Chaitra Navratri 2024 : आइये जानें माँ चंडी-खल्लारी की महिमा... भालू करते हैं माँ की पूजा, तो कहीं हुई थी महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा की शादी

नवरात्रि के इस पावन अवसर पर आज हम आपको महासमुंद जिले अंतर्गत ग्राम घुंचापाली चंडी माता, बिरकोनी माँ चंडी माता व माँ खल्लारी की महिमा और इतिहास से रूबरू करने जा रहे हैं. तो आइये जाने माँ की महिमा और इनके रूप को.

Update: 2024-04-09 16:47 GMT

आज यानि 9 अप्रैल से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है. हिंदू धर्म में इन 9 दिनों का विशेष महत्व होता है. नवरात्रि के ये 9 दिन मां दुर्गा को समर्पित होते हैं.

नवरात्रि के इस पावन अवसर पर आज हम आपको महासमुंद जिले अंतर्गत ग्राम घुंचापाली चंडी माता, बिरकोनी माँ चंडी माता व माँ खल्लारी की महिमा और इतिहास से रूबरू करने जा रहे हैं. तो आइये जाने माँ की महिमा और इनके रूप को. 


मां चंडी माता का मंदिर तंत्रोक्त सिद्धि के लिए प्रसिद्ध , प्रतिमा की ऊंचाई दिनों-दिन बढ़ रही



महासमुंद जिले अंतर्गत विकासखंड बागबाहरा के ग्राम घुंचापाली में चंडी माता का मंदिर स्थित है. जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर यह मंदिर काफी प्राचीन है. जानकर बताते हैं कि प्राचीन काल से मां चंडी माता आदिशक्ति का यह मंदिर तंत्रोक्त सिद्धि के लिए जाना जाता था. जहां सिर्फ तांत्रिक और अघोरियों का ही आना-जाना था. साल 1950-51 के आसपास लोगों के लिए चंडी माता मंदिर को खोल दिया गया.

चंडी माता की प्रतिमा की ऊंचाई दिनों-दिन बढ़ रही है. शुरुआत के दिनों में यह प्रतिमा छोटी थी. वर्तमान में मूर्ति की ऊंचाई 23 फीट है. बताया कि चंडी माता की इस प्राकृतिक महा प्रतिमा को देखने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं. यह मंदिर कई पहाड़ियों से घिरा हुआ है, इसलिए यहां का नजारा भी मनोरम है. मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को दो पहाड़ियों के बीच से होकर गुजरना पड़ता है. यह मंदिर 150 साल पुराना है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर में स्‍थापित मां चंडी की प्रतिमा स्‍वयंभू है। यही नहीं पहाड़ों पर स्थित मां के इस मंदिर का निर्माण कई बार किया गया है। बताते हैं कि इस मंदिर में स्‍थापित मां की प्रतिमा सल-दर-साल बढ़ रही है।

दर्शन करने आते हैं भालू

मां आदिशक्ति चंडी माता मंदिर में सिर्फ भक्त ही नहीं, यहां जंगली जानवर भी मां का दर्शन करने आते हैं. प्रत्येक दिन दोपहर से शाम के बीच पांच भालुओं का एक परिवार मां के दर्शन करने आता है और यहां प्रसाद ग्रहण करता है. श्रद्धालु भी भालुओं को प्रसाद देते हैं. इस नजारे को देखने के लिए शाम को श्रद्धालुओं की संख्या मंदिर में अधिक बढ़ जाती है.


सुनी गोद भरती है बिरकोनी स्थित माँ चंडी मईया



छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से लगभग 15 किलोमीटर व राजधानी रायपुर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर बिरकोनी गाँव में स्थित है माँ चंडी माता मंदिर जो माँ दुर्गा का ही एक रूप है. माँ चण्डी निःसंतान स्त्रियों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है कहते है की माँ चण्डी के आशीर्वाद से हर निःसंतान दंपति को संतान की प्राप्ति हो जाती है।

अगर बात आती है चण्डी माता मंदिर की तो पहले याद आता है बागबाहरा में स्थित चण्डी माता मंदिर का जो जिला महासमुंद में ही है। पर हम शायद ही यह जानते होंगे के महासमुंद जिले के ही एक अन्य गाँव बिरकोनी में स्थित है माँ चण्डी माता मंदिर जो एक शक्तिपीठ है जिसमे चण्डी माँ वास करती है। यह मंदिर यहाँ रहने वाले लोगो व आसपास के लोगो का आस्था का केंद्र है। 

