IPS SRP Kalluri: 2018 में छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो गया होता, IPS ने तोड़ा आंध्र-नेपाल रेड कारिडोर, शहरी नक्सलियों के प्रेशर में बस्तर आईजी से हुई थी छुट्टी, वरना...
IPS SRP Kalluri: छत्तीसगढ़ में वर्ष 1990 के आसपास से नक्सली गतिविधि शुरू हो चुकी थी। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद तेजी से नक्सल हिंसा ने सिर ऊपर उठा लिया। इसके ठीक चार साल बाद से बलरामपुर रामानुजगंज जिले में नक्सलियों पर एक आईपीएस ने लगाम कसनी शुरू कर दी थी और वर्ष 2014 आते- आते नक्सलियों का वहां से सफाया हो गया। इसी अफसर ने बस्तर में 2014 में खतरनाक नक्सल ऑपरेशन शुरू किया था, नतीजे भी आ रहे थे। परदे के पीछे से कुछ ऐसा हुआ कि अफसर को बीच में अभियान बंद करना पड़ गया और नक्सल उन्मूलन की गाथा पूरी नहीं हो सकी। जानिए इस सत्य कथा के कुछ हिस्से।

IPS SRP Kalluri: रायपुर। 31 मार्च 2026| केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को संसद में ऐलान किया कि छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो गया है। बहुत संभव था कि यह घोषणा मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल यानी वर्ष 2018 से 2024 के बीच हो गई होती। छत्तीसगढ़ में 2018 से पहले ही एक प्रभावी नक्सल ऑपरेशन का श्रीगणेश हो चुका था। इस ऑपरेशन पर कुछ लोगों की नजर लग गई, इसमें लगे केंद्रीय सुरक्षा बलों को भी बदनाम करने की कोशिश की गई। कुछ आईपीएस अफसर भी इस ऑपरेशन से सहमत नहीं थे, नतीजा नक्सलियों को पनपने का मौका मिलता गया। आइए, जानें क्या हुआ था उस वक्त।
शिव राम प्रसाद कल्लूरी यानी आईपीएस एसआरपी कल्लूरी। यह वह नाम है जिसे हर कोई जानता है। वर्ष 1994 बैच के आईपीएस अफसर कल्लूरी मूलतः आंध्रप्रदेश के रहने वाले हैं। कोरबा, बिलासपुर, बलरामपुर, दंतेवाड़ा के एसपी रहे। इसके बाद दंतेवाड़ा में डीआईजी नक्सल ऑपरेशन भी बनें।
नक्सलियों के लिए यह नाम खौफ का पर्याय-
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज में नक्सलियों के सफाए के हीरो यही अफसर थे, इस जिले में एसपी के रूप में कल्लूरी ने 2004 में नक्सलियों के खिलाफ जबरदस्त अभियान छेड़ दिया था। इसका असर यह हुआ कि अगले दस साल यानी 2014 आते- आते वहां से नक्सलियों का नामोनिशान मिट गया। बलरामपुर की कहानी आगे पढ़िए, अभी हम चलते हैं बस्तर, जहां क्या हुआ आप भी जानें। कल्लूरी को 2014 में बस्तर का आईजी बनाया गया था, इस पद पर वे 2017 तक रहे। बलरामपुर में जैसा किया था, उसी तरह के आक्रामक रुख के साथ उन्होंने बस्तर में काम शुरू किया था।
मामला ऐसे बिगाड़ा गया
