध्यम से डॉक्टर उन तक पहुंचते थे।
सन 2002 में छोड़ना पड़ा बस्तर
डॉ रामचंद्र को सन 2002 में कुछ कारणों से वापस सतारा लौटना पड़ा था इस दौरान उन्होंने विक्रमगढ़ क्षेत्र में रहकर अपना कार्य किया लेकिन अब भी बस्तर के प्रति उनका समर्पण बना हुआ था। सन 2010 में वे फिर से बस्तर पहुंचे इस बार 108 एम्बुलेंस जैसी थोड़ी सरकारी सुविधाएं बढ़ चुकी थी लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पूरी तरह फायदा नहीं दिख रहा था। सन 2012 में डॉक्टर साहब ने एक जगह पर रहकर चिकित्सा सेवा को समाप्त कर दिया और एक ऐसी पहल की शुरुआत की जिससे लोगों तक उपचार आसानी से पहुंचा जा सका। उन्होंने एक ऐसा नियम बनाया जिसमें वे हर महीने तीन बार, एक दिन एक गांव और सुबह 11:00 से अंतिम मरीज़ तक इलाज किया करते थे।
इन दंपतियों ने बस्तर क्षेत्र में स्कूलों और प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से लोगों को प्राथमिक उपचार की जानकारी देना शुरू किया। इन्होंने आरोग्य मित्र मंडल की स्थापना की जिसमें अब तक 65 से भी अधिक जनजाति युवा प्रशिक्षित हो चुके हैं। डॉक्टर सुनीता ने भी अपने अनुभवों के इस्तेमाल से आदिवासी महिलाओं को सशक्त और आत्मनिर्भर करने का प्रयास किया। डॉक्टर गोडबोले यह चाहते हैं कि बस्तर क्षेत्र में शत प्रतिशत लोगों को टीबी और एनीमिया से मुक्ति दिला पाए। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी उनके इस लक्ष्य की सराहना की और भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्मश्री (Padma Shri 2026) से नवाजा गया।