माता चण्डी के बारे में कई कहानी व कथाये सुनने को मिलती है, जिसमें से माता चण्डी की बिरकोनी आकार निवास करने की कथा काफी प्रचलित है। स्थानीय लोग कहते है की माँ चण्डी पहले बिरकोनी से लगभग 15 किलोमीटर दूर ग्राम भोरिंग मे निवास करती थी। यही कारण है के उनका मूल ग्राम अभी भी भोरिंग को ही माना जाता है, लेकिन कहते हैं की  ग्रामीणों  से मान-सम्मान न मिलने के कारण माँ चंडी दाई खुद को अपमानित महसूस करने लगी व रुष्ठ होकर अपने दो बालकों के साथ गाँव से चली गई. गंतव्य के पूर्व निर्धारित न होने के व अकास्मिक ग्राम छोडने के कारण माँ ने निर्णय लिया की चलते-चलते जहां शाम ढलेगी वो वही निवास कर लेंगी. इस तरह विचार के साथ वे ग्राम भोरिंग से घनघोर जंगलों की ओर निकल पड़ी और जहां शाम ढली वही पाषाण रूप मे अपने दो छोटे बालकों के साथ स्थापित हो गई. बाद में  यही स्थान बिरकोनी के रूप में प्रचारित हो गया। ग्रामीणो की माने तो जब ग्राम भोरिंग के लोगो ने माँ से वापस ग्राम आने का निवेदन किया तो इसके लिए माँ ने एक शर्त रखी थी वो ये की कोई साधक पैदल यात्रा कर भोरिंग से बिरकोनी माँ के दर्शन हेतु आता है व जीतने कदम से चलकर वह आया हो उतने नारियल माँ को भेंट करे तो माँ फिर से भोरिंग आ सकती है” परंतु आज तक ऐसा हो न सका।


माता कन्या का रूप धारण करके खल्लारी में लगने वाले हाट बाजार में आती थी



माता खल्लारी का ये मंदिर छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले करीब 24 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. ये मंदिर एक ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है. प्राचीन काल में इस स्थान को खलवाटिका के नाम से जाना जाता था. बता दें कि माता के दर्शन के लिए भक्तों को करीब 850 सीढ़ियां चढ़नी पार करनी पड़ती है.

स्थानीय जनश्रुतियों की मानें तो इस गांव में खल्लारी माता का निवास था. यहां माता कन्या का रूप धारण करके खल्लारी में लगने वाले हाट बाजार में आती थी. इसी दौरान मेले में आया एक बंजारा माता के रूप पर मोहित हो गया और उनका पीछे करते हुए पहाड़ी पर पहुंच गया. जिससे माता बुरी तरह से क्रोधित हो गई और उन्होंने बंजारे को श्राप देकर उसे पत्थर में परिवर्तित कर दिया और खुद भी वहां विराजमान हो गईं.

खल्लारी मंदिर के आस-पास ऐसे कई स्थल हैं, जिनका इतिहास महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है। उपलब्ध शिलालेखों से यह जानकारी मिलती है कि यह मंदिर 1415 के आस-पास बना है। यह स्थान तात्कालीन हैहयवंशी राजा हरि ब्रह्मदेव की राजधानी था।

राजा हरि ब्रह्मदेव ने खल्लारी को अपनी राजधानी बनाया तो उन्होंने इसकी रक्षा के लिए मां खल्लारी की मूर्ति की स्थापना की थी। पश्चिम दिशा की तरफ भीम डोंगा नाम का विशाल पत्थर दिखता है। जिसका एक हिस्सा मैदान की तरफ तो दूसरा हिस्सा गहरी खाई की तरफ झुका हुआ है। एक छोटे पत्थर पर टिका नाव आकृति के इस पत्थर के संतुलन के कारण लोग यहां देखने के लिए आते हैं। यहां पैर की आकृति के बड़े निशान दिखते हैं।

यहां भीम का पांव भी दर्शनीय है। वहीं उत्तर दिशा की तरफ एक मूर्तिविहीन मंदिर है। इसे लाखागुड़ी या लाखा महल भी कहा जाता है। किवदंती है कि महाभारत काल में दुर्योधन ने पांडवों को षड्यंत्रपूर्वक समाप्त करने के लिए जो लाक्षागृह बनवाया था, वह यहीं पर बनवाया था। इसके अंदर एक गुफा भी है। जो गांव के बाहर की तरफ निकलती है। जहां मंदिर है उसे पहले खलवाटिका के नाम से जाना जाता था। माता की स्थापना के बाद से यह खल्लारी हो गया।

महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा का विवाह संपन्न हुआ था

भारत में अनेकों मंदिर और ऐसे शहरों का नाता रामायण और महाभारत से जुड़े हुआ है. इन्ही में से एक मंदिर है छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित माता खल्लारी का मंदिर. इस मंदिर को लेकर कहा जाता है कि यहां पर महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा का विवाह संपन्न हुआ था. 

कहा जाता है कि महाभारत काल के दौरान यहां पर एक हिडिंब नाम का राक्षस रहता था और उसकी एक बहन हिड़िंबा भी थी. वहीं जब महाबली भीम एक बार इस जगह पर विश्राम करने आए तो हिंडिबा उन्हें देखकर मोहित हो गई. लेकिन तभी हिडिंब राक्षस और भीम के साथ युद्ध हो गया. जिसमें राक्षस की मौत हो गई. इसके बाद माता कुंती के आदेश पर भीम ने राक्षसी हिंडिबा से विवाह किया। इस घटना के बाद से इस जगह को भीमखोज के नाम से भी जाना जाने लगा. बता दें कि इस मंदिर के अलावा यहां पर भीम चूल्हा, भीम की नाव स्थान भी मौजूद हैं.

वहीं मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के पास एक गुफा है जिसमें देवी माता की ऊंगली का निशान था. इसलिए मंदिर में भक्तों की गहरी आस्था है.


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