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Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का फैसला: बिजली कनेक्शन के लिए नए मालिक को पिछले मालिक की बकाया राशि का करना होगा भुगतान ....

Bilaspur High Court: बकाया बिल की वसूली को लेकर हाई काेर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा है, विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 की धारा 49 के तहत यह शर्त है कि विद्युत आपूर्ति प्रदान करने से पहले नए मालिक को पिछले मालिक की बकाया राशि का भुगतान करना होगा, क्योंकि यह एक वैधानिक प्रक्रिया है और खरीदार पर बाध्यकारी है। पढ़िए किस मामले में हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।

Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का फैसला: बिजली कनेक्शन के लिए नए मालिक को पिछले मालिक की बकाया राशि का करना होगा भुगतान ....
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By Radhakishan Sharma

Bilaspur High Court: बिलासपुर। बकाया बिल की वसूली को लेकर हाई काेर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में कहा है, विद्युत (आपूर्ति) अधिनियम, 1948 की धारा 49 के तहत यह शर्त है कि विद्युत आपूर्ति प्रदान करने से पहले नए मालिक को पिछले मालिक की बकाया राशि का भुगतान करना होगा, क्योंकि यह एक वैधानिक प्रक्रिया है और खरीदार पर बाध्यकारी है।

पॉलीबॉन्ड रॉक फाइबर प्राइवेट लिमिटेड ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने बैंक अधिकारियों सहित, संयुक्त रूप से और अलग-अलग, बिजली कनेक्शन प्रदान करने के लिए अवैध रूप से वसूल की गई राशि को प्रचलित बैंक दर पर ब्याज सहित वापस करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने बैंक ऑफ इंडिया पर आरोप लगाया है कि नीलामी से पहले कई वर्षों तक संपत्ति पर कब्जा होने के बावजूद मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपने विज्ञापन में मौजूदा बकाया बिजली बिल का खुलासा नहीं किया है।

अरिहंत रॉक वूल फाइबर प्राइवेट लिमिटेड, राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव तहसील के बकल गांव में स्थित खसरा संख्या 887/1 और 888 वाली 2.04 एकड़ भूमि पर एक संयंत्र संचालित करती थी। उक्त संयंत्र के संचालन के लिए, अरिहंत ने बैंक ऑफ इंडिया से ऋण लिया था। हालांकि, अरिहंत द्वारा ऋण राशि के पुनर्भुगतान में चूक के कारण, बैंक ने प्रतिभूतिकरण और वित्तीय परिसंपत्तियों के पुनर्निर्माण और सुरक्षा हित प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के तहत बैंक ने अरिहंत की संपत्ति पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उक्त संपत्ति की बिक्री के लिए 19 अप्रैल 2012 को नीलामी सूचना प्रकाशित की गई। इस प्रक्रिया में याचिकाकर्ता कंपनी ने भाग लिया और सफल घोषित होने पर उसने 2,62,18,000 रुपये का विक्रय मूल्य अदा किया। इसके बाद बैंक ने अरिहंत की चल और अचल संपत्तियों के विक्रय प्रमाण पत्र याचिकाकर्ता कंपनी को सौंप दिया। याचिकाकर्ता के अनुसार, विक्रय प्रमाण पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि 'अनुसूचीबद्ध संपत्ति की बिक्री सुरक्षित लेनदार को ज्ञात सभी भारों से मुक्त थी'।

जब उसने उत्पादन शुरू करने या संयंत्र चलाने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड CSPDCL से बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन किया। उस समय उसे पता चला कि अरिहंत पर 2008 से बिजली बिल बकाया है, जिसके कारण बिजली कनेक्शन स्थायी रूप से काट दिया गया है। याचिकाकर्ता केअनुसार उसने अधिकारियों को यह समझाने की पूरी कोशिश की कि वे अरिहंत के किसी भी बिजली बिल का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इसके बावजूद,CSPDCL ने याचिकाकर्ता से 17,67,873 रुपये का भुगतान करने को कहा, अन्यथा वसूली की कार्यवाही शुरू की जाएगी। तत्काल बिजली कनेक्शन प्राप्त करने के लिए, याचिकाकर्ता ने उक्त राशि का भुगतान कर दिया और उसके बाद से इस राशि की वापसी के लिए दर-दर भटक रहा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, बैंक ऑफ इंडिया ने भी अपनी जिम्मेदारी से इनकार कर दिया है और यहां तक ​​कि CSPDCL ने भी इस संबंध में याचिकाकर्ता के अनुरोध को स्वीकार नहीं कर रहा है।

0 बिजली कंपनी ब्याज सहित लौटाए राशि

याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता ने सिंगल बेंच के समक्ष तर्क दिया कि बिजली कंपनी द्वारा की गई कार्रवाई अवैध, मनमानी और विधिवत रूप से अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता से वसूल की गई राशि वसूली की तिथि पर समय सीमा से बाहर हो गई थी और चूंकि समय सीमा से बाहर हो चुकी ऋण राशि याचिकाकर्ता द्वारा देय नहीं है, इसलिए CSPDCL ब्याज सहित राशि वापस करने के लिए बाध्य हैं। बिजली कंपनी की यह कार्रवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 300 ए के तहत याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

