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विकास दुबे हत्याकांड याने यूपी STF एनकाउंटर.. लाश विकास की मिली पर धारा 41 -1/9 और हथकड़ी किधर लापता है ?

रायपुर,10 जुलाई 2020। नाटकीय बल्कि पूरी तरह फ़िल्मी अंदाज में पकड़ाए या कि सरेंडर किए विकास दुबे की हत्या हो गई है। पुलिस ने इसे एनकाउंटर बताया है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरुप कोई भी एनकाउंटर वस्तुतः काउंटर होता है, प्रकरण हत्या का दर्ज होगा और विवेचना में यह तथ्य स्थापित होता है कि यह हत्या नहीं बल्कि आत्मरक्षार्थ चली गोली है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के सम्मान में इस मुठभेड को कथित ना लिखते हुए जबकि सब कुछ स्पष्ट है, पुलिस दावे के अनुरुप मुठभेड़ शब्द के इस्तेमाल के साथ पहले हत्या शब्द का इस्तेमाल किया गया है।

8 जुलाई को यूपी पुलिस के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार ने कहा था –
“नृशंस हत्यारों को वो सजा देंगे कि मामला मिसाल बनेगा”

IPS प्रशांत कुमार की बात यूपी STF ने सही साबित कर दी है।यूपी पुलिस की दी जानकारी के अनुसार कानपुर से सत्रह किलोमीटर पहले भौती में करीब 11 गाड़ियों के क़ाफ़िले में वही गाड़ी पलट गई जिसमें विकास दुबे को लाया जा रहा था, और गाड़ी पलटने पर विकास दुबे पिस्टल छिनकर भागने की कोशिश करते हुए उसने फ़ायरिंग की और आत्मरक्षार्थ चली गोली में वह मारा गया।

क्या यह केवल संयोग माना जाना चाहिए कि विकास दुबे के साथी बताए गए प्रभात मिश्रा समेत पाँच का एनकाउंटर बिलकुल कुछ इसी अंदाज में यूपी STF ने किया, हालाँकि ये संयोग गजब के संयोग हैं।जबकि संयोग को आप पढ़ें तो याद रखा जाना चाहिए कि अचानक एक चेक पोस्ट अस्तित्व में आया और वहाँ मीडिया की सारी गाड़ियाँ रुक गई और थोड़े ही आगे दस गाड़ियों के क़ाफ़िले में बस वही गाड़ी दूर्घटना ग्रस्त हो गई जिसमें विकास दुबे था।

बहरहाल विकास दुबे जिस पर आठ पुलिसकर्मियों की हत्या का आरोप था, अब मारा जा चुका है। शव बरामद हुआ है जिसमें हथकड़ी नज़र नहीं आ रही है। संयोग से हथकड़ी ना लगाई गई होगी, हालाँकि लाखों के ईनामी और जिसे पकड़ने समूचे प्रदेश की पुलिस को झोंक दिया गया हो उसे हथकड़ी ना लगाई गई हो यह संयोग चकित करता है।

दूर्दांत अपराधी बताए गए विकास दुबे की पुलिस दावे के अनुसार मुठभेड़ में मौत हुई है। हथकड़ी लापता है और साथ ही साथ धारा 41-1/9 भी गुमशुदा है। यह धारा अधिकार देती है कि यदि किसी भी राज्य की पुलिस को पता है कि व्यक्ति किसी अपराध में वांछित है तो उसे धारा 57 में गिरफ़्तार किया जाएगा। यह धारा आकर्षित होती है उज्जैन में उसी उज्जैन में जहां पर विकास दुबे को नाटकीय ढंग से पकड़ा जाना बताया गया। पर यहाँ इसका उपयोग ही नहीं हुआ है।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अम्बस्ट ने NPG से कहा
“ पंचनामा से गिरफ़्तारी की कोई प्रक्रिया ही नहीं होती है.. पूरा मामला संदेह से परे नहीं है.. और भारतीय संविधान के नीति नियमों की अवहेलना ही नहीं उसे धता बता दिया गया है.. विकास दुबे दुर्दांत था तो जब इतने अपराधियों की सुची योगी सरकार में बनी थी तो नाम क्यों नहीं था.. पुलिस जाँच ऐजेंसी है.. गुण दोष का निर्धारण और दंड यह अदालत का काम है..”

जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला ने एक आदेश में युपी पुलिस को लेकर ही लिखा था-
“The police force in Uttar Pradesh is an organise gang of criminals”

विकास दुबे किन राजनीतिज्ञों और पुलिस के अधिकारियों के संरक्षण में था.. कि हर बार राज्य सरकार जब दूर्दांत अपराधियों की सुची बनाती थी तो उसका नाम गोल हो जाता था.. आठ पुलिस जवानों की शहादत के पीछे क्या षड्यंत्र था.. अब ये सारे रहस्य रहस्य ही रह जाएंगे।सवाल जरुर मुँह बाएँ खड़े हैं… वे फ़िलहाल शायद ही जवाब तक पहुँच पाएं।

यह भारतीय न्याय प्रणाली की अवहेलना और व्यवस्था पर क़ाबिज़ राजनीतिज्ञों और भ्रष्ट
पुलिस व्यवस्था का संयुक्त उपक्रम है। बहुत बेहतर होता कि अदालत सजा देती लेकिन तब विकास दुबे की ज़ुबान खुलती और कई अदालत के कटघरे में नज़र आते.. तो ज़ाहिर है एक विकास दुबे की ही मौत हुई.. संविधानिक व्यवस्था पर हावी भ्रष्ट

तंत्र की नही.. असली दोषीयो को कभी सजा नहीं मिलेगी जिन्होंने विकास दुबे जैसों को पाला पोसा और तंत्र को छिन्न भिन्न कराया.. सजा की बात दूर अब तो उनकी पहचान तक सार्वजनिक नहीं होगी। और ज़ाहिर है विकास दुबे जैसे लोग आते रहेंगे।

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