Raipur Sahitya Utsav: छत्तीसगढ़ की माटी ने दिया शब्दों को राष्ट्रीय स्वर... साहित्य, समाज, राजनीति, सिनेमा, पत्रकारिता, लोकभाषा, रायपुर साहित्य उत्सव में संविधान और तकनीक पर 3 दिनों में 42 सत्र

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा किए गए उद्घाटन ने उत्सव के वैचारिक स्वर को स्पष्ट कर दिया। यह आयोजन केवल मनोरंजन या औपचारिकता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि साहित्य की सामाजिक भूमिका और राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी पर गंभीर संवाद करेगा

Update: 2026-03-03 13:35 GMT

Raipur Sahitya Utsav: रायपुर। छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा लंबे समय तक अपनी जड़ों में मजबूत रही, लेकिन मंच की तलाश में रही। नवा रायपुर अटल नगर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में 23 से 25 जनवरी तक आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव ने उस प्रतीक्षा को स्वर दिया। यह आयोजन केवल कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी से उठती उस चेतना का उत्सव था, जिसने देश और दुनिया के विचारकों को एक साझा संवाद में आमंत्रित किया। तीन दिनों तक पुरखौती मुक्तांगन केवल एक सांस्कृतिक स्थल नहीं रहा। वह विचार, संवेदना, विमर्श और रचनात्मक ऊर्जा का खुला विश्वविद्यालय बन गया।

साहित्य, समाज, राजनीति, सिनेमा, पत्रकारिता, लोकभाषा, संविधान और तकनीक जैसे विषयों पर केंद्रित 42 सत्रों ने इस परिसर को विचारों की प्रयोगशाला में बदल दिया। देश और प्रदेश के लगभग 120 लेखक, कवि, बुद्धिजीवी और साहित्य प्रेमी इस संवाद का हिस्सा बने। तीन दिनों का रायपुर साहित्य उत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का विस्तार साबित हुआ। रायपुर साहित्य उत्सव ने यह साबित किया कि शासन व्यवस्था ढांचा दे सकती है, लेकिन समाज को दिशा देने का काम साहित्य करता है। यह उत्सव छत्तीसगढ़ की माटी से उठे शब्दों का वह संगम था, जिसने स्थानीय को राष्ट्रीय और राष्ट्रीय को मानवीय चेतना से जोड़ दिया।

उत्सव का वैचारिक स्वर

राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा किए गए उद्घाटन ने उत्सव के वैचारिक स्वर को स्पष्ट कर दिया। यह आयोजन केवल मनोरंजन या औपचारिकता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि साहित्य की सामाजिक भूमिका और राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी पर गंभीर संवाद करेगा। मुख्यमंत्री साय ने स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य और पत्रकारिता की भूमिका को रेखांकित करते हुए छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को गर्व के साथ सामने रखा। पहले दिन शाम सात बजे पद्मश्री से सम्मानित अभिनेता मनोज जोशी द्वारा प्रस्तुत नाटक चाणक्य ने पूरे उत्सव को गहरी वैचारिक ऊर्जा दी। यह मंचन केवल ऐतिहासिक पात्र की प्रस्तुति नहीं था, बल्कि सत्ता, नीति, नैतिकता और समय के प्रश्नों से सीधा संवाद था। दर्शक दीर्घा में बैठा हर व्यक्ति केवल नाटक नहीं देख रहा था, वह अपने वर्तमान से सवाल कर रहा था।

रचनाओं, विमर्शों से सजा साहित्यिक मंच

इस उत्सव के मंडप केवल अस्थायी संरचनाएं नहीं थे, वे साहित्यिक स्मृति के प्रतीक बने। मुख्य मंडप ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल के नाम पर रहा। अन्य मंडप पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी और अनिरुद्ध नीरव के नाम पर स्थापित किए गए। यह नामकरण छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा को वर्तमान से जोड़ने का सशक्त प्रयास था। 24 जनवरी को भारत रत्न स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में आयोजित काव्य पाठ ने उत्सव को भावनात्मक ऊंचाई दी। डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, अजय सहाब, अमन अक्षर, डॉ. अंशु जोशी, त्रिलोकचंद्र महावर, हर्षराज हर्ष, डॉ. अजय पाठक और राहुल अवस्थी की रचनाओं में राष्ट्रबोध, करुणा और वैचारिक स्पष्टता एक साथ दिखाई दी। लेखिका और पत्रकार शिखा वार्ष्णेय, कवि कमलेश कमल, डॉ. गोपाल कमल और डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र की प्रस्तुतियों ने साहित्यिक सत्रों को गहराई दी। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के संचालक विकास दवे, लेखक अजय के. पांडे, उपन्यासकार इंदिरा दांगी, लेखिका सोनाली मिश्र, विदुषी जयश्री रॉय, डॉ. कायनात काज़ी और अनिल पांडेय जैसे वक्ताओं ने समकालीन साहित्य की विविध धाराओं को मंच पर रखा।

