VIDEO: राज्यसभा में विरोध का शर्मनाक अंदाज.. रुल बुक फाड़ी गई.. आसन पर चढ़े.. माईक तोड़े.. पूरे मामले को लेकर बोले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह- “दुखद.. दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक हुआ जो हुआ”

नई दिल्ली,21 सितंबर 2020। राज्यसभा में कृषि सुधार बिल को लेकर जो कुछ नज़ारे बाजरिया टेलीविजन देश के सामने नुमाया हुए उसने उच्च सदन की गरिमा को गहरा आघात पहुँचाया। विपक्ष ने विरोध के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार का पालन तो किया लेकिन बतौर संसद सदस्य उनके कर्तव्य क्या हैं, यह वह सिरे से भुल गया।
कृषि सुधार बिल के राज्यसभा में पास होने की प्रक्रिया के दौरान क़रीब एक बजे सदन में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना तक संभव नही। कृषि सुधार बिल को लेकर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बेहद आक्रामक विपक्ष ने सीधे आसंदी पर ही मोर्चा खोल दिया।टीएमसी के डेरिक ओ ब्रायन अचानक आसंदी के सामने पहुँचे और उन्हें आसंदी के सामने रुल बुक फाड़ कर फेंकते हुए देखा गया। इसके ठीक बिलकुल साथ साथ आम आदमी पार्टी के संजय सिंह आसंदी के बिलकुल सामने टेबल पर चढ़कर ताली बजा बजाकर नारे लगाते हुए रिकॉर्ड हुए। सदन के भीतर ही जबकि मार्शल संजय सिंह को हटा रहे थे तब संजय सिंह मार्शलों से सीधे हाथापाई और हूज्जत करते स्पष्ट पहचाने गए।

इस हंगामे में आसंदी के सामने रुल बुक फाड़ी गई, गर्भगृह में विपक्षी सदस्य आ पहुँचे और नारे लगाते रहे, आसंदी के माइक को तोड़ दिया गया।
केंद्र सरकार का किसान सुधार बिल लोकसभा के बाद राज्यसभा में पास करने की प्रक्रिया से गुजर रहा था जबकि यह हंगामा हुआ। इस पूरे मसले को लेकर विपक्षी सत्ता पक्ष एक दूसरे पर आरोप लगा रहा है।

 

विपक्ष इस बिल को किसान विरोधी बताते हुए विरोध कर रहा है।कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य विधेयक, 2020 और कृषक क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020 पारित तो हुआ लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसे पारित कराने में नियमों का पालन नहीं किया गया।टीएमसी के डेरिक ओ ब्रायन ने ट्वीटर पर एक वीडियो पोस्ट कर दावा किया है कि, सदस्यों ने मतदान की माँग की लेकिन इसकी इजाज़त नहीं दी गई।
आप पार्टी के संजय सिंह के विरोध के पीछे भी कारण यही बताया गया कि उप सभापति हरिवंश ने जो प्रकिया प्रभावी की गई , उसका कतई समर्थन नहीं किया जा सकता ।
इसके कुछ घंटों बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत पाँच मंत्रियों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस हुई।इसमें रेल वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पियुष गोयल, केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री मुख़्तार अब्बास नकवी, केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी, केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री धावक चंद्र गहलोत और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय प्रकाश जावडेकर मौजुद थे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन की पूरी घटना पर ये कहा –
“राज्यसभा में जो हुआ वो दुखद था, दुर्भाग्यपूर्ण और अत्यधिक शर्मनाक था. डिप्टी चेयरमैन के साथ दुर्वव्यहार हुआ है. हरिवंश जी की मूल्यों के प्रति विश्वास रखने वाली छवि है. सीधे आसन तक जाना रूल बुक को फाड़ना, अन्य कागजात फाड़ना, आसन पर चढ़ना. संसदीय इतिहास में ऐसी घटना न लोकसभा में हुई न राज्यसभा में.”
इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस के तुरंत बाद कांग्रेस की ओर से पत्रकार वार्ता की सूचना आई। इस पीसी में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने इस बिल को किसानों की पीठ पर छोरा घोंटने वाला बताया, तो वहीं केसी वेणुगोपाल ने बयान दिया –
“मैंने वह प्रेस कॉंफ़्रेंस देखी जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत पाँच मंत्री मौजुद थे,वे सभी उप सभापति के कार्यवाही के रवैये को न्याय संगत बताने की कोशिश कर रहे थे, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।वरिष्ठ मंत्रियों से हमने बेहतर प्रतिक्रिया की उम्मीद की थी, वे भले उप सभापति के ग़लत कार्य व्यवहार की निंदा तो नहीं की लेकिन उन्होंने उप सभापति के कार्य व्यवहार के जिस तरह से बचाव किया है उससे साबित होता है कि आज का पूरा घटनाक्रम देश के किसानों के ख़िलाफ़ षड़यंत्र था जिसे भाजपा नेतृत्व शामिल है, यह षड़यंत्र था कि किसानों की आवाज़ को सदन में दबा दिया जाए”
बहरहाल इस मामले को लेकर पंक्तियो के लिखे जाने तक सदन में हुई घटना को लेकर विपक्ष की ओर से कोई खेद नहीं जताया गया है। उसके उलट उप सभापति हरिवंश पर नीति नियमों की अवहेलना करने का आरोप जरुर जारी है।
विपक्ष के तेवर बेहद तल्ख हैं.. विपक्ष ने बिल के पारित होने के बाद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है ।उपसभापति पर बिल पर चर्चा के दौरान उनकी कार्यवाही से लोकतांत्रिक परंपराओं और प्रक्रियाओं को नुकसान पहुँचाने का आरोप है ।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अहमद पटेल ने बयान दिया –
“राज्यसभा के उप सभापति को लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन इसके बजाय, उनके रवैये ने आज लोकतांत्रिक परंपराओं और प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचाया है.”
जिस मसले पर हंगामा हुआ वह विषय सदन की कार्यवाही का समय बढ़ाने का था,कार्यवाही 1 बजे तक ही होनी थी जिसे उपसभापति ने विधेयक पारित होने तक के लिए बढ़ा दिया. इसी के ठीक बाद विपक्ष के सांसदों ने हंगामा शुरु हो गया।
लोकतंत्र में विरोध अधिकार भी है और कर्तव्य भी,पर वह कैसे हो किस तरह से हो..उसकी भी मर्यादा है।
जो विरोध के नाम पर हुआ जो देश में देखा उसे अगर विपक्ष ने सही नही ठहराया है तो निंदा भी नही की है। याद रखना चाहिए देश किसी सत्ता किसी विपक्ष से बड़ा है और देश इस घटनाक्रम को शायद ही भूले।
व्यवस्था की अवमानना में कौन कौन शामिल था यह विषय केवल आरोप प्रत्यारोप तक थमना भी नहीं चाहिए।विपक्ष ने क्रिया की अथवा क्रिया पर प्रतिक्रिया की।और यदि प्रतिक्रिया भी दी तो यह तरीक़ा क्या सही था, समग्रता के साथ कुछ ऐसा ठोस होना चाहिए कि दोष जिसका भी हो, उसे दंड दिया जा सके, दोहराव ना हो।

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