Bilaspur High Court: दान के एवज में बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी, हाई कोर्ट ने रद्द की गिफ्ट डीड, पढ़िए क्या है मामला
Bilaspur High Court: बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने दान और उसके एवज में बुजुर्गों की सेवा सुश्रुसा की जिम्मेदारी को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस एनके व्यास ने अपने फैसले में कहा है, दान देने वाले बुजुर्गों ने दान देते वक्त भले ही अपनी देखभाल की शर्त ना रखी हो, जिसने दान लिया है यह उसकी जिम्मेदारी बनती है कि बुजुर्ग दंपत्ति की देखभाल करे। यह जिम्मेदारी उठानी जरुरी है। बेदखली के बाद वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग दंपत्ति को उसकी संपत्ति पर काबिज करने का आदेश देते हुए हाई कोर्ट ने गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया है।

Bilaspur High Court: बिलासपुर। बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने दान और उसके एवज में बुजुर्गों की सेवा सुश्रुसा की जिम्मेदारी को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस एनके व्यास ने अपने फैसले में कहा है, दान देने वाले बुजुर्गों ने दान देते वक्त भले ही अपनी देखभाल की शर्त ना रखी हो, जिसने दान लिया है यह उसकी जिम्मेदारी बनती है कि बुजुर्ग दंपत्ति की देखभाल करे। यह जिम्मेदारी उठानी जरुरी है। बेदखली के बाद वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्ग दंपत्ति को उसकी संपत्ति पर काबिज करने का आदेश देते हुए हाई कोर्ट ने गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया है।
छत्तीसगढ़ बिलासपुर के कोनी निवासी बुजुर्ग दंपति से संपत्ति दान में लेने के बाद बेटी और भतीजे ने बेदखल कर दिया। बुजुर्ग दंपत्ति ने बेटी व भतीजे को अपनी संपत्ति इस उम्मीद से दिया था कि वे उनके बुढ़ापे का सहारा बनेंगे और उसकी देखभाल करेंगे। देखभाल करने के बाद बेटी व भतीजे ने बुजुर्गों को उनके ही घर से बेदखल कर दिया। बेदखली के बाद मजबूरीवश वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। इससे परेशान और नाराज बुजुर्ग सुरेशमणि तिवारी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से मामला पेश किया। मामले की सुनवाई के बाद एसडीएम व कलेक्टर ने दंपत्ति के पक्ष में फैसला सुनाया। कलेक्टर के आदेश को चुनौती देते हुए रामकृष्ण पांडेय ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस एनके व्यास के सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज करते हुए बुजुर्ग दंपत्ति के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने गिफ्ट डीड को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पूर्व में जारी अंतरिम आदेश को भी निरस्त कर दिया है।
क्या है मामला
छत्तीसगढ़ बिलासपुर कोनी के कंचन विहार निवासी 83 वर्षीय सुरेशमणि तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी ने 2016 में अपने भतीजे रामकृष्ण पांडेय के नाम 1250 वर्ग फीट जमीन और उस पर बने मकान को दान में दे दिया था। बुजुर्ग दंपती का कोई बेटा नहीं है। भतीजे को संपत्ति इस भरोसे में दान की थी कि जीवनभर उसकी व पत्नी की देखभाल करेगा। सुरेशमिण का आरोप है संपत्ति दान में मिलने के बाद भतीजा और उसकी बेटी का व्यवहार बदल गया। बेटी ने पहली मंजिल पर बने कमरों में रहने के लिए मजबूर कर दिया। अस्वस्थता के कारण उन दाेनों को सीढ़िया चढ़ने और उतरने में काफी दिक्कतें होती थी। दो वक्त का भोजन भी नहीं दे रहे थे। जरुरी सामान भी नहीं मिल पा रहा था। उऊपरी मंजिल का बिजली कनेक्शन काट दिया। उसके एटीएम कार्ड से 30 लाख रुपये निकाल लिए।
ये है जरुरी प्रावधान
