Bilaspur High Court: संविदा कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर: हाई कोर्ट ने राज्य शासन को जारी किया ये निर्देश

Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का यह फैसला राज्य शासन के विभिन्न विभागों में काम कर रहे संविदा कर्मचारियों के लिए राहत देने वाली है।

Update: 2026-02-16 11:18 GMT

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16 February 2026|बिलासपुर। हाई कोर्ट का यह फैसला राज्य शासन के विभिन्न विभागों में काम कर रहे संविदा कर्मचारियों के लिए राहत देने वाली है। हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग में संविदा कर्मी के तौर पर डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में काम कर रहे दो कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति देने का आदेश राज्य सरकार को दिया है। जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा है, एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य का दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करे, चाहे उनकी नियुक्ति संविदात्मक हो या नियमित।

शिक्षा विभाग में डाटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में कार्यरत हंस कुमार रजवाड़े व जय प्रकाश चौहान ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर कर राज्य शासन के 25 अक्टूबर 2022 के विवादित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों को नियमित नियुक्तियां मानने से इंकार करते हुए संविदा नियुक्ति बताया है। याचिकाकर्ताओं ने राज्य शासन के 25 अक्टूबर 2022 के विवादित आदेश को रद्द करने की मांग की थी।

क्या है मामला

राज्य शासन ने वर्ष 2012 में एक संयुक्त विज्ञापन जारी कर विभिन्न श्रेणी तृतीय और चतुर्थ पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किया था। जारी विज्ञापन में डेटा एंट्री ऑपरेटर का पद भी शामिल था। जनजातीय कल्याण विभाग के अंतर्गत ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों के कार्यालयों के लिए डेटा एंट्री ऑपरेटर के उक्त पद पहले से ही नियमित आधार पर स्वीकृत थे। उस समय तक, राज्य में नियमित भर्ती पर लगा प्रतिबंध 18 सितंबर 2007 के आदेश और बाद में माध्यम से हटा दिया गया था, जिससे वित्त विभाग से परामर्श किए बिना इन पदों पर नियमित भर्ती की अनुमति मिल गई थी।

रिक्तियों को नियमित रूप से स्वीकृत किए जाने और नियमित भर्ती पर लगे प्रतिबंध को हटाए जाने के बावजूद, विज्ञापन में डेटा एंट्री ऑपरेटर के पदों को संविदात्मक बताया गया था। याचिकाकर्ताओं को इस बात की जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और विधिवत चयन होने पर वर्ष 2012-2013 में निश्चित वेतन पर नियुक्त किए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके नियुक्ति आदेशों में दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि का प्रावधान था, जो आमतौर पर नियमित नियुक्तियों पर लागू होने वाली शर्त है।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा, याचिकाकर्ता 10 वर्षों से अधिक समय से स्वीकृत रिक्तियों के विरुद्ध बिना किसी रुकावट के लगातार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। चूंकि परिवीक्षा अवधि बढ़ाने या उनकी सेवाओं की पुष्टि करने का कोई आदेश जारी नहीं किया गया, इसलिए उन्होंने 21 जनवरी.2022 को अभ्यावेदन प्रस्तुत कर नियमित नियुक्ति की मांग की। अभ्यावेदन की सुनवाई के बाद राज्य शासन ने 25 अक्टूबर 2022 को अभ्यावेदनों को खारिज कर दिया और दोहराया कि उनकी नियुक्ति संविदात्मक ही रहेगी।

याचिकाकर्ताओं ने दायर की रिट याचिका

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कहा, राज्य शासन का 25 अक्टूबर.2022 का विवादित आदेश पूरी तरह से मनमाना, अस्पष्ट और कानून की दृष्टि से अस्थिर है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के दावे को खारिज करते समय राज्य शासन ने महत्वपूर्ण तथ्यों और बाध्यकारी सरकारी निर्देशों पर विचार नहीं किया है। डेटा एंट्री ऑपरेटर के जिन पदों पर याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति हुई थी, वे विज्ञापन जारी होने से काफी पहले ही नियमित आधार पर विधिवत स्वीकृत हो चुके थे, और राज्य में नियमित भर्ती पर लगा प्रतिबंध 18 सितंबर 2007 के आदेश और उसके बाद के आदेश के द्वारा पहले ही हटा लिया गया था। इसलिए, उक्त पदों को नियमित आधार पर भरने में कोई कानूनी बाधा नहीं थी। रिक्तियां नियमित प्रकृति की होने के बावजूद, विज्ञापन में पदों को बिना किसी औचित्य के संविदात्मक दिखाया गया था। याचिकाकर्ताओं को संयुक्त भर्ती अभियान के तहत चयन की विधिवत प्रक्रिया में भाग लेने के बाद नियुक्त किया गया था। अधिवक्ता ने कहा, नियुक्ति आदेशों में ही याचिकाकर्ताओं को दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि पर रखने का एक विशिष्ट खंड निहित था, जो कि केवल नियमित नियुक्तियों पर लागू होता है, न कि संविदात्मक नियुक्तियों पर। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि नियुक्तियां सार रूप में नियमित प्रकृति की थीं।

