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Bilaspur High Court: दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद मनोज के रिहाई का हाई कोर्ट ने दिया आदेश...

Bilaspur High Court: दोहरे हत्याकांड के आरोपी मनोज अग्रवाल के रिहाई को लेकर हाई कोर्ट ने आदेश जारी किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने अंडर सिकरेट्री जेल के आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया है। पढ़िए डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में क्या कहा है।

Bilaspur High Court: दोहरे हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद मनोज के रिहाई का हाई कोर्ट ने दिया आदेश...
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By Radhakishan Sharma

Bilaspur High Court: बिलासपुर। दोहरे हत्याकांड के आरोपी मनोज अग्रवाल के रिहाई को लेकर हाई कोर्ट ने आदेश जारी किया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने अंडर सिकरेट्री जेल के आदेश को रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया है। पढ़िए डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में क्या कहा है।

मनोज अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई काेर्ट में याचिका दायर कर रिहाई की गुहार लगाई थी। याचिका में बताया है, परिवीक्षा पर रिहाई के लिए दिए गए आवेदन को अंडर सिकरेट्री जेल ने 01 मई.2025 के आदेश द्वारा अस्वीकार कर दिया है, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य परिवीक्षा बोर्ड की सिफारिश को ही सहमति दी गई है। बोर्ड ने 15 अप्रैल 2025 को हुई अपनी बैठक में उसके पक्ष में सिफारिश करने से इंकार कर दिया है। याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, याचिकाकर्ता को बिलासपुर, जिला बिलासपुर के सत्र न्यायाधीश द्वारा 30 अप्रैल 2012 को पारित निर्णय के अनुसार आईपीसी की धारा 147, 148, 302, 302/149 और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है और याचिकाकर्ता 09 जून 2010 से 02.अप्रैल 2016, 18 अप्रैल .2016 से 02.जुलाई .2020, 31.जनवरी.2021 से 05.मार्च .2021 तक जेल में रहा है। उसके बाद से वह 16.मार्च .2021 से जेल में है। वकील ने आगे यह तर्क दिया कि परिवीक्षा पर रिहाई के लिए आवेदन मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया गया है कि याचिकाकर्ता ने कारावास संबंधी अपराध किए हैं, जबकि वर्ष 2018 के बाद कोई कारावास संबंधी अपराध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल कारावास संबंधी अपराध के आधार पर याचिकाकर्ता को परिवीक्षा का लाभ देने से इंकार नहीं किया जा सकता।

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी ने अंडर सिकरेट्री जेल के आदेश का समर्थन करते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ता द्वारा की गई प्रार्थना का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ तीन कारावास अपराध दर्ज हैं और इसलिए वह किसी भी राहत का हकदार नहीं है।

बोर्ड ने जेल से रिहा ना करने की थी सिफारिश

राज्य परिवीक्षा बोर्ड ने 15 अप्रैल 2025 को आयोजित अपनी बैठक में याचिकाकर्ता के मामले को 4 अन्य मामलों के साथ विचार के लिए लिया था। विचार-विमर्श के दौरान, राज्य परिवीक्षा बोर्ड ने पाया है कि 25 मार्च 2025 तक याचिकाकर्ता ने 14 वर्ष और 8 महीने की कारावास की सजा पूरी कर ली है। बोर्ड ने आगे पाया है कि याचिकाकर्ता को अपने मित्रों के साथ गैरकानूनी गैंग बनाकर अवैध हथियार से नानका सोनकर और गुड्डा सोनकर की हत्या करने के अपराध में दोषी ठहराया गया था। याचिकाकर्ता द्वारा किया गया अपराध एक गंभीर अमानवीय अपराध है और जघन्य प्रकृति का है। बोर्ड ने यह भी पाया है कि जेल में रहते हुए याचिकाकर्ता ने तीन बार जेल के नियमों का उल्लंघन किया, जिसके लिए जेल अधीक्षक ने उसे 5 दिनों की अर्जित कारावास छूट जब्त किया था।

