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‘आप काले कोट में हैं, इसका मतलब यह नहीं कि आपकी जान ज्यादा कीमती है’…सुप्रीम कोर्ट ने वकील को फटकारा, जुर्माना भी लगाया….

नई दिल्ली 14 सितम्बर 2021. कोविड-19 संक्रमण से मरने वाले वकीलों के परिवार के सदस्यों को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की. कोर्ट ने याचिका दाखिल करने वाले वकील को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि उसने प्रचार के उद्देश्य से ऐसी याचिका दाखिल की है. जजों ने यह भी कहा कि अगर कोई काले कोट में है, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी जान दूसरों से ज्यादा कीमती है. कोर्ट ने याचिका को बेकार बताते हुए याचिकाकर्ता पर 10 हज़ार रुपए का हर्जाना भी लगाया. मामले पर याचिका वकील प्रदीप कुमार यादव ने दाखिल की थी. उनका कहना था कि वकील सिर्फ अपने पास आने वाले मुकदमों से ही आय अर्जित करते हैं. उनकी आमदनी का कोई दूसरा साधन नहीं होता. वकील समाज की सेवा के लिए 24 घंटे तत्पर रहते हैं  लेकिन उन्हें कई तरह की परेशानियां उठानी पड़ती हैं. यहां तक कि अधिकतर मकान-मालिक अपने यहां किसी वकील को किराएदार नहीं रखना चाहते.

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि हर साल जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लाखों मुकदमे दाखिल होते हैं. हर मुकदमे के दाखिल होते समय अधिवक्ता कल्याण कोष के लिए भी लगभग ₹25 का स्टांप लगाया जाता है. पर जब कोई वकील दिक्कत में होता है, तो इस कोष का उसे कोई लाभ नहीं मिल पाता. अलग-अलग बार एसोसिएशन और बार काउंसिल वकील की सहायता के लिए सामने नहीं आते. इसलिए, इस फंड का सही उपयोग यही होगा कि 60 साल से कम उम्र में कोई वकील मरे, तो उसके लिए 50 लाख रुपए मुआवजा मिले. वकील की मौत कोरोना या दूसरे किसी भी कारण से हो, परिवार को मुआवजा दिया जाना चाहिए.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जब समाज के अन्य सदस्यों को समान समस्या का सामना करना पड़ा तो अधिवक्ता को अपवाद बनाने का कोई कारण नहीं है. कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा, ‘आप काले कोट में हैं तो इससे आपकी जान ज्यादा कीमती नहीं हो जाती. आप वकील हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि कुछ भी दाखिल कर देंगे. इस तरह की पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन को रोकना होगा.’कोर्ट ने आगे कहा कहा कि पिछले दिनों बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है. सब के जीवन का समान महत्व है. वकीलों को अपवाद की तरह नहीं देखा जा सकता है.

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