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Bilaspur High Court: हाईकोर्ट से पूर्व महाधिवक्‍ता को झटका: सतीश चंद्र वर्मा पर मंडराने लगा गिरफ्तारी का खतरा

Bilaspur High Court: नान घोटाले में नाम आने के बाद छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने पूर्व महाधिवक्ता की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। दो महीने बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है।

Bilaspur High Court: जो कुछ हो रहा है उसे इग्नोर भी तो नहीं किया जा सकता
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Bilaspur High Court

By Radhakishan Sharma

Bilaspur High Court: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नान घोटाले में नाम आने के बाद पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। गुरुवार को हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया है।

नान घोटाले की चल रही एसीबी जांच को आईएएस अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के साथ मिलकर प्रभावित करने और साक्ष्यों को प्रभावित करने के मामले में एसीबी ने पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा के खिलाफ अपराध दर्ज किया था। एसीबी की कार्रवाई के बाद पूर्व महाधिवक्ता ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस रविंद्र अग्रवाल के सिंगल बेंच में हुई थी। सुनवाई के बाद जस्टिस अग्रवाल ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। दो महीने बाद जस्टिस अग्रवाल ने फैसला सुनाते हुए अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है।

वर्ष 2015 में हुए नान घोटाले की जांच के लिए पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने मामला ईडी को सौंप दिया था। ईडी इस मामले में ईसीआईआर दर्ज कर जांच कर रही थी। जब प्रदेश में नान घोटाला हुआ था तब आलोक शुक्ला नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष व आईएएस अनिल टुटेजा एमडी थे। नान घोटाले काे लेकर आईटी ने भी जांच शुरू की थी।

वाट्सएप चैटिंग में मामला हुआ उजागर

आईटी की जांच में डिजिटल साक्ष्य मिले थे। वाट्सएप चैटिंग व जरुरी दस्तावेज आईटी विभाग ने ईडी को सौंपा था। ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में पूर्व महाधिवक्ता वर्मा,आईएएस अनिल टूटेजा व आलोक शुक्ला के बीच वाट्सएप चैटिंग सहित महत्वपूर्ण दस्तावेज सौंपा था। इसमें ईडी ने पूर्व महाधिवक्ता पर आईएएस टूटेजा व आलोक शुक्ला के साथ मिलकर जांच को प्रभावित करने का गंभीर आरोप लगाया है।

ईओडब्ल्यू और एसीबी ने नान घोटाले में ईडी द्वारा प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू की थी। जांच में यह बात सामने आया था कि तीनों मिलकर जांच और सुनवाई को प्रभावित करने का काम कर रहे थे। इस मामले में आपराधिक षड्यंत्र का सबूत मिलने पर पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा के खिलाफ एसीबी ने अपराध दर्ज किया है।

एसीबी कोर्ट ने याचिका कर दी थी खाारिज

एसीबी द्वारा पूर्व महाधिवक्ता के खिलाफ अपराध दर्ज करने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए पूर्व महाधिवक्ता ने एसीबी कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन पेश किया था। मामले की सुनवाई के बाद एसीबी कोर्ट ने आवेदन को खारिज कर दिया था। स्पेशल कोर्ट से अग्रिम जमानत आवेदन खारिज होने के बाद उन्होंने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की थी। अपनी याचिका में उन्होंने बताया था कि महाधिवक्ता का पद संवैधानिक पद होता है और महाधिवक्ता के पद पर रहते हुए किए गए कार्य के लिए कोई केस दर्ज नहीं किया जा सकता। उनके खिलाफ असंवैधानिक रूप से केस दर्ज किया गया है। याचिका में बताया गया था कि महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा की जाती है इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही के लिए धारा 17 (ए ) के तहत अनुमति लेना जरूरी है। लेकिन इस केस में सरकार के द्वारा बिना कोई अनुमति लिए सीधे केस दर्ज कर लिया है। इसलिए यह प्रकरण चलन योग्य नहीं है।

शासन ने अपने जवाब में ये कहा था

राज्य शासन ने जवाब प्रस्तुत करते हुए कोर्ट को बताया था कि ईडी इस मामले की पूर्व में जांच कर चुकी है। जांच रिपोर्ट और वाट्सएप चैटिंग के अनुसार नान घोटाले में दर्ज प्रकरण में आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा को बचाने के लिए पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने षडयंत्र किया और गवाहों तथा साक्ष्यों को प्रभावित कर मामला हाई कोर्ट के समक्ष पेश किया ताकि दोनों अफसरों को मदद मिल सके।

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