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Bilaspur High Court: 10 मिनट तक प्रायवेट पार्ट से प्रायवेट पार्ट रगड़ना रेप नहीं..., इलाहाबाद की तरह बिलासपुर हाई कोर्ट का दुष्कर्म पर अहम फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने आज ही पलटा इलाहाबाद कोर्ट का फैसला

Bilaspur High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्तन दबाना और नाड़ा खींचने को दुष्कर्म नहीं माना था, दुष्कर्म पर इसी तरह का एक अहम फैसला आज बिलासपुर हाई कोर्ट से आया। महिला के प्रायवेट पार्ट पर 10 मिनट तक प्रायवेट पार्ट रगड़ने को कोर्ट ने दुष्कर्म नहीं माना है। हालांकि, पीड़िता ने प्रारंभिक बयान में माना था कि उसके साथ पेनिटेशन हुआ मगर बाद में पुलिस की लंबी पूछताछ में उसने कहा कि आरोपी ने प्रायवेट पार्ट को मेरे प्रायवेट पार्ट को सिर्फ रगड़ा था। इसके बाद हाई कोर्ट ने आरोपी की सजा सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया। उधर, आज ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को गलत बताते हुए तीखी टिप्पणी की है।

Bilaspur High Court: 10 मिनट तक प्रायवेट पार्ट से प्रायवेट पार्ट रगड़ना रेप नहीं..., इलाहाबाद की तरह बिलासपुर हाई कोर्ट का दुष्कर्म पर अहम फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने आज ही पलटा इलाहाबाद कोर्ट का फैसला
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Bilaspur High Court- NPG News

By Radhakishan Sharma

Bilaspur High Court: रायपुर। दुष्कर्म और दुष्कर्म के प्रयास को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आया है। पीड़िता ने पुलिस थाने में जब शिकायत दर्ज कराई थी, तब बयान दिया था कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके प्राइवेट पार्ट में प्रवेश कराया था, आरोपी ने पेनिट्रेशन किया था। अदालती कार्रवाई के दौरान पीडिता ने बयान में कहा, आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके प्राइवेट पार्ट के ऊपर करीब 10 मिनट तक रखा...आपस में रगड़ते रहा, लेकिन अंदर प्रवेश नहीं किया।

मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर डॉ. आशा त्रिपाठी ने अपनी गवाही में बताया, पीड़िता का हाइमन नहीं फटा था और योनि में केवल उंगली का पोर ही प्रवेश कर सकता था। इससे पूरा पेनिट्रेशन की पुष्टि नहीं होती। कोर्ट ने माना कि, आरोपी के पीड़िता को जबरन पकड़कर ले जाना, कपड़े उतारना, उसके जननांगों पर अपने जननांग रगड़ना ये सभी कृत्य गंभीर है और अपराध की मंशा साफ दिखता है। पर यह कानून की नजर में दुष्कर्म नहीं है, दुष्कर्म के प्रयास का मामला है। ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपी को दुष्कर्म की कोशिश के आरोप में सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया है।

एक साल पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था,नाबालिग के स्तन को पकड़ना, पायजामे की डोरी खोलना दुष्कर्म का प्रयास नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को स्वतरू संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई प्रारंभ की थी। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला गलत है।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने और उसके पायजामे की डोरी खोलने की कोशिश करना दुष्कर्म का प्रयास नहीं, बल्कि केवल “तैयारी” चतमचंतंजपवद है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन-जजों की खंडपीठ ने माना कि हाई कोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का स्पष्ट रूप से गलत अनुप्रयोग किया। अदालत ने विशेष न्यायाधीश च्व्ब्ैव्, कासगंज द्वारा जारी मूल समन आदेश बहाल कर दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के साथ च्व्ब्ैव् अधिनियम की धारा 18 (अपराध का प्रयास) के तहत आरोप तय किए गए थे।

यह तैयारी नहीं स्पष्ट रूप से दुष्कर्म का प्रयास था

अदालत ने कहा कि यदि तीसरे व्यक्तियों के हस्तक्षेप से आरोपी रुकते नहीं, तो अपराध पूरा हो सकता था, इसलिए यह केवल तैयारी नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से दुष्कर्म का प्रयास था। कोर्ट ने कहा कि आरोपों से स्पष्ट है कि आरोपियों ने पूर्वनियोजित इरादे से अपराध को अंजाम देने की दिशा में कदम बढ़ाए थे और पीड़िता की चीख सुनकर लोगों के पहुंचने के कारण ही अपराध आगे नहीं बढ़ सका।

क्या था मामला

मामला एक नाबालिग लड़की की मां द्वारा दायर शिकायत से उत्पन्न हुआ था। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने 11 वर्षीय बच्ची के स्तन पकड़े, उसके पायजामे की डोरी तोड़ी और उसे जबरन एक स्थान के नीचे खींचने की कोशिश की। ट्रायल कोर्ट ने इसे दुष्कर्म के प्रयास का मामला मानते हुए समन जारी किया था। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे “प्रयास” नहीं बल्कि “तैयारी” मानते हुए आरोप कम कर दिए और धारा 354ठ आईपीसी तथा च्व्ब्ैव् की धाराओं 9ध्10 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया था, जिनमें अपेक्षाकृत कम सजा का प्रावधान है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “तैयारी” और “प्रयास” में अंतर है, लेकिन इस मामले में आरोपी तैयारी की सीमा पार कर चुके थे और अपराध करने के लिए सक्रिय कदम उठा चुके थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट का आदेश स्थापित आपराधिक सिद्धांतों के प्रतिकूल और त्रुटिपूर्ण था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने लिया था स्वतरू संज्ञान

यह मामला पिछले वर्ष स्वतः संज्ञान ेनव उवजन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था। इससे पहले अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले के कुछ हिस्सों पर रोक लगाते हुए उसे “चैंकाने वाला” और “संवेदनहीन” बताया था। अब अंतिम निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के मूल समन आदेश को बहाल करते हुए निर्देश दिया कि मुकदमा उसी आधार पर आगे बढ़ेगा।।

Radhakishan Sharma

राधाकिशन शर्मा: शिक्षा: बीएससी, एमए राजनीति शास्त्र व हिन्दी साहित्य में मास्टर डिग्री, वर्ष 1998 से देशबंधु से पत्रकारिता की शुरुआत। हरिभूमि व दैनिक भास्कर में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया। 2007 से जुलाई 2024 तक नईदुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर व सिटी चीफ के पद पर कार्य का लंबा अनुभव। 1 अगस्त 2024 से एनपीजी न्यूज में कार्यरत।

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