उच्च अधिकारियों के दौरे के दौरान बैरक में अनुपस्थित रहने पर चेतावनी देकर और 1600 रुपये नकद रखने के कारण 10 दिनों की अर्जित कारावास छूट जब्त करके दंडित किया। बोर्ड की सिफारिश से यह प्रतीत होता है कि जेल में भी याचिकाकर्ता का आचरण और व्यवहार अच्छा नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में, स्टेशन हाउस ऑफिसर, पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की गई सिफारिश याचिकाकर्ता के मामले में किसी भी प्रकार से सहायक नहीं है। रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद, राज्य परिवीक्षा बोर्ड ने याचिकाकर्ता के मामले को परिवीक्षा पर रिहाई के लिए उपयुक्त नहीं पाया है और बोर्ड ने याचिकाकर्ता को जेल से रिहा न करने की सिफारिश की है।

हाई कोर्ट ने जारी किया रिहाई का आदेश, अंडर सिकरेट्री जेल के आदेश को किया खारिज

डिवीजन बेंच ने कहा, बोर्ड की बैठक के कार्यवृत्त के अवलोकन से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता की परिवीक्षा पर रिहाई की प्रार्थना मुख्य रूप से याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता और याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज तीन कारावास अपराधों के आधार पर अस्वीकृत कर दी गई है। अपराध की गंभीरता के अतिरिक्त, याचिकाकर्ता की परिवीक्षा याचिका को अस्वीकृत करने का कोई वैध कारण नहीं है। जहां तक ​​कारावास अपराध का संबंध है, वर्ष 2018 के बाद याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई और कारावास अपराध दर्ज नहीं है, इसलिए वर्ष 2013 और 2018 के बीच याचिकाकर्ता के विरुद्ध दर्ज कारावास अपराध इस समय परिवीक्षा याचिका को अस्वीकृत करने का वैध आधार नहीं हो सकते।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा

याचिकाकर्ता द्वारा किए गए अपराध की गंभीरता के संबंध में, याचिकाकर्ता द्वारा भुगती गई वास्तविक हिरासत की अवधि के साथ ही इस पर विचार किया जाना चाहिए, विशेष रूप से तब जब यह दिखाने के लिए कोई और सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता भविष्य में अपराध कर सकता है और इसके अलावा, बिलासपुर शहर कोतवाली पुलिस स्टेशन के स्टेशन प्रभारी, पुलिस अधीक्षक, बिलासपुर और जिला मजिस्ट्रेट, बिलासपुर द्वारा याचिकाकर्ता के पक्ष में सिफारिश की गई थी।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि याचिकाकर्ता ने कारावास की सजा पूरी कर ली है। याचिकाकर्ता ने 14 वर्ष और 8 महीने है और 4 फरवरी 2025 तक उसे 3 वर्ष और 5 महीने 25 दिन की छूट मिल चुकी है। इस छूट को मिलाकर याचिकाकर्ता की सजा काटने की आयु 18 वर्ष पूरी हो चुकी है। इस मामले को न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को तीन बार पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जा चुका है, लेकिन फिर भी याचिकाकर्ता की परिवीक्षा पर रिहाई की अर्जी निराधार आधारों पर खारिज कर दी गई है। अतः, विवादित आदेश विधिवत नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में लिखा है, अंडर सिकरेट्री जेल द्वारा 01मई 2025 को पारित विवादित आदेश विधि की दृष्टि से मान्य नहीं है, अतः इसे रद्द किया जाता है और याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारी की संतुष्टि के अधीन, शर्तों और प्रावधानों के अधीन, छत्तीसगढ़ कैदी परिवीक्षा रिहाई अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के तहत रिहा करने का निर्देश दिया जाता है। उपरोक्त टिप्पणियों/निर्देशों के साथ, यह रिट याचिका स्वीकार की जाती है।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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