हाई कोर्ट ने कहा: इस तरह की हरकत कानून की नजर में दुष्कर्म नहीं है, बिना पेनिट्रेशन प्राइवेट पार्ट रगड़ना रेप नहीं माना जाएगा
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने रेप के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, यदि किसी महिला के साथ पूरा पेनिट्रेशन साबित नहीं होता है, केवल प्राइवेट पार्ट को रगड़ा गया है तो इसे कानून की नजर में दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। इस तरह का कृत्य दुष्कर्म की कोशिश की श्रेणी में आएगा।
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बिलासपुर।18 फरवरी 2026: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने रेप के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, यदि किसी महिला के साथ पूरा पेनिट्रेशन साबित नहीं होता है, केवल प्राइवेट पार्ट को रगड़ा गया है तो इसे कानून की नजर में दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। इस तरह का कृत्य दुष्कर्म की कोशिश की श्रेणी में आएगा।
दुष्कर्म के मामले में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा को आधी कर दी है। निचली अदालत ने आरोपी काो दुष्कर्म के आरोप में सात साल की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब आरोपी को साढ़े तीन साल की सजा जेल में काटनी होगी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एनके व्यास ने कहा, आरोपी का गलत होने के साथ ही स्पष्ट भी था। चिकित्सा और अन्य साक्ष्यों के आधार पर पूर्ण पेनिट्रेशन साबित नहीं हो पाया है, लिहाजा यह मामला दुष्कर्म नहीं, दुष्कर्म के प्रयास का मामला है।
पढ़िए क्या है पूरा मामला?
यह मामला धमतरी जिले का है। अभियोजन के अनुसार, 21 मई 2004 को जब पीड़िता घर में अकेली थी, तब आरोपी उसे जबरदस्ती खींचकर अपने घर ले गया। वहां उसने पीड़िता और अपने कपड़े उतारे। उसकी मर्जी के खिलाफ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश की। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि, आरोपी ने पीड़िता को कमरे में बंद कर दिया। उसके हाथ-पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया था। कुछ समय बाद पीड़िता की मां मौके पर पहुंची और पीड़िता को आरोपी के चंगुल से छुड़ा लिया था। आरोपी के खिलाफ अर्जुनी थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई। एफआईआर दर्ज करने के साथ ही पुलिस ने ट्रायल कोर्ट में चालान पेश किया। मामले की सुनवाई के बाद 6 अप्रैल 2005 करे ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(1) यानी बलात्कार और धारा 342 यानी गलत तरीके से बंधक बनाने के अपराध में दोषी माना और 7 साल की सजा सुनाई। ट्रायल कोर्ट के फैसले को आरोपी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने कहा कि, ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। मेडिकल रिपोर्ट में जबरन यौन संबंध की पुष्टि नहीं हुई है, क्योंकि पीड़िता का हाइमन सुरक्षित पाया गया था। अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया, बयान दर्ज करने में देरी हुई, स्वतंत्र गवाह नहीं हैं। पीड़िता की उम्र को लेकर भी स्पष्ट साक्ष्य नहीं हैं। स्कूल रजिस्टर के लेखक को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। अधिवक्ताओं ने उम्र के प्रमाण पर भी सवाल उठाया ग।
वहीं, राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए पैनल लॉयर मनीष कश्यप ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठराया। उन्होंने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु मिले थे। साथ ही प्राइवेट पार्ट में लालिमा पाई गई थी, जो जबरदस्ती की ओर इशारा करती है। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी ने भी कपड़ों पर मानव शुक्राणु की पुष्टि की थी।
पीड़िता ने अलग-अलग बयान दिए
कोर्ट ने पीड़िता की गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का विस्तार से परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पीड़िता के बयान में विरोधाभास पाया। शुरुआत में उसने कहा था, आरोपी ने पेनिट्रेशन किया, पीड़िता ने बाद में उसने बयान दिया कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके प्राइवेट पार्ट के ऊपर करीब 10 मिनट तक रखा, लेकिन अंदर प्रवेश नहीं किया।
मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर डॉ. आशा त्रिपाठी की गवाही भी अहम रही। डॉक्टर ने बताया कि हाइमन नहीं फटा था और योनि में केवल उंगली का पोर ही प्रवेश कर सकता था। इससे पूरा पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं होती।
कोर्ट ने माना कि, आरोपी के पीड़िता को जबरन पकड़कर ले जाना, कपड़े उतारना, उसके जननांगों पर अपने जननांग रगड़ना ये सभी कृत्य गंभीर है और अपराध की मंशा साफ दिखता है।