Neem Karoli Baba: ऐसे चमत्कारी संत जिनके गुणगान सद्गुरु भी करते हैं,उन नीम करोली बाबा को जानिए नज़दीक से

Neem Karoli Baba

Update: 2023-06-30 08:40 GMT

पूर्ण समर्पण से हासिल सिद्धियों से अपने भक्तों का जीवन बदल देने वाले नीम करोली बाबा के नाम से शायद ही कोई अपरिचित हो। न माथे पर तिलक, न संत सी वेशभूषा, न कोई आडंबर और न कोई चाह, मात्र कंबल ओढ़े एक सामान्य इंसान की तरह नज़र आने वाले नीम करोली बाबा अपने चमत्कारों से हैरान कर देते थे। ये उनकी सिद्धियों की ही ताकत थी कि वे वक्त की नज़ाकत भांपकर कुछ ऐसा कर देते थे कि भक्त हतप्रभ रह जाते थे। वे जहां नहीं होते थे, वहां भी होते थे और अपने भक्तों का यूं ध्यान रखते थे जैसे वे उनकी ही ज़िम्मेदारी हों और उनका अहित नहीं होना चाहिए। कितने ही नासमझों की आँखें उन्होंने खोलीं, कितने ही लोगों का पूरा जीवन बदल डाला लेकिन सरलता ऐसी कि अपने पैर तक न छूने देते थे। कहते थे, जो कुछ है हनुमान जी की कृपा से है। पैर छूना है, उनके छुओ। और अपने भीतर आध्यात्मिकता की लौ जलाते रहो। आइए थोड़ा करीब से जानते हैं नीम करोली बाबा को। उनके कुछ खास चमत्कारों की एक बानगी भी देखियेगा।

पहले जानते हैं नीम करौली बाबा के जीवन के बारे में

बताया जाता है कि बाबा का जन्म ग्राम अकबरपुर, फ़िरोज़ाबाद, उत्तर प्रदेश में सितम्बर 1900 के आसपास हुआ था। बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। उनके पिता का नाम दुर्गा प्रसाद शर्मा था। किरहीन ग्राम में इनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। 11 वर्ष की बाल्यावस्था में ही इनका विवाह एक सम्पन्न ब्राम्हण परिवार की कन्या से कर दिया गया था। लेकिन बाबा का मन वैवाहिक जीवन में नहीं रमा और विवाह के कुछ समय बाद ही इन्होंने घर छोड़ दिया।

घर छोड़ने के बाद नीम करोली बाबा गुजरात चले गए। वहां उन्होंने एक वैष्णव मठ में दीक्षा लेकर साधना की। उसके बाद वे अन्यत्र जगहों पर भ्रमण करते रहे और साधना में लीन रहे। 17 वर्ष की आयु में ही उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए थे और ज्ञान भी प्राप्त हो गया था। लगभग 9 वर्षों तक साधना करने के बाद बाबा फिरोजाबाद के नीम करोली गाँव में रुके। उन्होंने यहां जमीन में गुफा बना ली और फिर साधना में लीन हो गए। बताते हैं कि उन्होंने करीब ही हनुमान जी की प्रतिमा अपने हाथों से बनाई थी। हनुमानजी में उनका अटूट विश्वास था। कहते हैं कि यह मूर्ति अब भी है।और उसपर सिंदूर चढ़ाने से हर मनोकामना पूर्ण होती है।यहीं से बाबा की सिद्धियों की चर्चा होना शुरू हुई। उनकी ख्याति दिन पर दिन बढ़ने लगी।

यहां बाबा को उनके एक पुराने परिचित ने देखा और उनके पिताजी को लिवा लाए। उनके पिता आए और उन्होंने अपने पुत्र यानी बाबा को गृहस्थ आश्रम का पालन कर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की आज्ञा दी।

इस तरह बाबा पुनः गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट हुए। गृहस्थ का धर्म निभाते हुए बाबा को दो पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई। इस दौरान बाबा सामाजिक और धार्मिक कार्यों में खुद को लगा कर रखते और प्रयास करते कि वे दांपत्य जीवन को चला सकें।लेकिन बहुत प्रयत्नों के बाद भी उनका मन घर- गृहस्थी में रमा नहीं और 1958 के आसपास उन्होंने पुनः घर त्याग दिया।

वे कई जगहों पर भटकते रहे और आखिर और कैंची ग्राम में टिके। यही कैंची ग्राम आज कैंची धाम के नाम से जाना जाता हैं। जहां हर वक्त भक्तों की भीड़ टूटती है।यह धाम नैनीताल- अल्मोड़ा मार्ग पर है। बाबा नीब करोली ने 15 जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित की थी। आज भी हर साल यहां 15 जून के दिन भंडारे का आयोजन होता है।