लोकभाषा, विचार, संविधान और समकालीन प्रश्न

वर्धा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा, मुकुल कानिटकर, डॉ. भारत भास्कर, डॉ. संजय द्विवेदी, डॉ. गुरु प्रकाश पासवान और डॉ. अंशु जोशी के सत्रों ने शिक्षा, लोकतंत्र और भारतीय चेतना पर गहन विमर्श को जन्म दिया। डिजिटल युग और एआई पर केंद्रित सत्रों में साहित्य की बदलती भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई। पत्रकारिता, सिनेमा और टेलीविजन पर हुए सत्रों में अनुराग बसु, मनोज वर्मा, रुबिका लियाकत और हर्षवर्धन त्रिपाठी ने समकालीन मीडिया के प्रश्नों को सामने रखा। छत्तीसगढ़ी कविता और लोकगीतों के सत्र इस उत्सव की आत्मा बने। रामेश्वर वैष्णव, रामेश्वर शर्मा, मीर अली मीर और शशि सुरेंद्र दुबे की कविताओं में गांव, स्मृति, हास्य और सामाजिक सरोकार एक साथ उपस्थित रहे। लोकगीत सत्र में डॉ. पी.सी. लाल यादव, शकुंतला तरार, बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक की प्रस्तुतियों ने लोकजीवन की सांस्कृतिक परतों को उजागर किया।

किताबों के बीच लौटता पाठक समाज

साहित्य उत्सव का एक सशक्त दृश्य वह था, जब हजारों लोग बुक स्टॉल्स के बीच अपनी पसंदीदा किताबें तलाशते दिखे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही 10 हजार से अधिक साहित्य प्रेमियों का पंजीकरण यह संकेत दे गया था कि डिजिटल शोर के बीच भी किताबों की दुनिया अपनी जगह बनाए हुए है। प्रकाशकों की उपस्थिति और पाठकों की उत्सुकता ने साहित्य बाजार की जीवंतता को रेखांकित किया।

समाज और सिनेमा विषय पर केंद्रित रोचक परिचर्चा में उमड़ी श्रोताओं की भीड़

रायपुर साहित्य उत्सव के अंतर्गत समाज और सिनेमा विषय पर केंद्रित परिचर्चा को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रोता अनिरुद्ध नीरव मंडप में पहुंचे, जिसमें हिंदी सिनेमाजगत के प्रसिद्ध लेखक-निर्देशक अनुराग बसु, इतिहासकार-पटकथा लेखक एवं निर्माता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी और सिनेमा लेखक अनंत विजय ने हिस्सा लिया। परिचर्चा के सूत्रधार छत्तीसगढ़ के जाने-माने लेखक-निर्देशक मनोज वर्मा रहे।

हिंदी सिनेमाजगत के निर्देशक अनुराग बसु ने परिचर्चा में भाग लेते हुए सिनेमा को एक ऐसा औजार बताया, जो बिगड़े हुए समाज को शेप दे सकता है। उन्होंने कहा कि लोग रिस्क लेकर ऐसे सिनेमा बनाते हैं। अगर हम सिनेमा से सामाजिक सरोकार की अपेक्षा करते हैं, तो बहुत से लेखक-निर्देशक आज भी इस दायित्व को निभाते आ रहे हैं।

बसु ने कहा कि 90 के दशक में जितने सिनेमा बनते थे, आज भी उतने ही बनते हैं, बल्कि फिल्मों की संख्या और अधिक है। आज सिनेमा के पास ज्यादा टेक्नोलॉजी है, लेकिन कहानियां भी वही हैं। अब नई कहानियां सामने आ रही हैं, नए विषयों पर फिल्में बन रही हैं। हम यदि किसी लेखक-निर्देशक की बनाई किसी फ़िल्म को अच्छा या बुरा कहते हैं, तो यह हमारा व्यक्तिगत विचार है, क्योंकि उसने पूरी ईमानदारी से फ़िल्म बनाई है और उसके हिसाब से वह फ़िल्म अच्छी बनी है। बसु ने आगे कहा कि हम जब भी फ़िल्मों की बात करते हैं, तो पसंद-नापसंद की बात अपने आप ही सामने आ जाती है। उन्होंने फ़िल्मों को समाज का जरूरी हिस्सा बताया।

परिचर्चा में अपने संबोधन के दौरान डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि आज फ़िल्म के हिट और फ्लॉप होने की बात अधिक होती है। सिनेमा को देखने का मापदंड बदल गया है। सिनेमा का सामाजिक सरोकार नहीं रहा। सिनेमा आपके प्रश्नों को तभी उठाएगा, जब उससे सिनेमा को बड़ा लाभ होगा। सिनेमा का दौर बदल रहा है।

द्विवेदी ने कहा कि आज के समय में आप चाणक्य नहीं बना सकते। हिंदी सिनेमा में हिंदी का स्तर कहां तक पहुंचा है, यह एक बड़ी चुनौती है। सभी सिनेमा को सरल करने की बात करते हैं, हिंदी में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग होता है। उन्होंने अपने अनुभव से जोड़ते हुए बताया कि बायोग्राफी भी उन्हीं पर बन रही हैं, जिनसे बड़े फायदे हों। उन्होंने उपनिषद गंगा सीरियल का उल्लेख करते हुए बताया कि उपनिषद गंगा में बहुत गंभीर काम है, जबकि चाणक्य में उस समय की सच्चाई दिखाई देती है।

इस सत्र पर सिनेमा लेखक अनंत विजय ने कहा कि सिनेमा कोई एलाइट माध्यम नहीं है। जब तक हम फ़िल्म नहीं देखते, तब तक चर्चा नहीं होती। आजकल लोग फ़िल्म देखते नहीं, सिर्फ चर्चा करते हैं। प्रेम में वैज्ञानिकता नहीं ढूंढी जाती। फ़िल्मों की कहानी और पात्रों से लोग भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं। यही जुड़ाव फ़िल्मों की कॉमर्शियल और सोशल वैल्यू तय करता है।



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