Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, पत्नी की गलतियों को माफ करने और साथ-साथ रहने के बाद पुराने आरोपों के आधार पर नहीं मांग सकते तलाक

Bilaspur High Court: बिलासपुर हाई कोर्ट ने विवाह विच्छेद तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, दहेज प्रताड़ना के केस से बरी होने के बाद पति-पत्नी सात साल तक साथ-साथ रहे, पत्नी की गलतियों को पति ने माफ कर दिया। इसके बाद फिर तलाक नहीं मांग सकते। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने परिवार न्यायालय के फैसले को रद्द करने के साथ ही पत्नी की याचिका को स्वीकार कर लिया है।

Update: 2026-01-21 06:22 GMT

Bilaspur High Court: बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट ने विवाह विच्छेद तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, दहेज प्रताड़ना के केस से बरी होने के बाद पति-पत्नी सात साल तक साथ-साथ रहे, पत्नी की गलतियों को पति ने माफ कर दिया। इसके बाद फिर तलाक नहीं मांग सकते। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने परिवार न्यायालय के फैसले को रद्द करने के साथ ही पत्नी की याचिका को स्वीकार कर लिया है। बता दें कि विवाह के तकरीबन पांच साल बाद पत्नी ने पति पर दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। पति को कानूनी लड़ाई का सामना करना पड़ा था।

तलाक की मांग को लेकर पति द्वारा दायर याचिका की सुनवाई जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल के डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि पत्नी द्वारा केस दर्ज कराने और प्रकरण से बरी होने के बाद पति-पत्नी लंबे समय तक साथ-साथ रह चुके हैं। ऐसी परिस्थितियों में पुराने आरोप को सामने रखकर,इस आधार पर तलाक मांगना स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस तरह के तर्कों और आधार पर तलाक की याचिका मंजूर नहीं की जा सकती। डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि पति-पत्नी के लंबे समय तक साथ-साथ रहने से इस तरह के मामलों में क्रूरता या फिर अवैध संबगंध जैसे आरोपों को माफ माने जाएंगे। डिवीजन बेंच ने इन टिप्पणियों के साथ जांजगीर फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। बता दें कि पति की याचिका पर सुनवाई के बाद जांजगीर परिवार न्यायालय ने तलाक की डिक्री को मंजूरी दे दी थी। परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए पत्नी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

क्या है मामला

जांजगीर-चांपा और बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में रहने वाले दंपति की शादी वैदित रीति रिवाज से 2 जून 2003 को हुई थी। विवाह के तकरीबन पांच साल बाद पति-पत्नी के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया। नाराज पत्नी ने वर्ष 2008 में पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए पहले थाने में शिकायत दर्ज कराई और फिर आईपीसी की धारा 498-ए के तहत न्यायालय में केस दर्ज करा दिया। दहेज प्रताड़ना के मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने पति को बरी कर दिया अदालत से बरी होने के बाद 2010 में पति की शिक्षक के पद पर नौकरी लग गई। नौकरी लगने के बाद पति ने पत्नी की गल्तियों को माफ करते हुए साथ-साथ रहने लगे। वर्ष 2010 से 17 दिसंबर 2017 तक पति-पत्नी साथ-साथ रहे। साथ-साथ रहने के दौरान ही पति ने परिवार न्यायालय में मामला दायर कर पत्नी पर शारीरिक और मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की। पति ने पत्नी पर चारित्रिक आरोप लगाते हुए कहा कि विवाह के बाद किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध बनाए,इससे उसे मानसिक आधात पहुंचा है। उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। पति द्वारा लगाए गए आरोपों को गंभीरता से लेते हुए फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1) (i) और 13(1) (ia) के तहत तलाक की डिक्री पारित कर दी।

परिवार न्यायालय के फैसले को पत्नी ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए पत्नी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा कि पति ने उसकी गलती को माफ कर दिया था और हम दोनों साथ-साथ रह रहे हैं। इस बीच उसने 2017 के कथित अवैध संबंधों को आधार बनाते हुए विवाह विच्छेद को लेकर परिवार न्यायालय में याचिका दायर किया था। याचिकाकर्ता पत्नी ने पति के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, उसने दूसरे पुरुष से कभी संबंध स्थापित ही नहीं किया। आरोप पूरी तरह झूठ है। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा,धारा 23 (1) (d) के तहत बिना उचित कारण के इसस तरह का विलंब तलाक के आधार को कमजोर करती है। परिवार न्यायालय में पति ने याचिकाकर्ता पत्नी पर जो आरोप लगाए वह भी साढ़े पांच साल विलंब से। डिवीजन बेंच ने कहा कि दहेज प्रताड़ना के आरोप में पत्नी द्वारा दायर किए गए मुकदमे को माफ कर पति ने पत्नी को साथ रखा और सात साल एकसाथ जिदंगी बिताई,वैवाहिक संबंध निभाए। पति ने पहले ही पुराने विवाद और क्रूरता को माफ कर दिया था। ऐसी स्थिति में तलाक की मांग नहीं की जा सकती। डिवीजन बेंच ने पत्नी की याचिका को स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय के फैसले को रद्द कर दिया है।

Tags:    

Similar News