याचिकाकर्ताओं ने स्वीकृत रिक्त पदों के विरुद्ध 10 वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी सेवा अंतराल के निरंतर कार्य किया है और नियमित कर्मचारियों के समान कर्तव्यों का निर्वहन किया है। उनकी परिवीक्षा अवधि बढ़ाने या उन्हें विशुद्ध संविदा कर्मचारी के रूप में बनाए रखने का कोई आदेश कभी जारी नहीं किया गया। राज्य शासन द्वारा लंबी और निर्बाध सेवा के बाद भी उनकी सेवाओं को संविदात्मक मानना ​​मनमाना और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

राज्य शासन ने दिया तर्क

राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, छत्तीसगढ़ सरकार के योजना विभाग द्वारा जारी परिपत्र में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों की सीधी भर्ती में छूट से संबंधित प्रावधान हैं और संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण का उल्लेख नहीं है। विवादित आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नियमितीकरण की अनुमति देने वाले किसी परिपत्र, नीतिगत निर्णय या वैधानिक प्रावधान के अभाव में याचिकाकर्ता नियमितीकरण का अधिकार नहीं मांग सकते। हालांकि, उनकी सेवाएं डेटा एंट्री ऑपरेटर (संविदात्मक) के पद पर जारी रखी गई हैं, और इस प्रकार उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं की गई है जिससे कोई कानूनी कार्रवाई का आधार बन सके।

शासकीय अधिवक्ता ने कहा, संविदात्मक नियुक्तियों का नियमितीकरण केवल लंबी या निरंतर सेवा के आधार पर करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सार्वजनिक रोजगार की संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत होगा और यह सेवा में पिछले दरवाजे से प्रवेश की अनुमति देने के समान होगा। यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि केवल 10 वर्ष की सेवा पूरी होने पर नियमितीकरण का दावा नहीं किया जा सकता है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा

जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा है,याचिकाकर्ताओं ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और 25 अगस्त .2012, एक दिसंबर .2012 और 01.अक्टूबर .2013 के आदेशों के अनुसार डेटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर नियुक्त किए गए। नियुक्ति आदेशों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं को दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि से गुजरने का निर्देश दिया गया था। उन्हें सभी संबंधित मूल दस्तावेज जमा करने थे।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, उपर्युक्त कार्रवाई न केवल मनमानी से दूषित है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन भी है। राज्य सरकार ने प्रारंभ में अपीलकर्ताओं को उनकी युवावस्था में सार्वजनिक कर्तव्यों और कार्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त किया था। लंबी और समर्पित सेवा प्रदान करने के बाद, अपीलकर्ताओं को अब अपने हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता, विशेषकर तब जब एक दशक पहले उनके लिए उपलब्ध रोजगार के अवसर आयु सीमा के कारण अब अनुपलब्ध हैं।

जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा, हम राज्य द्वारा लगभग 10 वर्षों की निरंतर सेवा के बाद अपीलकर्ताओं को सेवामुक्त करने के निर्णय के लिए कोई तर्कसंगत आधार नहीं देख पा रहे हैं। हम जानते हैं कि अपीलकर्ताओं और राज्य के बीच का सहजीवी संबंध पारस्परिक रूप से लाभकारी था; राज्य को अपीलकर्ताओं के अनुभव और संस्थागत जानकारी का लाभ मिला, जबकि अपीलकर्ता सार्वजनिक सेवा में बने रहे। ऐसी परिस्थितियों में, नवीनीकरण की दीर्घकालिक प्रथा से कोई भी विचलन, विशेष रूप से वह जो कर्मचारियों की वैध अपेक्षा को विफल करता है, एक स्पष्ट आदेश में दर्ज ठोस कारणों द्वारा समर्थित होना चाहिए।

जो कर्मचारी कई वर्षों तक संतोषजनक ढंग से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर चुका है और जिसे बार-बार सेवा विस्तार दिया गया है, उसे रातोंरात अतिरिक्त या अवांछनीय नहीं माना जा सकता। हम प्रतिवादियों द्वारा दिए गए तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि एक आदर्श नियोक्ता के रूप में राज्य का दायित्व है कि वह अपने कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करे, चाहे उनकी नियुक्ति संविदात्मक हो या नियमित।

याचिकाकर्ताओं को नियमित नियुक्ति देने हाई कोर्ट ने जारी किया आदेश

जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा है, याचिकाकर्ताओं का मामला विधिवत स्वीकृत पदों पर नियुक्तियों की श्रेणी में आता है, जिसके परिणामस्वरूप लंबी और निरंतर सेवा हुई है। याचिकाकर्ताओं से 10 वर्षों से अधिक समय तक नियमित दर्जा दिए बिना निरंतर सेवाएं लेना स्वीकार्य नहीं है। इसलिए, रिट याचिका स्वीकार की जानी चाहिए।

हाई कोर्ट ने राज्य शासन के 25 अक्टूबर 2022 के विवादित आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने राज्य शासन को निर्देशित करते हुए कहा है, वे सभी याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को उन स्वीकृत पदों के विरुद्ध नियमित करें, जिन पर उन्हें प्रारंभ में नियुक्त किया गया था, तत्काल और बिना किसी अनावश्यक विलंब के। याचिकाकर्ता इस निर्णय की तिथि से सेवा की निरंतरता, नियमित वेतनमान में निर्धारण और अन्य संबंधित लाभों सहित सभी परिणामी सेवा लाभों के हकदार होंगे।

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