कर्मचारियों की खबर: हाई कोर्ट बोला- कर्मचारियों को दशकों तक अस्थायी या दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना प्रशासनिक शुचिता के विरुद्ध है...

कर्मचारियों की खबर: हाई कोर्ट बोला- कर्मचारियों को दशकों तक अस्थायी या दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना प्रशासनिक शुचिता के विरुद्ध है...
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इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने दैनिक वेतनभोगी कर्मियों के नियमितकरण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा......

बिलासपुर। 8 अप्रैल 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने दैनिक वेतनभोगी कर्मियों के नियमितकरण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, जहां काम की प्रवृति स्थाई और 12 महीने की है,वहां कर्मचारियों को बरसों तक अस्थाई लेबल के साथ रखना उनके अधिकारों और सम्मान का हनन है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता कर्मचारियों की मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का निर्देश सरकार को दिया है। कोर्ट ने इसके लिए राज्य सरकार के लिए चार महीने का डेडलाइन तय किया है।

याचिका की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच में हुई। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस साहू के सिंगल बेंच ने कहा, सरकार एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह उन गरीब कर्मचारियों के दम पर अपना बजट संतुलित नहीं कर सकती, जो वर्षों से बुनियादी और महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं को संभाल रहे हैं।

पढ़िए क्या है मामला?

वन विभाग में कार्यरत 18 से अधिक कर्मचारियों ने अपने अधिवक्ताओं के माध्यम से हाई कोर्ट में अलग-अलग याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने बताया, वन विभाग में वर्ष 2006 से 2016 के बीच कंप्यूटर ऑपरेटर, कार्यालय सहायक और सुरक्षा श्रमिक जैसे पदों पर नियुक्त हुए थे। 10 साल से अधिक समय से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने बताया अब उनकी उम्र भी सरकारी सेवाओं के लिए पार हो चुकी है। शासकीय सेवाओं में भर्ती के लिए निर्धारित आयु सीमा को पार कर चुके हैं, ऐसी स्थिति में अगर उनको नियमित नहीं किया जाता है और दैनिक वेतनभोगी का हवाला देते हुए नौकरी से बाहर कर दिया जाता है, तब ऐसी स्थिति में बेकारी के सिवाय और कुछ नहीं मिलेगा। परिवार के सामने आर्थिक संकट और भरण पोषण की स्थिति भी खड़ी होगी। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से मांग की है, उनकी नियमितिकरण के लिए राज्य सरकार को जरुरी दिशा निर्देश जारी करे।

पढ़िए हाई कोर्ट ने सरकार की इस पॉलिसी पर क्यों जताई नाराजगी

याचिका की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एडहॉक और आउटसोर्सिंग के बहाने नियमित नियुक्ति से बचने की सरकारी प्रवृति पर नाराजगी जताई। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जहां काम की प्रकृति स्थायी और 12 महीने वाली है, वहां कर्मचारियों को वर्षों तक अस्थायी लेबल के साथ रखना उनके अधिकारों और गरिमा का हनन है। हाई कोर्ट ने कहा कि आर्थिक तंगी का बहाना बनाना उचित नहीं है।

सरकार की दलीलों को किया खारिज, याचिकाकर्ताओं से ये कहा

राज्य सरकार की ओर से दी गई दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को नया अभ्यावेदन देने की छूट दी है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया है, वे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की भावना के अनुरूप इन कर्मचारियों के हक में फैसला लें।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नरेंद्र कुमार तिवारी विरुद्ध झारखंड सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यदि कोई कर्मचारी स्वीकृत पदों पर 10 वर्ष या उससे अधिक समय से निरंतर सेवा दे रहा है, तो उसे केवल तकनीकी आधार पर नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया, राज्य सरकारों को एडहॉक की संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय एक आदर्श नियोक्ता की तरह व्यवहार करना चाहिए। कर्मचारियों को दशकों तक अस्थायी या दैनिक वेतन भोगी बनाए रखना प्रशासनिक शुचिता के विरुद्ध है।

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