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लोगों की सोच दूषित क्यों हो रही…हमारे दुख, तकलीफ और समस्याओं का कारण क्या है…पढ़िये औघड़ गुरुपद संभव राम बाबा का अघोरेश्वर जयंती पर दिया गया आशीवर्चन

पड़ाव (वाराणसी), 14 सितंबर 2021। अघोरेश्वर महाप्रभु के 85 वें जयंती के अवसर पर आयोजित सायंकालीन पारिवारिक विचार गोष्ठी में श्री सर्वेश्वरी समूह के अध्यक्ष और परमपूज्य अघोरेश्वर भगवान राम जी के उत्तराधिकारी पूज्यपाद औघड़ गुरुपद संभव राम जी ने श्रद्धालुओं को आर्शीवचन दिया। उन्होंने जीवन और जीवन के दायित्व, रहन-सहन, संस्कार, संस्कृति पर प्रकाश डालते हुए ये भी बताया कि हमारे दुख, तकलीफ और समस्याओं के मूल कारण क्या है।

प्रस्तुत है, उनके आशीवर्चन-

अघोरेश्वरं वन्दे जगद्गुरुं। आदरणीय माताएँ, उपस्थित धर्मबन्धुओं!
हम जिस देव-दुर्लभ मनुष्य शरीर में आये हैं, समझदार व्यक्ति इस जीवन को व्यर्थ नहीं गँवायेंगे। हमारी एक निश्चित स्वांस प्रक्रियाएं हैं जिनके समाप्त होने पर हमें इस पृथ्वी को छोड़कर जाना ही है। समय-समय पर हमारे संत-महापुरुष, औघड़-अघोरेश्वर ने हमें समझाया है कि यह जीवन किसलिए है, कैसे कृत्य करने हैं और हमारा दायित्व क्या है। कई लोग अपने इस जीवन को सफल बनाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। क्योंकि वह महापुरुषों की वाणियों का अवलम्बन लेकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए जीवन जी रहे हैं। आज का समय ऐसा है कि लोग महापुरुषों की जो थाती है- उनकी वाणियाँ, उनके स्थान और उनकी समाधियों की उपेक्षा कर रहे हैं, उसको खंडहर बना दे रहे हैं। जबकि वह हमारे लिए प्रेरणा का, शक्ति का एक बहुत बड़ा स्रोत हैं। बहुत कम जागरूक लोग हैं जो उसकी महत्ता को समझते हुए उस स्थान का सम्मान, रख-रखाव और जीर्णोद्धार करते हैं, जिससे वहाँ का वातावरण बहुत ही अच्छा हो जाता है। नहीं तो चोर-डकैत, व्यभिचारी, नशाखोर लोग जो उस स्थान की पवित्रता को नहीं समझते वहाँ पर बैठने लगते हैं। हमारे ह््रास होने का कारण भी यही है कि अपने संत-महात्माओं की थाती तथा अपने संस्कार और संस्कृति की हमलोगों ने तिलांजलि दे दी है। इसके चलते ही हमारी मानसिकता विपरीत हो गई है और हम इतना कष्ट, दुःख, तकलीफ तथा समस्याओं में उलझे हुए हैं। जब हम उनके स्थानों को सजाकर-सँवारकर रखेंगे तो वहाँ से एक आभा निकलेगी, प्रकाश निकलेगा तब हम अपने मनुष्य जीवन में आने के उद्देश्य को जान पायेंगे। हम यदि अपने गुरु के उपदेश रुपी मन्त्र का अनुशरण करेंगे तो अपने जीवन की कठोरता को आसानी से पार कर सकते हैं। मन्त्र-मित्र का अवलंबन लेने पर हमारे जर्जर हो रहे जीवन में शनैः-शनैः सुधार हो जाता है और हम उन्नति की राह पर अग्रसर हो जाते हैं। कहा भी गया है- “मन्त्र महामणि विषय व्याल