बिलासपुर की राजनीति को दूषित करने का काम कौन कर रहा….चिरकुटई कौन कर रहा…? कांग्रेस की शह-मात की लड़ाई से शहरवासी स्तब्ध, आक्रोशित और गुस्से में!

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बिलासपुर, 23 सितंबर 2021। कांग्रेस की सियासत में ऐसा कभी नहीं हुआ, जो अभी हो रहा है। हो ऐसा रहा कि बिलासपुर में अब विपक्ष की जरूरत नहीं रह गई है। विपक्ष का सारा काम कांग्रेसी एक-दूसरे को निबटाने के चक्कर में कर डाल रहे हैं। जाहिर तौर पर इससे शांत, सरल लोगों के शहर का वातावरण दूषित हो रहा है।
रमन सरकार के 15 साल को छोड़ दें, जिसमें अमर अग्रवाल मंत्री रहे और पटवा सरकार के ढाई साल, जिसमें मूलचंद खंडेलवाल। इसके अलावा हमेशा प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही। और जाहिर तौर पर सरकार होने के कारण बिलासपुर में कांग्रेस का वर्चस्व भी। तब कांग्रेस में एक-से-एक दिग्गज नेता रहे। बीआर यादव जैसे सौम्य, सरल और मिलनसार नेता ने 15 साल तक शहर की नुमाइंदगी की। एसईसीएल से लेकर इंदिरा सेतु जैसी कई सौगातें उन्होंने दिलाई। ठाकुर बलराम सिंह बेहद ताकतवर नेता माने जाते थे लेकिन, शालीनता और अपनत्व का अंदाज ऐसा कि लोग उन्हें ठाकुर साब कहते थे। बिलासपुर में डीपी चौबे जैसे पत्रकार सह नेता भी हुए। अच्छी तरह याद है, अर्जुन सिंह जैसे मुख्यमंत्री डीपी चौबे से मिलने दो बार उनके घर गए। कहने का मतलब यह है कि उस समय ऐसी शख्सियतें राजनीति में थीं।
विभिन्न गुटों के होने के बाद भी राजेंद्र प्रसाद शुक्ला, चित्रकांत जायसवाल, श्रीधर मिश्रा, अशोक राव ने कभी ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे पार्टी की प्रतिष्ठा पर आंच आई हो। तब बिलासपुर में जांजगीर आता था और चरणदास महंत बिलसपुरिया नेता माने जाते थे। बड़ी संख्या में उनके समर्थक होते थे। लेकिन, ऐसा कभी नहीं हुआ, जो इस समय हो रहा है।
बिलासपुर में सामाजिक और सियासी समरता का ये आलम था कि जब कभी भी शहर का कोई इश्यू आता था तो सारे नेता भूल जाते थे कि वे किस पार्टी और किस गुट के प्रतिनिधित्व करते हैं। एक आवाज पर….सब एक मंच पर। वो चाहे रेलवे जोन आंदोलन हो या फिर हाईकोर्ट, विश्वविद्यालय की मांग हो। सबने देखा ही कि किस तरह एकजुट होकर आंदोलन चलाया गया। और कामयाबी भी मिली।
लेकिन, अमन, शांति का शहर कहे जाने वाले बिलासपुर को पता नहीं किसकी नजर लग गई कि शहर पर भूमाफियाओं का कब्जा होता जा रहा है। रही-सही कसर सत्ताधारी पार्टी के कुछ नेता एक-दूसरे के खिलाफ चिरकुटई कर पूरा कर दे रहे। शहर के लोगों में इसको लेकर भला गुस्सा कैसे नहीं आएगा। गुस्सा इसलिए भी है कि सत्ताधारी पार्टी का एक भी नेता कभी जनसमस्याओं को लेकर सड़क पर नहीं उतर रहा। उतर रहा तो सिर्फ निहित स्वार्थों के लिए। अपना दबदबा बढ़ाने के लिए। ऐसे में सवाल तो खड़े होते हैं।