बिजली कंपनी ने कहा: बकाया बिल का भुगतान करने की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की है

बिजली कंपनी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, यह याचिका धन संबंधी दावे से संबंधित है, जिसके लिए तीन वर्ष की अवधि के भीतर मुकदमा दायर किया जा सकता था। यह याचिका परिसीमा अवधि के बाद दायर की गई है। याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से बिजली कंपनी से संपर्क किया था और पहले 25% बकाया राशि का भुगतान करने और शेष राशि का भुगतान 10 किस्तों में करने का वचन दिया था। इसलिए, उसे पीछे हटने और राशि की वापसी की मांग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता ने वापसी के लिए विद्युत उपभोक्ता निवारण फोरम से भी संपर्क किया था। वकील ने यह भी तर्क दिया कि कंपनी ने नियमों के अनुसार कार्य किया है, जिसे किसी भी तरह से मनमाना या अवैध नहीं कहा जा सकता। याचिकाकर्ताओं या नीलामी में शामिल किसी भी पक्ष द्वारा परिसर की नीलामी या खरीदी के बारे में बिजली कंपनी को कभी सूचित नहीं किया गया था।

बैंक ने रखा अपना पक्ष, नीलामी की शर्त को रखा सामने

बैंक ऑफ इंडिया की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा कि नीलामी सूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नीलामी 'जैसी है, जहां है' के आधार पर होगी। उक्त नीलामी सूचना के अनुसार, नीलामी के समय गिरवी रखी गई संपत्ति पर यदि कोई उत्पाद शुल्क, संपत्ति कर, आयकर और अन्य कर एवं बकाया राशि है, तो सफल बोलीदाता को नीलामी प्रक्रिया में भाग लेने से पहले अज्ञात बकाया राशि के बारे में जानकारी प्राप्त करनी होगी। लिहाजा याचिकाकर्ता की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अरिहंत की बकाया राशि और देनदारियों से संबंधित सभी जानकारी प्राप्त करे। बैंक को बकाया बिजली बिल की जानकारी नहीं है। इसलिए, यदि याचिकाकर्ताओं द्वारा बिजली बिल जमा किया गया है, तो बैंक उसे वापस करने के लिए जवाबदार नहीं है।

हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस बीडी गुरु ने अपने फैसले में लिखा है, यह एक स्वीकृत तथ्य है कि विचाराधीन संपत्ति को 'जैसा है जहां है' के आधार पर नीलामी में बेचा गया था। 'जैसा है जहां है' के आधार पर बिक्री का अर्थ है कि क्रेता संपत्ति को उसके सभी मौजूदा अधिकारों, दायित्वों और देनदारियों सहित प्राप्त करेगा। जब कोई संपत्ति 'जैसा है जहां है' के आधार पर बेची जाती है, तो संपत्ति पर मौजूद सभी भार बिक्री के साथ ही क्रेता को हस्तांतरित हो जाते हैं।

कोर्ट ने कहा, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि ई-नीलामी के मामलों में, बिजली बिलों का अस्तित्व, चाहे उनका निर्धारण किया गया हो या नहीं, क्रेता के दायित्व के रूप में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है और बिक्री 'जैसा है जहां है' के आधार पर है, यानी जो कुछ भी है और बिना किसी प्रतिफल के, इसमें कोई संदेह नहीं है कि नीलामी क्रेता पर बिजली बिलों का भुगतान करने का दायित्व मौजूद है।

यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि जब नीलामी बिक्री समझौते में उपयुक्त 'जैसा है जहां है' आधार खंड शामिल किया जाता है, तो इच्छुक खरीदार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह संपत्ति के संबंध में लंबित बकाया राशि के बारे में सभी पहलुओं से स्वयं को संतुष्ट कर ले। नीलामी में, खरीदार को परिसर का निरीक्षण करने और उपलब्ध सुविधाओं की जांच करने का अधिकार है, जिसमें यह भी शामिल है कि परिसर में बिजली की आपूर्ति है या नहीं। वास्तव में, उचित सावधानी बरतने पर बिजली कनेक्शन कटने की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है, जिससे एक समझदार खरीदार बिजली कनेक्शन कटने के कारणों की उचित जांच करने के लिए बाध्य होता है। जब किसी परिसर में बिजली की आपूर्ति काट दी गई हो, तो खरीदार के लिए यह दावा करना निराधार होगा कि उसे बकाया बिजली बिलों की जानकारी नहीं थी।

कोर्ट ने कहा, विद्युत (प्रदाय) अधिनियम, 1948 की धारा 49 के शर्त अनुसार, नये मालिक को विद्युत प्रवाह प्रदाय करने से पूर्व पुराने मालिक के बकाया के पूर्ण भुगतान की आवश्यकता है, क्योंकि यह वैधानिक प्रकृति का है तथा खरीदार पर बंधनकारी है। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए बिजली कंपनी द्वारा की गई बकाया वसूली की कार्रवाई को सही ठहराया है।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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