दत्तक पुत्र-पुत्री के कानूनी अधिकार को लेकर हाई कोर्ट का आया महत्वपूर्ण फैसला: कोर्ट ने कहा...
Bilaspur High Court: दत्तक पुत्र-पुत्री के कानूनी अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच ने कहा, जब तक जब तक 'देने और लेने' यानी गिव एंड टेक की अनिवार्य रस्म को ठोस सबूतों के साथ साबित नहीं किया जाता, तब तक गोद लेने की प्रक्रिया शून्य मानी जाएगी। पढ़िए रजिस्टर्ड गोदनामा को लेकर हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है।

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बिलासपुर। 14 मार्च 2026|दत्तक पुत्र-पुत्री के कानूनी अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच ने कहा, जब तक जब तक 'देने और लेने' यानी गिव एंड टेक की अनिवार्य रस्म को ठोस सबूतों के साथ साबित नहीं किया जाता, तब तक गोद लेने की प्रक्रिया शून्य मानी जाएगी।
SECR की उस याचिका पर जिसमें निचली अदालत के फैसले को चुनाैती दी गई थी, जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच में सुनवाई हुई। याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, रजिस्टर्ड गोदनामा होने मात्र से कोई व्यक्ति कानूनी रूप से उत्तराधिकारी नहीं बन जाता। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें लखीराम यादव को रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति देने व कानूनी पिता के समस्त सेवा लाभ का भुगतान करने का निर्देश दिया था।
पढ़िए क्या है मामला?
छत्तीसगढ़ कोरिया जिले के चिरमिरी निवासी लखीराम यादव ने SECR दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर बताया कि वर्ष 1976 में रेलवे कर्मचारी पापा राव और लक्ष्मी बाई ने उसे गोद लिया था। उस समय उसकी उम्र तकरीबन 5-6 साल की थी। 22 साल बाद वर्ष 1998 में इसका विधिवत पंजीकरण कराया। पापा राव की मृत्यु के बाद लखीराम ने रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति और सेवा लाभों के लिए दावा करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया। रेलवे के अधिकारियों ने लखीराम के आवेदन को खारिज कर दिया। रेलवे अफसरों के निर्णय को चुनौती देते हुए लखीराम ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से निचली अदालत में याचिका दायर की थी। दायर याचिका में अनुकंपा नियुक्ति देने व गोद लिए पिता के सेवा लाभ की मांग की थी। मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने लखीराम की याचिका को स्वीकार करते हुए अनुकंपा नियुक्ति सहित मृत कर्मचारी के समस्त सेवा लाभ देने का निर्देश दिया था।
निचली अदालत के फैसले को SECR ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में गवाहों के अलग-अलग बयान आए।
गवाहों के बयान अलग-अलग
एक गवाह ने कोर्ट को बताया, गोद लेने की प्रक्रिया ठंड के मौसम में हुई थी, दूसरे ने इसके ठीक उलटा इस प्रक्रिया को गर्मी के दिनों में होना बताया। हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम, 1956 की धारा 11 (vi) के तहत बच्चे को देने और लेने की रस्म अनिवार्य है। गवाह यह नहीं बता सके,गोद लेने की प्रक्रिया कहां और किसकी मौजूदगी में पूरी की गई थी।
पढ़िए गोद लेने के क्या हैं नियम?
नियमों पर नजर डालें तो गोद लेने के लिए अधिकतम आयु 15 वर्ष तय की गई थी। इससे अधिक के लड़का या लड़की को गोद नहीं लिया जा सकता। गोद लेने में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं करने और पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पाने के कारण हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए रेलवे की याचिका को स्वीकार कर लिया।