ऐसे पड़ा बाबा का नाम नीम करोली बाबा

कहते हैं कि एक बार बाबा ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में सफर कर रहे थे। लेकिन बाबा के पास टिकट नहीं थी। टिकट चेकर ने बाबा को अगले स्टेशन 'नीब करौरी' पर उतार दिया । बाबा गाड़ी से उतार तो दिए गए लेकिन वे कहीं गए नहीं, किनारे ही चिमटा धरती में गाड़ कर बैठ गए। ऑफिसर ने ड्राइवर को गाड़ी चलाने का आदेश दे दिया। ड्राइवर ने बहुत प्रयास किया लेकिन ट्रेन आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी।आखिर में एक सीनियर ऑफिसर तक बात पहुंची। वे सब समझ गए। वे खुद आए और उन्होंने ड्राइवर और टिकट चेकर दोनों से बाबा से माफी मांगने को कहा। सबने बाबा को सम्मान पूर्वक ट्रेन में बिठाया। बाबा ट्रेन में बैठे ही थे कि ट्रेन चल पड़ी। बाबा के चमत्कार को सारे यात्रियों ने भी देखा और यहीं से बाबा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह स्थान जो नीब करौरी के नाम से जाना जाता था, इसी के नाम से बाबा को नीम करौली नाम मिला।

बाबा ने किए हैं ऐसे-ऐसे चमत्कार

नीम करोली बाबा के चमत्कार हैरान कर देते हैं। इनकी चर्चा आज भी लोगों के बीच होती है। आज भी दूर- दूर से लोग कैंची धाम और बाबा के समाधि स्थल पर जाते हैं और खुद को धन्य समझते हैं। यूं तो बाबा ने अनेक चमत्कार किए। यहाँ हम उनमें से कुछ की चर्चा कर रहे हैं।

नशा हुआ बेअसर, विदेशी एल्पर्ट बने भक्त

बाबा के परम भक्त थे एक विदेशी 'रिचर्ड एल्पर्ट' । उनके भक्त बनने के पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है। हारवर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान में सहायक प्रोफ़ेसर एल्पर्ट मनुष्य को वश में करने वाले नशे' एलएसडी' पर अध्यन कर रहे थे। यहां तक कि वे खुद भी यह नशा करने लगे थे। पहली बार जब वे बाबा के पास आए तो उन्होंने बाबा से कहा कि इस पदार्थ की मात्र एक चुटकी लेने फर इंसान इस लोक में नहीं रहता। बाबा मुस्कुराए। बोले, आपके पास यह पदार्थ कितनी मात्रा में है? एल्पर्ट ने एक मुट्ठी भर पदार्थ उनके सामने रख दिया। बाबा ने पूरी मुट्ठी भर वह मादक पदार्थ एक बार में ग्रहण कर लिया और उनके व्यवहार में लेश मात्र भी फर्क नहीं पड़ा। वे पहले की तरह अपने अनुयायियों से बातचीत करते रहे। एल्पर्ट की आंखें हैरानी से फटी रह गईं। ऐसा आत्मबल, ऐसा अद्भुत नियंत्रण अविश्वसनीय था। बाबा ने कहा देखो, तुम्हारे नशे से मेरा आध्यात्मिक नशा अधिक शक्तिशाली है। करना है तो यह नशा करो। उस दिन से एल्पर्ट बाबा के भक्त बन गए। आगे चलकर यही रिचर्ड एलपर्ट 'रामदास' कहलाए। इन्होंने बाबा के चमत्कारों पर ‘मिरेकल ऑफ लव’ नाम की किताब भी लिखी है। आज के दौर के पूजनीय संत सद्गुरु ने स्वयं इस चमत्कार की चर्चा अपने श्रोताओं से की है।

पति की हालत थी नाज़ुक, यूं दिया पत्नी को मार्गदर्शन

बताते हैं कि बाबा के भक्त थे अल्मोड़ा के दिवाकर पंत जी। एक दिन उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। रात घिरने आई लेकिन इलाका ऐसा था कि डाॅक्टरी मदद नहीं पहुंच पाई। पत्नी दहशत में बुरी तरह रो रही थी। घरवालों का भी बुरा हाल था।

अचानक पत्नी को महसूस हुआ कि नीम करोली बाबा उनसे कुछ कह कर रहे हैं। उन्होंने चौंक कर देखा तो लगा कि बाबा उन्हें एक दवा देकर कह रहे हैं कि तुरंत यह दवा दे दो। मरीज की पत्नी के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। उन्होंने यंत्रवत पति को वह दवा पिला दी। दवा पीकर मरीज की हालत और बिगड़ गई और वह अनर्गल प्रलाप करने लगे। परिजन पत्नी को कोसने लगे कि पहले तो इतनी बुरी हालत नहीं थी, जाने क्या पिला दिया तुमने।

पत्नी की हालत और खराब हो गई। मारे भय के उससे एक- एक पल काटे नहीं कट रहा था। जैसे तैसे रात कटी। सुबह डाॅक्टर आए, उन्होंने मरीज का चैक अप कर रहा कि चिंता की बात नहीं। ये अब जल्द ठीक हो जाएंगे। तभी डाॅक्टर ने पास रखी दवा की शीशी देख कर कहा कि इस दवा ने ही मरीज की जान बचाई। अच्छा किया आप लोगों ने यह दवा दे दी।

बदहवास पत्नी हैरान थी,अब उसकी चेतना लौटी। उसने याद किया कि इससे पहले यह दवा घर में कभी नहीं थी। अब उसे रात की बात याद आई। उसने यह सोचा भी नहीं कि बाबा नीम करोली कहां से अचानक आए होंगे, कब गए। किसी और ने तो उन्हें देखा तक नहीं। लेकिन उसके हाथ में पति के लिए ये संजीवनी वह देकर चले गए। पत्नी समझ गई कि यह चमत्कार था जो भक्त की जान बचाने बाबा ने किया था।

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फतेहगढ़ में बाबा के भक्त एक बुजुर्ग दंपति रहते थे। एक दिन बाबा अचानक उनके घर पहुंच गए । बाबा को अपने द्वार पर देख दंपत्ति बेहद खुश हुए। बाबा ने कहा आज की रात वे उनके यहां ही रुकेंगे। दंपति अभावों से जूझ रहे थे। जो उपलब्ध था, वही खिला कर उन्होंने बाबा की सेवा की। उन्होंने बाबा को एक कंबल दिया। बाबा थोड़ी देर उनका हाल चाल लेकर कम्बल ओढ़कर सो गए।

बुजुर्ग दंपति भी सोने जाने लगे। तभी उन्होंने बाबा के कराहने की आवाज सुनी। आवाज सुनकर वे आकर बाबा के तख्त के पास बैठ गए। वे घबरा रहे थे कि बाबा को क्या कष्ट है? लेकिन बाबा कह कर सोए थे कि किसी भी परिस्थिति में उन्हें जगाया न जाए।

पूरी रात बाबा इसी तरह कराहते रहे। जैसे कोई उन पर हमला कर रहा हो। बुजुर्ग दंपत्ति एक पल को भी वहां से नहीं हटे। सुबह बाबा उठे। उन्होंने अपना कंबल लपेटा और बुजुर्ग के हाथ में देकर बोले कि इसे इसी लिपटी हुई हालत में नदी में फेंक आओ। इसे खोलकर कदापि मत देखना।बुजुर्ग दंपति ने उनके आदेश का पालन किया। उन्होंने कंबल हाथ में लिया। बुजुर्ग ने महसूस किया कि उनका हल्का फुल्का कम्बल बहुत भारी लग रहा था और उसमें से धातु के खनखनाने की आवाज़ भी आ रही थी। बुजुर्ग दंपत्ति ने एक दूसरे की ओर अचरज से देखा। लेकिन बाबा के शब्दों को ध्यान में रख उन्होंने कंबल को खोल कर देखने की कोशिश नहीं की। और लिपटे हुए ही उसे नदी में प्रवाहित कर दिया। जाने से पहले बाबा ने कहा कि परेशान मत होना। तुम्हारा बेटा जल्दी वापस आ जायेगा।

बताते हैं कि उन बुजुर्ग दंपति का इकलौता बेटा ब्रिटिश सेना में था। एक माह बाद जब उनका बेटा वापस आया तो उसने जो बताया वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। उसने बताया कि एक रात सेना की उनकी टुकड़ी जापानी सेना से चारों ओर से घिर गई थी। उनकी टुकड़ी के लिए खुद को बचाना असंभव था। भीषण गोलीबारी में उसके सारे साथी मारे गए। रात भर गोलियां चलती रहीं। लेकिन उसे एक भी गोली नहीं लगी।

उनके बेटे ने कहा कि ऐसा महसूस हो रहा था जैसे किसी ने उसके सामने कोई अदृश्य दीवार खड़ी कर दी थी। जो किसी भी गोली को उस तक पहुंचने ही नहीं दे रही थी। सुबह ब्रिटिश टुकड़ी आई तब वह सुरक्षित निकल पाया।

यह घटना उसी रात की थी जब बाबा अपने भक्त के घर ठहरने आये थे। अब उन्हें समझ आया कि बाबा अचानक उस रात उनके यहां ठहरने क्यों आए थे। और रात भर क्यों कराह रहे थे। बाबा रात भर उनके बेटे की रक्षा कर रहे थे। उसे लगने वाली गोलियां वे स्वयं झेल रहे थे।... और वही गोलियां उस कंबल के भीतर थीं।

भंडारे में कम पड़ गया घी तो बाबा ने पानी को ही घी बना दिया

इस चमत्कार की बहुत चर्चा होती है। बताया जाता है कि एक बार भंडारे के दौरान भारी भीड़ उमड़ी। भोजन बनाते-बनाते घी खत्म हो गया। जबकि अभी और पुड़ियां तली जानी थीं। काम में लगे अनुयायियों ने जाकर बाबा को इस बारे में बताया। बाबा ने भक्तों से कहा कि बिना विलंब किए गंगाजी से दो कनस्तर जल भरकर लाओ और कड़ाही में डाल दो। अनुयायी हैरान! बाबा ने कहा जल्दी जाओ। अनुयायी भागे भागे गए और पानी लाकर कड़ाही में उड़ेल दिया। पानी भक्तों के देखते ही देखते घी में बदल गया और अविलंब उसमें पूड़ियाँ तली जाने लगीं। भंडारा निर्विघ्न संपन्न हुआ।

बारिश न रोक दे हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण, इसलिए बारिश ही रोक दी

यह वह वक्त था जब हनुमानगढ़ी के मंदिर का निर्माण जोर शोर से चल रहा था। अचानक मौसम बदला, काली घटाओं से आसमान ढंक गया और जबरदस्त बारिश शुरू हो गई। वर्कर्स घबरा गए कि अब तो काम रोकना ही पड़ेगा। तभी बाबा ने अपना कंबल हटाया और आसमान की ओर देखते हुए गर्जना के साथ बोले “पवन तनय बल पवन समाना”। बस फिर क्या था। देखते ही देखते पानी रुक गया। आसमान साफ हो गया | और हनुमानगढ़ी मंदिर के निर्माण कार्य ने पुनः गति पकड़ ली।

देश-विदेश में हैं बाबा के अनुयायी

मौजूदा दौर के ख्यातिलब्ध क्रिकेटर विराट कोहली और उनकी पत्नी अभिनेत्री अनुष्का शर्मा बाबा के बहुत बड़े भक्त है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी, एप्पल के फाउंडर स्टीव जाॅब्स, फेसबुक फाउंडर मार्क जुकरबर्ग, हाॅलीवुड अभिनेत्री जूलिया राॅबर्ट्स समेत ढेरों अमेरिकी और अन्य देशी-विदेशी लोग उनके भक्तों में शामिल हैं।

जान गए थे अब आ गया अंतिम समय...

सिद्धियों के धारक बाबा नीम करोली को अपना अंतिम समय आने का पूर्वानुमान हो गया था। बताते हैं कि जिस काॅपी में वे प्रतिदिन राम नाम लिखते थे, मृत्यु के कुछ दिन पूर्व उन्होंने वह कॉपी आश्रम की वरिष्ठ सदस्य श्री माँ को दे दी थी और कहा था अब से इसमें तुम राम नाम लिखना। कैंची धाम से आगरा जाते हुए बीच में अपना वह थर्मस ट्रेन से बाहर फेंक दिया जो बाहर जाते समय हर पल उनके साथ रहता था। गंगाजली रिक्शेवाले को दे दी और कहा कि इस नश्वर जीवन में किसी चीज का मोह नहीं रखना चाहिए। 10 सितंबर 1973 को वे जब मथुरा स्टेशन पर पंहुचे, तभी उनकी तबीयत बेहद बिगड़ गई। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। बाबा नीम करोली ने अनन्त चतुर्दशी की रात्रि में इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। करोली बाबा की समाधि वृंदावन में स्थित है। एक और समाधि स्थल है जो नैनीताल के पास पंतनगर में है। कहते हैं जो भी उनकी समाधि पर सच्चे हृदय से प्रार्थना करता है, वह वहां से कभी खाली हाथ नहीं लौटता।

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