हाई कोर्ट बोला: गुजारा भत्ता तय करते समय पत्नी की पेशेवर क्षमता को नजर अंदाज नहीं कर सकते, फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन...
High Court News: भारतीय सेना में कार्यरत एक फौजी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, गुजारा भत्ता का निर्धारण करते वक्त पत्नी की काबिलियत और कमाने की क्षमता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।

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प्रयागराज।1 अप्रैल 2026| भारतीय सेना में कार्यरत एक फौजी की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, गुजारा भत्ता का निर्धारण करते वक्त पत्नी की काबिलियत और कमाने की क्षमता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। चूंकि याचिकाकर्ता की पत्नी काबिल रेडियोलॉजिस्ट है और उसमें अच्छी जगह नौकरी करने की क्षमता है, लिहाजा फैमिली कोर्ट के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए गुजारा भत्ता की राशि में कोर्ट ने कटौती कर दी है। पत्नी को अब हर महीने याचिकाकर्ता फौजी 18 हजार की जगह 12 हजार रुपये देगा।
पढ़िए क्या है मामला
फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए भारतीय सेना में सूबेदार के पद पर पदस्थ फौजी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मैनपुरी की फैमिली कोर्ट के फरवरी 2025 में दायर भरण पोषण की अर्जी पर सुनवाई करते हुए पत्नी को उसके आवेदन दायर करने की तिथि से 12,000 रुपये प्रति माह और आदेश की तिथि से बढ़ी हुई रकम 18,000 रुपये प्रति महीने बतौर गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष पैरवी करते हुए बताया,याचिकाकर्ता की पत्नी उच्च-योग्य रेडियोलॉजिस्ट है और उसने खुद माना कि 2014 से 2020 तक एक जाने-माने अस्पताल में काम किया था, जिसके बाद उसने अपनी मर्ज़ी से नौकरी छोड़ दी थी। आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बाद भी उससे रूपये ऐंठने के लिए गुजारा भत्ता के लिए आवेदन पेश किया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, पति का घर भी उसने अपनी मर्जी से छोड़ा था। समझाने के बाद भी उसने पति के साथ रहने से इंकार कर दिया था। याचिकाकर्ता की पत्नी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कहा, याचिककर्ता प्रति महीने 70 हजार रुपये वेतन पाते हैं, अधिवक्ता ने यह भी कहा, पत्नी का नौकरी करना या योग्य होना ही भरण पोषण नहीं देने का आधार नहीं हो सकता। रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के अध्ययन से कोर्ट ने पाया, याचिकाकर्ता की पत्नी, योग्य रेडियोलॉजिस्ट है, जिसने अपनी मर्ज़ी से नौकरी छोड़ने से पहले लगभग 6 साल तक बड़े अस्पताल में काम किया था।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में ये कहा
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, यह बात पूरी तरह से स्थापित है, CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण देने का मुख्य उद्देश्य यह तय करना है, पत्न गरिमापूर्ण जीवन जी सके और उसका जीवन-स्तर भी लगभग वैसा ही बना रहे, जैसा कि वैवाहिक घर में रहते समय था। कोर्ट ने कहा, दावेदार की पेशेवर काबिलियत और कमाई की क्षमता होने के बावजूद, गुज़ारा भत्ता नहीं दिया जा सकता। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा जारी आदेश में संशोधन करते हुए 12 हजार रुपये प्रति महीने गुजारा भत्ता देने का आदेश याचिकाकर्ता पति को दिया है।