कल्लूरी के निर्देशन में केंद्रीय सुरक्षा बल के साथ राज्य की पुलिस और एसटीएफ की टीमें जंगलों में घुस- घुस कर नक्सलियों को उड़ा रही थी। हर बार मुठभेड़ के बाद इसे फर्जी बता कर आरोप लगाए जाते रहे। नक्सली ऑपरेशन के खिलाफ भी राजनीति होनी शुरू हो गई और आरोप लगा दिया गया कि निर्दोष ग्रामीणों को मारा जा रहा है। बहुत संभव था कि मुठभेड़ के बीच ग्रामीणों को भी गोलियां लग रही हों, मगर इस विवाद ने ऑपरेशन को प्रभावित करना शुरू कर दिया। फिर ताड़मेटला में आदिवासियों के मकान जला दिए गए और आरोप लगा कि सुरक्षा बलों के जवानों की करतूत है। जबकि इस घटना के जड़ में किसी ने जाने की कोशिश ही नहीं, केवल जांच कमेटी बना कर औपचारिकता पूरी कर दी गई। अब ग्रामीणों की झोपड़ी जली तो जाहिर है, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भी जाग गया। खूब राजनीति हुई, आयोग के सदस्यों ने घटनास्थल देखना चाहिए वगैरह होता रहा।
दिल्ली में हाय-तोबा
शहरी नक्सली नेटवर्क भी कल्लूरी को रोकने के लिए सक्रिय हो चुका था। दिल्ली के नेशनल अखबारों में बड़े-बड़े आर्टिकल लिखे जा रहे थे। जेएनयू में प्रदर्शन होने लगे। कल्लूरी खुद ही नक्सली समर्थकों पर भी कार्रवाई करने के कड़े बयान देते रहे, इससे राजनीति इतनी और तेज हो गई। उस समय अमित शाह जैसे तेज-तर्रार केंद्रीय गृह मंत्री भी नहीं थे। सो, सरकार प्रेशर में आ गई। आखिरकार रमन सरकार को पीछे हट कर कल्लूरी को बस्तर से हटाना पड़ गया। जब तक कल्लूरी बस्तर में रहे, नक्सलियों को बार- बार पीछे हटना पड़ रहा था। वरिष्ठ पुलिस अफसरों का कहना है कि इसी अफसर की भांति उस वक्त सरकार में भी नैतिक ताकत की आवश्यकता था। यही नैतिक ताकत अब जाकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिखाई है।
कल्लूरी ने तोड़ा था नक्सलियों का आंध्र-नेपाल रेड कॉरिडोर
सरगुजा संभाग के नक्सल मुक्त होने के करीब 11 साल बाद बस्तर संभाग में भी नक्सलियों के उन्मूलन की बात कही जा रही है। देखा जाए तो नक्सलियों के सबसे बड़े रेड कॉरिडोर के प्लान को सरगुजा संभाग ने ही चौपट कर दिया था। 1994-95 में सरगुजा संभाग, विशेष कर बलरामपुर इलाके में नक्सली सिर उठाने लगे थे। झारखंड से आकर यहां वसूली और निर्माण कार्य में लगे मुंशियों की हत्या का सिलसिला शुरू हो चुका था। छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही नक्सली गतिविधियों में तेजी आ गई।
सरगुजा भी अशांत
एकाएक लग रहा था कि बस्तर की तरह सरगुजा भी अशांत होने जा रहा है। पुलिस के पास यह भी इनपुट था कि नक्सली सरगुजा संभाग से होकर ही आंध्र प्रदेश से नेपाल तक रेड कॉरिडोर बनाना चाह रहे हैं। सरगुजा में पुलिस ने आम जनता की मदद लेकर नक्सली नेटवर्क को तोड़ना शुरू किया और इसके बाद नक्सलियों का रेड कॉरिडोर बनने का प्लान भी धरा रह गया। सरगुजा का इलाका झारखंड से सटा हुआ है। यही कारण है कि नक्सलियों को झारखंड से निकल कर छत्तीसगढ़ के जंगल में पनपने का मौका मिल रहा था। 1990 के दशक में झारखंड में नक्सलियों की गतिविधि हिंसात्मक रूप लेने लगी थी और इसका असर सरगुजा में देखा जा रहा था। बलरामपुर और रामानुजगंज में भीतर तक नक्सली घुसपैठ कर चुके थे। नक्सली समर्थित संगठन के पदाधिकारी भी सरगुजा को बस्तर से जोड़ कर आंध्र प्रदेश तक मजबूत करने में जुटे हुए थे।
