रतनपुर (बिलासपुर) स्थित मां महामाया शक्ति पीठ में आज मां का राजसी श्रृंगार किया गया। महाष्टमी के हवन के बाद यह श्रृंगार किया जाता है।
मां महामाया को करीब पांच किलो सोने के आकर्षक डिजाइन वाले आभूषणों से सजाया जाता है।
इसमें सोने से हार, कुंडल, नथनी, मुकुट, छत्र सहित कई आभूषणों से सजाया जाता है।
नवारात्रि के दौरान यहां विशेष पूजा होती है और जैसे किसी पूजा के समापन के रोज महिलाएं विशेष तरह के वस्त्र पहनती हैं और श्रृंगार किया जाता है, उसी तरह का रतनपुर के मां महामाया मंदिर में भी होता है।
आभूषण चूंकि कीमती हैं, इसलिए उसे बैंक के लॉकर में रखा जाता है। नवरात्रि के नवमी से एक दिन पहने उसे लॉकर से सुरक्षा के बीच मंदिर लाया जाता है।
मां महामाया मंदिर में नवमी के दिन मंदिर में विशेष सुरक्षा रहती है। हथियारबंद जवान मंदिर परिसर में चौकस रहते हैं। संभवत: यह देश का पहला शक्तिपीठ है, जहां माता का राजसी श्रृंगार किया जाता है।
पिछले 100 साल में सिर्फ एक बार पिछले साल में चार बार मां का राजसी श्रृंगार किया गया, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू रतनपुर पहुंची थी।
बता दें की राष्ट्रपति गुरू घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में आईं थी तब से रतनपुर में मां का दर्शन गई थीं।
नवरात्रि के दौरान आठ दिनों तक सुबह और दोपहर मां को ड्राई फूट्स के भोग लगाए जाते हैं और शाम को सिंघारा के आटा का हलुआ इत्यादि का भोज लगाया जाता है।
ऐसा उपवास के नियमों का पालन करने के लिए किया जाता है। जिस तरह उपवास तोड़ने के बाद भांति-भांति के व्यंजन घर में बनाए जाते हैं।
उसी तरह नवमी को माता को 56 व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
रतनपुर मंदिर में पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रम्हाचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघटा, चौथे दिन कुष्मांडा, पांचवे दिन स्कंध माता, छठवे दिन कात्यायिनी, सातवे दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौंवे दिन सिद्धिदात्री।
रतनपुर के महामाया मंदिर में पहले मां को जो पहले दिन वस्त्र पहनाया जाता है, और श्रृंगार होता है, वह फिर अनुष्ठान के पूरे होते यानी आठवें दिन तक नहीं बदलता।
मान्यता यह है कि चूकि कोई भी अनुष्ठान में आदमी एक बार बैठ जाता है, तो उसे बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
इसलिए आठवें दिन हवन के अगले दिन नवमी को मां का वस्त्र और श्रृंगार चेंज किया जाता है। इस दिन मां का राजसी श्रृंगार किया जाता है।