कर्मचारियों की खबर: सरकारी कर्मचारियों को उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश देना नियोक्ता के विवेक पर निर्भर, हाई कोर्ट ने कहा- यह न्यायालय का अधिकार नहीं
Bilaspur High Court: Phd के लिए अध्ययन अवकाश की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा, उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश देना कोर्ट का अधिकार नहीं है...

फोटो सोर्स- NPG News
बिलासपुर। 09 मार्च 2026|Phd के लिए अध्ययन अवकाश की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा, उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश देना कोर्ट का अधिकार नहीं है, यह नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने कहा, अध्ययन अवकाश के दौरान कर्मचारी को वेतन और अन्य सुविधाएं मिलती रहती हैं, जो सार्वजनिक धन से दी जाती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि उच्च शिक्षा पर किया गया यह निवेश संस्थान और समाज के व्यापक हित में उपयोगी हो। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने साफ कहा है,
सरकारी कर्मचारियों को उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश देना उनका अधिकार नहीं है बल्कि यह नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है। इस टिप्पणी के साथ डिवीजन बेंच ने गणित के एक व्याख्याता की अपील खारिज की, जिसमें उन्होंने Phd करने के लिए अध्ययन अवकाश की मांग की थी।
पढ़िए क्या है मामला?
छत्तीसगढ़ के एक शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में कार्यरत गणित के लेक्चरार ने Phd करने के लिए कॉलेज के प्राचार्य के माध्यम से अनुमति मांगी थी। प्राचार्य ने उनका आवेदन कौशल विकास विभाग के सचिव को फारवर्ड कर दिया था। इसके बाद उन्होंने रायपुर स्थित एक शासकीय पोस्ट ग्रेजुएट साइंस कॉलेज में पीएचडी करने के लिए एडमिशन भी ले लिया और अध्ययन अवकाश के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उनका आवेदन कौशल विकास विभाग में लंबे समय तक लंबित रहा। कौशल विकास विभाग से किसी तरह का कोई जवाब ना आने पर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में याचिका दायर कर अध्ययन अवकाश की मांग की। मामले की सुनवाई के बाद सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश तभी दिया जा सकता है, जब अभ्यर्थी किसी राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में प्रवेश ले। याचिकाकर्ता इस शर्त को पूरा करने में असफल रहा है।
सिंगल बेंच के फैसले को डिवीजन बेंच में दी थी चुनौती
सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने डिवीजन बेंच में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में हुई। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, सरकारी कर्मचारी को वही पाठ्यक्रम करने की अनुमति दी जा सकती है, जो उसके संस्थान के हित और उन्नति में सहायक हो। बेंच ने कहा, अध्ययन अवकाश के दौरान कर्मचारी को वेतन और अन्य सुविधाएं मिलती रहती हैं, जो सार्वजनिक धन से दी जाती हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि उच्च शिक्षा पर किया गया यह निवेश संस्थान और समाज के व्यापक हित में उपयोगी हो।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने ये दी दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने डिवीजन बेंच के समक्ष तर्क पेश करते हुए कहा, याचिकाकर्ता ने पीएचडी जैसे सर्वोच्च शैक्षणिक पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया है, इसलिए उन्हें अध्ययन अवकाश मिलना चाहिए। उन्होंने वर्ष 2022 की उस नीति का भी हवाला दिया जिसमें पीएचडी के लिए अध्ययन अवकाश से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। हाई कोर्ट ने कहा, नीति में स्पष्ट रूप से यह शर्त है कि प्रवेश राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में होना चाहिए, जबकि याचिकाकर्ता इस मानदंड को पूरा नहीं कर पाए। हाई कोर्ट ने कहा, उच्च शिक्षा के लिए अध्ययन अवकाश मांगना कर्मचारी का अधिकार नहीं है बल्कि यह पूरी तरह से नियोक्ता के विवेक और सेवा की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। सिंगल बेंच के फैसले को सही ठहराते हुए डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।