छत्तीसगढ़ को घेरने की तैयारी
छत्तीसगढ़ में पहला विधानसभा चुनाव 2003 में हुआ था और इसके ठीक पहले तक नक्सलियों ने झारखंड, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के इलाके को शामिल कर तीन जोन बना लिया था। इसी जोन के रास्ते छत्तीसगढ़ को घेरने की कोशिश शुरू हो चुकी थी। जब 2003 में विधानसभा चुनाव हुआ तब ही केंद्र से आए सशस्त्र सुरक्षा बलों के साथ नक्सलियों का मुठभेड़ शुरू हो चुका था। मतदान तक इलाके में कई लोगों की हत्याएं की गईं। इससे दहशत का वातावरण बन गया और जंगल के सरहदी गांव खाली होने लगे थे। इसका असर क्षेत्र के छोटे शहरों तक में देखने को मिल रहा था।
कल्लूरी ने जोड़ा नया अध्याय
वरिष्ठ आईपीएस एसआरपी कल्लूरी बस्तर में पदस्थापना के दौरान काफी विवादों में आ गए थे। कांग्रेस सरकार में इस चर्चित अफसर को भाजपा सरकार ने बलरामपुर जिले की कमान सौंप दी थी। सरगुजा में सबसे अधिक नक्सली हिंसा बलरामपुर-रामानुजगंज इलाके में हो रही थी। कल्लूरी आते ही थोड़े समय शांत रहे। इसके बाद उनके एक्शन प्लान से नक्सली धराशायी होने लगे। उनके कार्यकाल में वर्ष 2008 तक ज्यादातर नक्सली कमांडरों को पुलिस मार चुकी थी। जंगल में खोज-खोज कर नक्सलियों को निशाना बनाया जा रहा था। उनका पूरा साथ दिया था सरगुजा के तत्कालीन आईजी एएन उपाध्याय और डीजीपी ओपी राठौर ने। 2008 तक चले अभियान का परिणाम ही रहा कि सरगुजा संभाग वर्ष 2014 तक करीब- करीब नक्सलियों से मुक्त हो गया। बलरामपुर प्रदेश का पहला नक्सल मुक्त जिला बना था। जिन नक्सल कमांडरों को मारा गया था उनमें राहुल तिवारी, भीम कोड़ाकू और सागर जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।
डिमोशन में भेजा गया था बलरामपुर
अजीत जोगी सरकार में एसआरपी कल्लूरी का भारी जलवा रहा। इस वजह से दिसंबर 2003 में बीजेपी की सरकार आई तो उन्हें हांसिये पर डाल दिया गया। मगर तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर ने उनकी क्वालिटी को पहचाना। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह से बात की। रमन सिंह ने कहा कि पार्टी में काफी विरोध है कल्लूरी का। डीजीपी ने समझाया बलरामपुर पुलिस जिला है। नक्सल प्रभावित। वहां कोई जाना चाहता नहीं। नया लड़का है, लड़ाकू भी। इसे भेजा जाए। तब जाकर रमन सिंह कल्लूरी को बलरामपुर भेजने के लिए तैयार हुए। और कल्लूरी ने वो करके दिखा दिया, जो सरकार की अपेक्षा से परे थी। हालांकि, ओपी राठौर अब नहीं रहे। डीजीपी रहते ही कार्डियक अरेस्ट से उनका देहावसान हो गया था। मगर इस खबर के लेखक को कल्लूरी की पोस्टिंग वाली बात उन्होंने खुद ही बताई थी।
1200 सरेंडर, 40 एनकाउंटर
2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रायपुर आए थे। उस समय बस्तर आईजी के तौर पर पीएम से उनकी मुलाकात हुई थी। कल्लूरी ने उन्हें अश्वस्त किया था कि सर, अगले लोकसभा चुनाव याने 2019 से पहले बस्तर को नक्सल मुक्त कर दिया जाएगा। इस पर पीएम मोदी बोले, गुड।
