Bilaspur High Court News: हाई कोर्ट की संवेदनशीलता: कोर्ट ने कहा- अवैध संतान को भरण-पोषण का है अधिकार, पढ़िए फैसले में क्या कहा
Bilaspur High Court News: पति-पत्नी और वो का एक मामला हाई कोर्ट में आया। ससुराल आने के महज पांच महीने में ही पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया, पति के साथ ही ससुराल वालों के बीच तीसरे पुरुष को लेकर विवाद शुरू हो गया। पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक का मामला दर्ज किया। कोर्ट ने तलाक की सशर्त डिक्री पारित की।
Bilaspur High Court News: बिलासपुर। पति-पत्नी और वो का एक मामला हाई कोर्ट में आया। ससुराल आने के महज पांच महीने में ही पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया, पति के साथ ही ससुराल वालों के बीच तीसरे पुरुष को लेकर विवाद शुरू हो गया। पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक का मामला दर्ज किया। कोर्ट ने तलाक की सशर्त डिक्री पारित की। फैमिली कोर्ट ने पति को इस आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति दी कि वह संतान के भरण-पोषण के लिए पत्नी को हर महीने एक हजार रुपये देना होगा।
बच्चे के भरण-पोषण के लिए प्रति महीने एक हजार रुपये देने के फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में पति ने कहा, पत्नी ने ससुराल आने के महज पांच महीने बाद बच्चे को जन्म दिया है। फैमिली कोर्ट ने तलाक की डिक्री पारित करते हुए बच्चे को उसका जैविक संतान नहीं माना है।
याचिका के अनुसार जब वह उसका जैविक संतान नहीं है तो भरण-पोषण की जिम्मेदारी वे क्यों उठाए? याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच में हुई। याचिका की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, CRPC की धारा 125 में दिए गए प्रावधान के मद्देनजर अवैध संतान भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने का हकदार है। सिंगल बेंच ने कहा कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य अवैध संतान को समाज में बेसहारा होने और दर-दर भटकने की स्थिति से रोकना है।
क्या है मामला
बेमेतरा निवासी याचिकाकर्ता की शादी 22 अप्रैल 2016 को हुई थी। शादी के बाद गौो की रस्म 18 मई 2016 को हुई। रस्म के बाद पत्नी अपने ससुराल आई। ससुराल आने के पांच महीने के भीतर ही 22 अक्टूबर 2016 को उसने बच्चे को जन्म दिया। बच्चे के जन्म के बाद पति पत्नी और परिवार वालों के बीच विवाद की स्थिति बनी। पत्नी के चरित्र और बच्चे के जन्म की बातों को लेकर पति ने फैमिली कोर्ट में मामला दायर कर तलाक की मांग की।
मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने तलाक की सशर्त आदेश पारित कर दिया। जन्मे संतान के भरण-पोषण के लिए पत्नी काे हर महीने एक हजार रुपये देने का आदेश जारी करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी। फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण संबंधी आदेश को पति ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा, जब यह साबित हो चुका है कि वह बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है, तो वह उसे गुजारा भत्ता क्यों दे? मामले की सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता पति के तर्कों और मांग को नामंजूर कर दिया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा के सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा, CRPC की धारा 125 एक कल्याणकारी प्रावधान है, जो बच्चों को सुरक्षा प्रदान करता है। भले ही बच्चा अवैध संतान की श्रेणी में आए, फिर भी वह कानूनन गुजारा भत्ता पाने का हकदार है।