Bilaspur High Court News: ग्रीन गुफा की विरासत को खतरा: पर्यटन के लिए ना खोलने हाई कोर्ट में जनहित याचिका...
Bilaspur High Court News: कांकेर वैली नेशनल पार्क स्थित ग्रीन गुफा को टूरिज्म के लिए खोलने के राज्य सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है।
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2 February 2026|बिलासपुर। कांकेर वैली नेशनल पार्क स्थित ग्रीन गुफा को टूरिज्म के लिए खोलना और गुफा के प्रवेश द्वार का निर्माण, सीढ़ी, पाथवे इत्यादि संरचनाओं के निर्माण कार्य को रोकने व गुफा को पर्यटन के लिए ना खोलने की मांग करते हुए नितिन सिंघवी ने बिलासपुर हाई कोर्ट जनहित याचिका की है। राज्य शासन की ओर से डिवीजन को बताया, गुफा में कुछ लोग नाम खोद देते जिससे गुफा के संरक्षण के लिए गुफा के बाहर निर्माण कार्य कराया जा रहा है। इस पर डिवीजन बेंच ने कहा कि गुफा को आम जनता से बचाने के कार्य किये जा सकते है, जिनसे गुफा की विरासत को खतरा हो। डिवीजन बेंच ने संचालक कांकेर वैली नेशनल पार्क को नोटिस जारी कर शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। जनहित याचिका की अगली सुनवाई के लिए डिवीजन बेंच ने 18 फरवरी की तिथि तय की है।
याचिकाकर्ता रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने डिवीजन बेंच को बताया गया कि वन विभाग पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए गेट, सीढ़ी और पाथवे बनवा रहा है। 24 दिसंबर 2025 को हुई वन विभाग की बैठक में कांकेर वैली नेशनल पार्क के संचालक ने पावर पॉइंट के माध्यम से ग्रीन गुफा के प्रवेश द्वार, सीडी पाथवे इत्यादि संरचनाओं के निर्माण का प्रेजेंटेशन दिया है। जिस पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) ने जनवरी माह के अंत तक पर्यटकों के लिए गुफा खोलने का निर्देश दिया है। गुफा खोलने की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने हेतु अच्छे साइनेज, फोटो वीडियो के माध्यम व्यापक चार प्रसार का निर्देश भी जारी किया है।
बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ़ पेलियोसाइंसेज़ लखनऊ से मांगी थी राय
याचिकाकर्ता सिंघवी ने डिवीजन बेंच को बताया, ग्रीन गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने एवं निर्माण कार्य के संबंध में भारत सरकार की संस्था बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज़, लखनऊ BSIP से विशेषज्ञ राय ली गई थी, जिसे कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया। इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डॉ. महेश. ठक्कर निदेशक, BSIP ने कहा कि गुफा के प्रवेश द्वार के अत्यंत निकट रेत, बजरी और लोहे की छड़ों जैसे निर्माण सामग्री का भंडारण और उपयोग विशेष रूप से चिंताजनक है।
सिविल कार्य ये माइक्रोक्लाइमेट हो सकता है प्रभावित
सिविल कार्य से प्राकृतिक ड्रेनेज एवं सीपेज पैटर्न बदल सकते हैं, गाद और धूल का प्रवेश बढ़ सकता है, गुफा के भीतर वायु प्रवाह, माइक्रोक्लाइमेट और रासायनिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, जिससे गुफा के इकोसिस्टम को पर्यटन शुरू होने से पहले ही अपरिवर्तनीय क्षति पहुंच सकती है। इसलिए उन्होंने जोर देकर सलाह दी कि जब तक विस्तृत बहुविषयक वैज्ञानिक अध्ययन पूरे नहीं हो जाते, तब तक सभी निर्माण एवं पर्यटन संबंधी गतिविधियां तत्काल रोक दी जानी चाहिए।
गुफा की सूक्ष्म पारिस्थितिकी को स्थायी रूप से बदल सकता है ऐसे निर्माण कार्य
विशेषज्ञ ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है, ग्रीन गुफाएँ पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे नाजुक और संवेदनशील प्राकृतिक प्रणालियों में से हैं। चूना-पत्थर की गुफाएं, विशेष रूप से वे जिनमें दुर्लभ फोटोसिंथेटिक या कीमो-सिंथेटिक माइक्रोबियल परतें होती हैं, बंद और अत्यंत स्थिर इकोसिस्टम होती हैं, जो हजारों से लाखों वर्षों में नमी, तापमान, रोशनी, वायु प्रवाह एवं जियोकेमिस्ट्री की विशेष परिस्थितियों में विकसित होती हैं। डायरेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रीन केव को बिना किसी विस्तृत वैज्ञानिक, पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव आकलन EIA अध्ययन के आम जनता के लिए खोलना अत्यंत जोखिमपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। ऐसे कार्यों से ऐसा नुकसान हो सकता है, जो तुरंत दिखाई न दे, लेकिन गुफा की सूक्ष्म पारिस्थितिकी को स्थायी रूप से बदल या समाप्त कर सकता है। एक बार यदि यह प्रणाली बाधित हो जाती है, तो मानव समय-सीमा में इसका पुनर्स्थापन लगभग असंभव होता है। डॉ. पति ने कहा सिर्फ वैज्ञानिक अनुसंधान एवं दीर्घकालिक संरक्षण के लिए इसे सुरक्षित रखें।
प्रोफेसर ने हाई कोर्ट को सौंपी गंभीर रिपोर्ट
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, स्कूल ऑफ स्टडीज़ इन लाइफ साइंस, डॉ. एके. पति से भी विशेषज्ञ राय ली गई थी। डॉ. पति ने कहा कि कांकेर वैली राष्ट्रीय उद्यान की गुफाएं, विशेष रूप से कुटुमसर केव कॉम्प्लेक्स एवं ग्रीन केव, अत्यंत नाजुक, संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्र हैं। गुफाओं का सूक्ष्म जलवायु तंत्र, सूक्ष्मजीव समुदाय तथा गुफा-अनुकूलित जीव अत्यंत दीर्घकाल में विकसित होते हैं। मानव हस्तक्षेप के प्रति अत्यंत कम सहनशील होते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ग्रीन केव जैसी अत्यधिक संवेदनशील गुफाओं को पर्यटन के बजाय केवल वैज्ञानिक अनुसंधान एवं दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए। डॉ. पति द्वारा दी गई लिखित राय भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई।