जग्गी हत्याकांड: 23 साल पहले की वह घटना जिसने छत्तीसगढ़ की राजनीति को हिला कर रख दिया था, पढ़िए कैसे घटना को दिया था अंजाम

Jaggi Murder Case: छत्तीसगढ़ की राजनीति और आम लोगों को सिर से पैर तक हीला देने वाली घटना घटी थी, आज से 23 साल पहले। घटना 4 जून 2003 की है, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद पहला विधानसभा चुनाव का दौर था। तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी, बिलासपुर के छत्तीसगढ़ भवन में ठहरे हुए थे। रात में पुलिस के आला अफसर बदहवाश दौड़ते छत्तीसगढ़ भवन और जोगी के कान में फुसफुसाए। सीएम जोगी ने जो कुछ सुना, सन्न रह गए और सीधे कमरे में चले गए। घटना थी ही ऐसी, जिसने भी सुना अपनी ही कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था, पर यह उतनी ही सच थी जितना दिन और रात। रायपुर में एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की यह पहली राजनीतिक हत्या थी।

Update: 2026-04-02 15:08 GMT

CG Jaggi Murder Case News: रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति और आम लोगों को सिर से पैर तक हीला देने वाली घटना घटी थी, आज से 23 साल पहले। घटना 4 जून 2003 की है, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद पहला विधानसभा चुनाव का दौर था। तब के मुख्यमंत्री अजीत जोगी, बिलासपुर के छत्तीसगढ़ भवन में ठहरे हुए थे। रात में पुलिस के आला अफसर बदहवाश दौड़ते छत्तीसगढ़ भवन और जोगी के कान में फुसफुसाए। सीएम जोगी ने जो कुछ सुना, सन्न रह गए और सीधे कमरे में चले गए। घटना थी ही ऐसी, जिसने भी सुना अपनी ही कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था, पर यह उतनी ही सच थी जितना दिन और रात। रायपुर में एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। छत्तीसगढ़ में अपनी तरह की यह पहली राजनीतिक हत्या थी।

एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी की हत्या ने छत्तीसगढ़ के साथ ही दिल्ली की राजनीति को हीला कर रख दिया। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था, छत्तीसगढ़ जैसे शांत प्रदेश में इस तरह का भयावह सीन सामने आएगा और वह भी चुनावी दौर में। जग्गी की हत्या ने सब को झकझोर कर रख दिया और यह अंदेशा होने लगा, राजनीतिक हत्या जिस अंदाज में की गई है, दौर शुरू तो नहीं हो गया। जग्गी हत्याकांड ने प्रदेश की राजनीति की दिशा ही मोड़ दी, कांग्रेस को जनता ने वनवास की सजा दे दी और भाजपा को राजतिलक।

रामअवतार जग्गी को कांग्रेस के कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी थे, वीसी शुक्ल ने एनसीपी के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी सोंपी थी। वीसी शुक्ल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी से मतभेदों के चलते कांग्रेस छोड़कर एनसीपी का दामन थाम लिया था। इस हत्याकांड को राजनीतिक रंजिश और खींचतान का परिणाम बताया गया था। वीसी शुक्ल के बेहद करीब होने के कारण जग्गी को रास्ते से हटाने का षड़यंत्र रचा और चलती कार में गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने मामला सीबीआई को सौंप दिया। इस केस में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था। साल 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने इस मामले में 28 आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी।

सीबीआई की जांच में यह खुलासा हुआ था, हत्याकांड के पीछे एक गहरी साजिश रची गई थी, जिसमें भाड़े के शूटरों का इस्तेमाल किया गया था। सीबीआई जांच में यह भी सामने आया, उस दौर के कुछ पुलिस अफसरों ने साक्ष्यों को छुपाने और असली आरोपियों को बचाने के लिए झूठे गवाह और फर्जी आरोपी तक तैयार किए थे।

साल 2007 में विशेष अदालत ने तीन पुलिस अधिकारियों को भी दोषी करार दिया था। साल 2007 में मामले की सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट ने 28 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। साक्ष्य में कमी का हवाला देते हुए अमित जोगी को हत्याकांड से बरी कर दिया था।

सीबीआई की याचिका विलंब से दाखिल करने के कारण हाई कोर्ट ने कर दी थी खारिज

विशेष अदालत के फैसले जिसमें अमित जोगी को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था, सीबीआई ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में तकनीकी खामियों के चलते कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। बता दें, सीबीआई ने 1,373 दिनों की देरी कर दी थी, जिसके चलते हाईकोर्ट ने 2011 में तकनीकी आधार पर याचिका खारिज कर दी थी।

सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी याचिका

हाई कोर्ट से अपील खारिज होने के बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और अमित जोगी की रिहाई को चुनौती दी।

नवंबर 2025 में मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि "मामले में अमित जोगी पर लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और यह एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या की साजिश से जुड़ा है"।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील में हुई अत्यधिक देरी को माफ करते हुए छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट को आदेश दिया कि वह इस मामले पर पुनः मेरिट (गुण-दोष) के आधार पर सुनवाई करे।

आज आया हाई कोर्ट का फैसला

कोर्ट के निर्देश के बाद गुरुवार 2 अप्रैल को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने मामले की फिर से सुनाई करते हुए अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि जिस साक्ष्य और साजिश के आधार पर अन्य 28 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उसी साक्ष्य के आधार पर अमित जोगी का बरी होना गलत था। अदालत ने अमित जोगी को दोषी ठहराते हुए 3 हफ्ते के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश जारी किया है।

साक्ष्य मिटाने के आरोप में पुलिस अफसरों को सजा

शूटर चिमन सिंह, रायपुर के वर्तमान मेयर एजाज ढेबर के भाई याहया ढेबर, तत्कालीन थाना प्रभारी वी.के. पांडे के अलावा दो सीएसपी (नगर पुलिस अधीक्षक) रैंक के अधिकारियों को भी सजा सुनाई थी. इन अधिकारियों पर साक्ष्य मिटाने और फर्जी गवाह तैयार कर आरोपियों को बचाने का आरोप सही पाया गया था।

पढ़िए क्या है सीबीआई की चार्जशीट में

यह कोई अचानक हुई वारदात नहीं बल्कि एक सोची-समझी आपराधिक साजिश थी। हत्या की साजिश रचने के लिए ग्रीन पार्क होटल, कंट्री क्लब और कथिततौर पर मुख्यमंत्री के आधिकारिक निवास तक में बैठकें हुई थीं। साजिश को अंजाम देने के लिए पेशेवर भाड़े के शूटरों चिमन सिंह को काम पर रखा गया था। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया है, तत्कालीन पुलिस महकमे के कुछ बड़े अधिकारी सत्ता के दबाव में काम कर रहे थे। उन्होंने असली आरोपियों को बचाने के लिए झूठे गवाह तैयार किए और साक्ष्यों को नष्ट करने की कोशिश की।

हत्याकांड में ये हैं दोषी

जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत और विश्वनाथ राजभर दोषी हैं।

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