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बिलासपुर हाई कोर्ट: हिंदू रीति-रिवाजों से जनजाति सदस्यों के विवाह से जुड़ा अहम फैसला, हाई कोर्ट ने कहा...

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करने वाले अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सदस्यों को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता है।

Bilaspur High Court
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फोटो सोर्स- NPG News

By Radhakishan Sharma

बिलासपुर। 07 मार्च 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करने वाले अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सदस्यों को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों से बाहर नहीं रखा जा सकता है।

जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने यह फैसला फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द करते हुए दिया, जिसमें एक आदिवासी पति और उसकी अनुसूचित जाति की पत्नी से संबंधित आपसी तलाक की याचिका को खारिज कर दिया गया था। दंपत्ति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत अपने विवाह को भंग करने के लिए बस्तर के जगदलपुर स्थित पारिवारिक न्यायालय में याचिका दायर की थी। यह दंपत्ति, जिनकी शादी को 20 वर्ष हो चुके हैं, 15 अप्रैल, 2009 से वे अलग रह रहे थे।

जगदलपुर परिवार न्यायालय ने बीते साल 12 अगस्त को अधिनियम की धारा 2(2) का हवाला देते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया है कि अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता है जब तक कि केंद्र अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्देश न दे। हाई कोर्ट ने गौर किया कि दोनों पक्षों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उनका विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था, जिसमें 'सप्तपदी' की रस्म भी शामिल थी, और उन्होंने गवाही दी कि वे आदिवासी रीति-रिवाजों के बजाय हिंदू परंपराओं का पालन करते हैं।

हाई कोर्ट ने टिप्पणी की, "जब किसी जनजाति के सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों, परंपराओं और अनुष्ठानों का पालन करना चुनते हैं, तो उन्हें 1955 के अधिनियम के प्रावधानों के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता है।"

फैमिली कोर्ट ने क्या सुनाया था फैसला

फैमिली कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा, 1955 के एक्ट के सेक्शन 2(2) के आधार पर, यह एक्ट अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होता है और इसलिए आपसी सहमति के आधार पर तलाक की मांग करने वाली सेक्शन 13 B के तहत याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता, जिसे चुनौती दी गई थी।

क्या है मामला?

बस्तर निवासी अपीलकर्ता पत्नी अनुसूचित जाति से हैं, पति अनुसूचित जनजाति से हैं। उनकी शादी 15-4-2009 को हुई थी और 28-12-2011 को उन्हें एक बेटा हुआ, जो पत्नी के साथ रह रहा है और उसके बाद, वे 6-4-2014 से अलग रहने लगे। दोनों ने आपसी सहमति से 1955 के एक्ट के सेक्शन 13B के तहत तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा, उनके बीच शादी हिंदू रीति-रिवाजों और रस्मों के अनुसार हुई थी, जिसमें सप्तपदी करना भी शामिल है और वे हिंदुओं के रीति-रिवाजों को मान रहे हैं, अपने समुदाय के नहीं। हिन्दू बन गए है। परिवार न्यायालय ने अनुसूचित जनजाति समुदाय में हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होने के आधार पर खारिज किया था।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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