के, मेटत कठिन कुअंक भाल के”। हमें उस मन्त्र को तोते की तरह से रटते रहने की अपेक्षा अपने श्रद्धा-विश्वास से उसको सींचना है जिससे वह फलीभूत होकर हमें एक अनुभूति देगा और वही अनुभव हमारे जीवन को सार्थक करेगा। मुक्ति की आवश्यकता उसको होती है जो बँधा होता है। औघड़ लोग तो पहले से ही बंधनमुक्त होते हैं। ईश्वर को अक्षत, पुष्प, धूप-दीप, नैवेद्य आदि सामग्रियाँ नहीं चाहिए। यह सबकुछ उसी का दिया हुआ तो है हमारे पास। लेकिन यह हम क्यों करते हैं क्योंकि यह हमारा एक स्वभाव, व्यवहार और भावना है जो हम उस रूप में उन्हें समर्पित करते हैं। तो वहाँ हमारी श्रद्धा, हमारा विश्वास और समर्पण ही हमारे लिए फलदायी होता है। ईश्वर, वह अज्ञात है, उसमें कुछ नहीं होता। बस अनुभव से उस आनंद को प्राप्त किया जा सकता है और उस बीच में केवल हमारे गुरु ही रहते हैं। यदि हम उनकी वाणियों पर चलते हैं तो वही हमें ईश्वरीय अनुभूति को दिला सकते हैं। महापुरुषों के ऐसे स्थानों पर जब हम आते हैं तो अपने-आपको खाली कर उस एकांत और नीरवता में रखने पर, अपने पास ठहरने पर और स्थिर होने पर ही वह अज्ञात जो हम सभी में है, उसकी अनुभूति हमें होगी। अपने अभ्यंतर के चक्षुओं से ही हमें उस प्रकाश का दर्शन हो सकता है। उस अज्ञात के अनंत आनंद की अनुभूति को छोड़कर हमलोग अनेक तर्क-वितर्क और बाहरी बातों में घूमते रहते हैं, अनेक तरह के धर्मग्रंथों को पलटते रहते हैं जिसमें न हमें कोई व्यवहारिकता मिलती है और न ही ईश्वर की अनुभूति हो पाती है। वह शाश्वत जो सर्वत्र, सर्वकाल में उपस्थित है- वह कहीं जाता नहीं, वह कहीं खोया भी नहीं है और न ही मिलता है, उसकी अनुभूति करना हमारी सिधाई पर निर्भर है।
पूज्य बाबा ने आगे कहा कि आज का समय बहुत ही दुरूह है। लोग बहुत ही कठिनाई से जी रहे हैं। लेकिन इतनी कठिनाईयों के बाद भी यदि हम महापुरुषों की वाणियों पर चलेंगे तो इसको भी हम आसानी से पार कर जायेंगे। कई लोग होते है जो थोड़ी भी समस्या होने पर हाय-तौबा मचाने लगते हैं, रोने-गाने लगते हैं, लेकिन वह लोग भी हैं जो महापुरुषों की छत्र-छाया में अपने को रखे हैं वह जानते हैं कि हमारे ऊपर कोई है जो हमारी रक्षा करेगा और वह उस कठिन समय को सरलता से पार कर जाते हैं। अपने इस दुर्लभ मनुष्य जीवन को व्यर्थ न करें, नहीं तो अंत में पछतावा ही हाथ लगेगा।
गोष्ठी के अन्य वक्ताओं में एम.एम. अग्निहोत्री, कल्याणी मिश्रा, डॉ. पद्मा मिश्रा, सर्वेश शाहदेव, विजय जामनिक, राकेश सिंह, नन्दा तिवारी तथा भोलानाथ त्रिपाठी थे। नचिकेता ने भजन प्रस्तुत किया और ओमप्रकाश तिवारी ने मंगलाचरण गाया। धन्यवाद ज्ञापन संस्था के उपाध्यक्ष सुरेश सिंह जी ने किया और गोष्ठी का सञ्चालन डॉ. बामदेव पाण्डेय ने किया।

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