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 में बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर जरुरी प्रावधान बनाए गए हैं। प्रावधान में स्पष्ट है कि कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति किसी व्यक्ति को सशर्त दान करता है तब यह एक कानूनी समझौता बन जाता है। ऐसी स्थिति में दान देने वाले बुजुर्ग की देखभाल और बुनियादी जरुरतों को पूरा करना होगा। कानून में यह भी प्रावधान है कि संपत्ति लेने के बाद यदि वह व्यक्ति बुजुर्ग की देखभाल करने से इंकार कर देता है या उन्हें प्रताड़ित करता है, तो
कानून के तहत उस संपत्ति के हस्तांतरण को धोखाधड़ी, जबरदस्ती या अनुचित प्रभाव से किया गया माना जाएगा। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ नागरिक को मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल में आवेदन करने का अधिकार दिया गया है।
मामले की सुनवाई के बाद जस्टिस एनके व्यास ने अपने फैसले में कहा है, गिफ्ट डीड प्यार और स्नेह के आधार पर इस उम्मीद में दी गई थी कि भविष्य में बुजुर्ग दंपत्ति का भजीता और बेटी ख्याल रखेंगे। जब देखभाल की शर्त का उल्लंघन हुआ और बुजुर्गों को प्रताड़ित किया गया, तो ट्रिब्यूनल का गिफ्ट डीड को रद्द करने का फैसला सही है। कोर्ट ने बुजुर्ग दंपति को राहत देते हुए याचिकाकर्ता भतीजा और बेटी की याचिका को खारिज कर दिया है।
कोर्ट ने कहा: वृद्ध दंपति के प्रति अपने दायित्वाें का याचिकाकर्ता ने नहीं किया निर्वहन
जस्टिस एनके व्यास ने अपने फैसले में लिखा है, जिससे यह सिद्ध होता है कि याचिकाकर्ता वृद्ध व्यक्तियों के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करने में विफल रहा है। इसके अलावा, उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट है कि यद्यपि स्पष्ट रूप से नहीं, फिर भी वृद्ध दंपति के जीवनकाल तक ऐसी देखभाल जारी रखने की निहित शर्त मौजूद है।
अतः, अधिनियम, 2007 की धारा 23 के प्रावधानों को लागू करके उपहार विलेख को शून्य घोषित करने के लिए इसे लिखित शर्त के रूप में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अधिनियम, 2007 एक लाभकारी कानून है और इस पर कठोर दृष्टिकोण इसके उद्देश्यों को विफल कर देगा। इसलिए, उपहार के रूप में संपत्ति के इस हस्तांतरण से जुड़ी यह एक निहित शर्त थी जिसे हस्तांतरिती द्वारा पूरा नहीं किया गया था। अतः यह मामला अधिनियम की धारा 23 को लागू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुदेश छिकारा और उर्मिला दीक्षित के मामलों में स्पष्ट की गई दो शर्तों को पूर्णतः संतुष्ट करता है।
अतः, यह अनुचित प्रभाव के कारण किया गया हस्तांतरण है जो हस्तांतरणकर्ता के अनुरोध पर रद्द करने योग्य हो जाता है और भरण-पोषण न्यायाधिकरण को हस्तांतरण को शून्य घोषित करने का अधिकार प्राप्त है। अतः, न्यायाधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेशों में इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।
हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
यह एक सुस्थापित सिद्धांत है कि उच्च न्यायालय, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता और तथ्यों के निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता जब तक कि निचली अदालतों ने या तो अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन न किया हो या विकृत तरीके से कार्य न किया हो।
याचिकाकर्ता विवादित आदेशों या कार्यवाही में किसी भी प्रकार की विकृति या अवैधता को इंगित करने में असमर्थ हैं जिसके लिए इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता हो, तदनुसार इस न्यायालय द्वारा निर्धारित निर्णय याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध और वृद्ध दंपति के पक्ष में दिया जाता है। रिट याचिका योग्यताहीन है और इसे एतद्द्वारा खारिज किया जाता है। सिंगल बेंच ने न्यायालय द्वारा 07 जनवरी 2025 को पारित अंतरिम आदेश को भी रद्द कर दिया है।
