बिलासपुर हाईकोर्ट: हाई कोर्ट ने कहा- गंभीर बीमारी से जूझ रहे कैदी की पैरोल पर जल्द फैसला करे राज्य सरकार....
Bilaspur High Court: गैंगरीन जैसे गंभीर बीमारी से जूझ रहे 68 वर्षीय कैदी की पैरोल आवदेन पर जल्द फैसले लेने का निर्देश हाई कोर्ट ने राज्य शासन को दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में मौलिक अधिकारों का जिक्र करते हुए 10 दिन के भीतर कैदी को इलाज के लिए पैरोल पर रिहा करने के संबंध में निर्णय लेने कहा है।

फोटो सोर्स- NPG News
बिलासपुर।11 मार्च 2026| गैंगरीन जैसे गंभीर बीमारी से जूझ रहे 68 वर्षीय कैदी की पैरोल आवदेन पर जल्द फैसले लेने का निर्देश हाई कोर्ट ने राज्य शासन को दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में मौलिक अधिकारों का जिक्र करते हुए 10 दिन के भीतर कैदी को इलाज के लिए पैरोल पर रिहा करने के संबंध में निर्णय लेने कहा है।
कैदी की याचिका पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। डिवीजन बेंच ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समय पर और उचित मेडिकल ट्रीटमेंट का अधिकार भी शामिल है। याचिकाकर्ता कैदी ने अपनी याचिका में बताया है, वह गैंगरीन जैसे गंभीर बीमारी से पीड़ित है।
पढ़िए क्या है मामला?
मामले में प्रस्तुत मेडिकल दस्तावेजों के अनुसार कैदी के पैर की एक उंगली पहले ही काटी जा चुकी है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि संक्रमण और फैल गया है, संक्रमण ऐसे ही फैलते रहा तो आगे चलकर उसके पैर को भी काटने की नौबत आ सकती है। याचिकाकर्ता कैदी ने कहा, सरकारी अस्पताल में इलाज को लेकर उसे भरोसा नहीं है, इसलिए वह किसी निजी अस्पताल में उपचार कराना चाहता है। इसी उद्देश्य से उसने पैरोल के लिए आवेदन किया था। जेल प्रशासन ने यह आवेदन जिला मजिस्ट्रेट को फारवर्ड कर दिया है, लेकिन उस पर अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया। संक्रमण बढ़ने के कारण उसके जीवन को खतरा पैदा हो गया है।
जीवन के अधिकार में, पर्यापत चिकित्सा इलाज का अधिकार भी है शामिल
डिवीजन बेंच ने कहा, उपलब्ध दस्तावेजों से साफ है, याचिकाकर्ता गंभीर स्वास्थ्यजन्य परिस्थितियों से गुजर रहा है, उसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है। डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा, “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में समय पर और पर्याप्त चिकित्सा इलाज का अधिकार भी शामिल है। भले ही पैरोल पूर्ण अधिकार के रूप में नहीं दी जा सकती, लेकिन सक्षम प्राधिकारी का दायित्व है कि ऐसे आवेदन पर उचित समय में निर्णय ले, खासकर जब मामला गंभीर चिकित्सा आधार पर हो।
0 पढ़िए याचिकाकर्ता ने क्या कहा है अपनी याचिका में
याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा है, अधिकारियों द्वारा उसकी पैरोल अर्जी पर निर्णय न लेना मनमाना और अवैध है। यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा है, उसे अपनी पसंद के अस्पताल में उचित इलाज कराने का अधिकार है, खासकर तब जब उसके पैर के काटे जाने का खतरा बना हुआ है।
0 राज्य सरकार के अधिवक्ता ने ये दी दलीलें
राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा कहा, याचिकाकर्ता एक दोषसिद्ध कैदी है और पैरोल, अधिकार के रूप में नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई, प्रशासन की ओर से कोई जानबूझकर लापरवाही नहीं की गई है। जेल के भीतर याचिकाकर्ता को आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे कैदी की लंबित पैरोल अर्जी पर 10 दिनों के भीतर निर्णय लें। इसके साथ ही डिवीजन बेंच ने याचिका को निराकृत कर दिया है।
