RI से CMO प्रमोशन का रास्ता साफ: पदोन्नति कर्मचारियों का मौलिक अधिकार नहीं, हाई कोर्ट ने पदोन्नति नियम को चुनौती देने वाली याचिका की खारिज

Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, पदोन्नति कर्मचारियों का मौलिक अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ सीएमओ की पदोन्नति नियम को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद अब RI से CMO के पद पर पदोन्नति का रास्ता साफ हो गया है।

Update: 2026-03-26 04:16 GMT

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बिलासपुर। जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा , पदोन्नति कर्मचारियों का मौलिक अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ सीएमओ की पदोन्नति नियम को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद अब RI से CMO के पद पर पदोन्नति का रास्ता साफ हो गया है।

डिवीजन बेंच ने राज्य के नगरीय प्रशासन विभाग के वर्ष 2017 के भर्ती नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा, RI राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी क्लास-बी के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र मानना पूरी तरह संवैधानिक है। यह किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है।

क्या है पूरा मामला ?

CMO मुख्य नगर पालिका अधिकारी के पद पर पदोन्नत हुए अधिकारियों, पुष्पा खलखो सहित अन्य ने हाई कोर्ट में अपने अधिवक्ताओं के जरिये अलग-अलग याचिका दायर की थी। इसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता सिविल पद पर कार्यरत अधिकारी हैं। राजस्व निरीक्षक नगरपालिका सेवक मात्र हैं। दो अलग-अलग वैधानिक श्रेणियों को एक समान मानकर पदोन्नति देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकार का हनन है। याचिकाकर्ताओं ने कहा, 2 फरवरी 2018 के आदेश के जरिए राजस्व निरीक्षकों को एक साल की सेवा में छूट देना असंवैधानिक है।

कोर्ट ने कहा, पदोन्नति का निर्णय सरकार का नीतिगत मामला

हाई कोर्ट के दीविंन बेंच ने अपने फैसले में कहा, पदोन्नति के लिए एक से अधिक फीडर कैडर तय करना और अलग-अलग पदों की समकक्षता निर्धारित करना पूरी तरह कार्यपालिका और सरकार के नीतिगत दायरे में आता है।

कोर्ट ने कहा, किसी कर्मचारी के पास पदोन्नति पाने का निहित अधिकार नहीं होता, बल्कि केवल नियमों के अनुसार पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार होता है।

सरकार का निर्णय असंवैधानिक नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि राजस्व निरीक्षकों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी CMO पद की दौड़ में शामिल करना असंवैधानिक नहीं है। कोर्ट के फैसले के साथ, राजस्व निरीक्षकों के लिए नगरीय निकायों में पदोन्नति की प्रक्रिया का रास्ता साफ हो गया है।

जनहित में दी गई थी वन टाइम रियायत

हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को भी सही ठहराया है, जिसके तहत राजस्व निरीक्षकों के लिए अनिवार्य 6 साल के अनुभव को घटाकर 5 साल कर दिया था। राज्य सरकार ने दलील दी थी, विभाग में अधिकारियों की कमी को देखते हुए वन टाइम रियायत जनहित में दी गई थी। ऐसे में इसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने याचिका को किया खारिज

हाई कोर्ट के डीविजन बेंच ने कहा, याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नियम स्पष्ट रूप से असंवैधानिक हैं, इसलिए याचिका निराधार है और खारिज की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हाई कोर्ट में दोबारा हुई सुनवाई

बता दें, हाई कोर्ट की एक अन्य बेंच ने इन प्रावधानों को अवैध घोषित कर दिया था। कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को सुनवाई के बाद पुराने आदेश को रद्द करते हुए याचिका की नए सिरे से सुनने के लिए मामला छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट वापस भेज दिया था।

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