Bilaspur Highcourt News: हाई कोर्ट ने क्यों कहा, राजस्व अधिकारी नहीं दे सकते सभी सेवा लाभों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र, पढ़िये क्या है मामला
Bilaspur Highcourt News: हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई में फैसला देते हुए कहा है कि कलेक्टर या तहसीलदार जैसे राजस्व प्राधिकारी केवल कंट्रीब्यूटरी फैमिली पेंशन के उद्देश्य से ही आश्रित प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। अन्य लाभों जैसे ग्रेच्युटी और भविष्य निधि के लिए केवल सक्षम सिविल कोर्ट ही प्रमाण पत्र जारी कर सकता है।
Bilaspur Highcourt News: बिलासपुर। शिक्षिका की मौत के बाद युवती ने खुद को उनकी जैविक संतान बताते हुए कलेक्टर कार्यालय में आवेदन किया। जिसके आधार पर तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने उसे एकमात्र कानूनी वारिस घोषित करते हुए प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इस आधार पर उसे पेंशन, ग्रेज्युटी और अन्य लाभ मिल गए। वहीं हाईकोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था देते हुए कहा कि कलेक्टर डिप्टी कलेक्टर या तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी केवल कंट्रीब्यूटरी फैमिली पेंशन के उद्देश्य से ही आश्रित प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। ग्रेज्युटी,पीएफ जैसे अन्य लाभों के लिए केवल सक्षम सिविल कोर्ट ही प्रमाण पत्र जारी कर सकता है।
बिलासपुर के बिल्हा स्थित रहंगी मिडिल स्कूल में कार्यरत उच्च वर्ग शिक्षिका शमशाद बेगम की मौत के बाद काजोल खान ने खुद को मृतका की जैविक पुत्री बताते हुए कलेक्टर कार्यालय में आवेदन किया था। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने जून 2014 में उसे एकमात्र कानूनी वारिस घोषित करते हुए प्रमाण पत्र जारी कर दिया, जिसके आधार पर उसने पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभ मिल गए। इस पर मृतका के भाइयों मोहम्मद इखलाक खान और मोहम्मद इकबाल खान ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई, बताया कि उनकी बहन अविवाहित थीं। लिहाजा ग्रेच्युटी, पेंशन समेत सभी लाभों पर उनका अधिकार है। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की सिंगल बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 47(14) और राज्य सरकार के 17 दिसंबर 2003 को जारी सर्कुलर का विश्लेषण किया। हाई कोर्ट ने पाया कि राजस्व अधिकारियों को केवल परिवार पेंशन के लिए आश्रितों की पहचान करने का अधिकार दिया गया है । अन्य वित्तीय लाभों के लिए उत्तराधिकारियों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत सिविल कोर्ट जाना अनिवार्य है। इस मामले में डिप्टी कलेक्टर ने इन सीमाओं का उल्लंघन कर प्रमाण पत्र जारी किया था, जो कानूनन गलत था।
मामले पर दिए गए फैसले में हाई कोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर द्वारा जारी प्रमाण पत्र रद्द कर दिया है, लेकिन प्रतिवादी काजोल खान द्वारा पहले ही निकाली जा चुकी राशि की वसूली पर फिलहाल रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने आदेश में कहा है कि जब तक सक्षम सिविल कोर्ट से कोई विपरीत आदेश नहीं आता, तब तक कोई रिकवरी नहीं की जाएगी। याचिकाकर्ताओं को अब इस मामले में उचित कानूनी रास्ता अपनाने की छूट दी गई है।