सुप्रीम कोर्ट ने कहा- वसूली के लिए कर्जदार को फोन करना आत्महत्या के लिए प्रेरित करना नहीं,मुकदमा चलाने के लिए ठोकस सबूत की जरुरत...
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, कर्ज दिए पैसे की वापसी के लिए कर्जदार को फोन करना आत्महत्या के लिए प्रेरित करना नहीं है। आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध का मुक़दमा चलाने के लिए ठोस सबूत होना चाहिए, यह पता चले कि मृतक को बकाया चुकाने के लिए पीटा गया या उसके साथ शारीरिक हिंसा की गई। इस टिप्पणी के साथ याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।

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दिल्ली। 21 मार्च 2026| सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, कर्ज दिए पैसे की वापसी के लिए कर्जदार को फोन करना आत्महत्या के लिए प्रेरित करना नहीं है। आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध का मुक़दमा चलाने के लिए ठोस सबूत होना चाहिए, यह पता चले कि मृतक को बकाया चुकाने के लिए पीटा गया या उसके साथ शारीरिक हिंसा की गई। इस टिप्पणी के साथ याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्ज़दार को अपना पैसा वापस करने के लिए फ़ोन करना, कर्ज देने वाले पर आत्महत्या के लिए उकसाने का केस चलाने का आधार नहीं हो सकता। धीरुभाई नांजीभाई पटेल लोटवाला ने याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की डिवीजन में हुई।
बेंच ने एक कर्ज़ देने वाले के ख़िलाफ़ आत्महत्या के लिए उकसाने IPC की धारा 306, का मामला रद्द करते हुए कहा, "अगर कोई कर्ज़ देने वाला अपना पैसा वापस पाने के लिए कर्ज़दार को फ़ोन करता है तो यह एक क़ानूनी काम है। इसलिए सिर्फ़ इस आधार पर कर्ज़ देने वाले पर केस नहीं चलाया जा सकता। याचिकाकर्ता पर आरोप है, कर्जदार से दिए गए रकम की वापसी के लिए उसने 40 बार फाेन कॉल किया। इसके बाद परेशान होकर कर्जदार ने आत्महत्या कर ली। आत्महत्या से पहले उसने सुसाइड नोट भी छोड़ी जिसमें बार-बार फोन करने से परेशान होकर सुसाइड करने की बात लिखी थी। सुसाइड करने वाले ने सुसाइड नोट में 9 लोगों के नाम लिखा था। जिसमें याचिकाकर्ता का नाम भी शामिल है।
जांच के दौरान, सरकारी वकील ने मुख्य रूप से कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पर भरोसा किया। रिकॉर्ड से पता चला कि याचिकाकर्ता ने बीते छह महीनों में मरने वाले को लगभग 40 बार फ़ोन किया। इसी आधार पर पुलिस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया। याचिकाकर्ता ने एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील पेश की थी।
ठोस सबूत ना होने के कारण, कानूनी अहमियत नहीं
हाई कोर्ट के आदेशशकेा रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड CDR, जिन पर सरकारी वकील ने अपील करने वाले को फंसाने के लिए बहुत ज़्यादा भरोसा किया - उनके साथ कोई ठोस सबूत न होने के कारण उनकी क़ानूनी अहमियत बहुत कम है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुसाइड नोट में कथित धमकियों की प्रकृति, वे किस समय और किस जगह दी गईं, और उनके लिए कौन लोग ज़िम्मेदार थे - इन ज़रूरी बातों का ज़िक्र नहीं था। कोर्ट ने कहा, हालांकि नोट में 9 लोगों के नाम थे, लेकिन उनमें से किसी पर भी आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई ठोस आरोप या भूमिका नहीं लगाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, किसी आरोपी पर आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध का मुक़दमा चलाने के लिए ऐसा कोई सबूत होना चाहिए जिससे यह पता चले कि मृतक को बकाया चुकाने के लिए पीटा गया या उसके साथ शारीरिक हिंसा की गई। कोर्ट ने कहा, ऐसे किसी भी सबूत के अभाव में यह निष्कर्ष निकालना मुश्किल होगा कि अपीलकर्ता ने अपना बकाया मांगकर मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया गया है।