कल्लूरी के नक्सलियों के घर में घुस मारने के अभियान ने माओवादी त्राहि माम करने लगे थे। उनके आईजी रहने के दौरान लगभग 1200 नक्सलियों का सरेंडर हुआ। 40 से अधिक नक्सलियों के एनकाउंटर भी किए गए। एसआरपी कल्लूरी को दो बार वीरता पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है।
भूले भटके मिल रहे नक्सली
बलरामपुर और झारखंड इलाके में कुछ नक्सलियों की सक्रियता कहीं- कहीं जारी है, इन गतिविधियों में झारखंड के नक्सली शामिल रहे हैं। वर्ष 2025 कुख्यात सबजोनल कमांडर मनीष यादव को पुलिस ने मार गिराया था। इसके अलावा वर्ष 2023 में बलरामपुर पुलिस ने आठ लाख के इनामी नक्सली सरजून यादव उर्फ पूतना को गिरफ्तार किया था, यह कई नक्सली हमलों में शामिल रहा है। यहां कुसमी, सामरी और चांदो थाना क्षेत्र सर्वाधिक नक्सल प्रभावित इलाकों में शामिल रहे हैं।
जानिए कौन है आईपीएस शिवराम प्रसाद कल्लूरी
छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस शिवराम प्रसाद कल्लूरी 1994 बैच के आईपीएस अफसर है। नक्सल मामलों के एक्सपर्ट कल्लूरी माने जाते हैं। कई नक्सल ऑपरेशन उन्होंने चलाएं हैं। सरगुजा को नक्सल मुक्त बनाने में शिवराम प्रसाद कल्लूरी की भूमिका अहम है। बस्तर में भी उन्होंने विभिन्न पदों पर काम करते हुए लंबे समय तक नक्सलियों से लोहा लिया है। आइए जानते हैं उनके बारे में...
जन्म और शिक्षा
आईपीएस शिवराम प्रसाद कल्लूरी छत्तीसगढ़ कैडर के 1994 बैच के आईपीएस है। वे मूलतः आंध्रप्रदेश के रहने वाले है। उनका जन्म 12 मई 1971 को हुआ है। उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री लेने के बाद यूपीएससी क्रैक की है।
प्रोफेशनल कैरियर
1994 बैच के आईपीएस शिवराम प्रसाद कल्लूरी ने 4 सितंबर 1994 को आईपीएस की सर्विस ज्वाइन की है। वे पहले मध्यप्रदेश कैडर के आईपीएस थे। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर चुन लिया। छत्तीसगढ़ में वे कोरबा, बिलासपुर, बलरामपुर–रामानुजगंज, दंतेवाड़ा जिलों के पुलिस अधीक्षक रहें। डीआईजी नक्सल ऑपरेशन दंतेवाड़ा रहे। आईजी बस्तर रेंज रहे। एंटी करप्शन ब्यूरो और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो के भी महानिरीक्षक रहे। अपर परिवहन आयुक्त रहे। ADG ट्रेनिंग के पद भी रहे। वर्तमान में वे ADG प्रशासन हैं।
नक्सल मामलों के विशेषज्ञ एसआरपी कल्लूरी ने प्रदेश में नक्सल उन्मूलन में बड़ी भूमिका निभाई। सरगुजा से नक्सलियों के पैर कल्लूरी ने उखाड़े थे। डीआईजी नक्सल ऑपरेशन दंतेवाड़ा बनाया गया था। ताड़मेटला में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों की नक्सलियों द्वारा की गई हत्या के बाद उन्हें दंतेवाड़ा का एसएसपी बनाया गया। फिर वे बस्तर रेंज के आईजी बने। इस दौरान लगभग 1200 नक्सलियों का सरेंडर उनके कार्यकाल में हुआ। 40 से अधिक नक्सलियों के एनकाउंटर भी किए गए। एसआरपी कल्लूरी को दो बार वीरता पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है।
