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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 'बहू पर सास-ससुर को पालने की जिम्मेदारी नहीं', जानिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

Allahabad High Court Judgment: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि CrPC की धारा 125 के तहत सास-ससुर के भरण-पोषण (Maintenance) के लिए बहू कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं है। पढ़ें पूरी खबर।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बहू पर सास-ससुर को पालने की जिम्मेदारी नहीं, जानिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?
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By Ragib Asim

प्रयागराज 30 मार्च 2026। इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने पारिवारिक विवाद और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि कोई भी बहू अपने सास-ससुर को गुजारा भत्ता देने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य (Legally Obligated) नहीं है।

हाई कोर्ट ने सास-ससुर की ओर से दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज करते हुए कहा कि 'नैतिक जिम्मेदारी' (Moral Duty) और 'कानूनी जिम्मेदारी' (Legal Duty) में फर्क होता है। बिना किसी क्लियर कानूनी आधार के नैतिकता को कानून की तरह लागू नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला यूपी के आगरा का है। एक बुजुर्ग दंपति ने अपने बेटे प्रवेश की शादी अप्रैल 2016 में की थी। मार्च 2021 में उनके बेटे का निधन हो गया। उनकी बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल (UP Police Constable) के पद पर तैनात है।

बुजुर्ग सास-ससुर ने आगरा की फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी बहू से मेंटेनेंस की मांग की थी। उनका तर्क था कि वे बुजुर्ग, अनपढ़ और गरीब हैं। बहू के पास अपनी अच्छी इनकम है और उसे पति (मृतक बेटे) के सर्विस बेनिफिट्स भी मिले हैं। इसलिए यह बहू की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह उनका ख्याल रखे। अगस्त 2025 में फैमिली कोर्ट ने उनकी यह याचिका खारिज कर दी थी जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

धारा 125 में सास-ससुर शामिल नहीं: जस्टिस मदन पाल सिंह

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार पूरी तरह से एक कानूनी प्रक्रिया है। यह सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125 (अब नए कानून बीएनएसएस की धारा 144) के तहत तय होता है।

जस्टिस सिंह ने कहा कि विधायिका (Legislature) ने जानबूझकर सास-ससुर को इस प्रावधान के दायरे में नहीं रखा है। इसका मतलब है कि कानून बनाने वालों की यह मंशा नहीं है कि बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण का कानूनी बोझ डाला जाए।

अनुकंपा नौकरी का नहीं मिला सबूत

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि बहू को पुलिस की नौकरी अनुकंपा (Compassionate Grounds) के आधार पर मिली थी। इसके अलावा मृतक बेटे की संपत्ति के अधिकार या उत्तराधिकार के मुद्दे मेंटेनेंस केस के दायरे से बाहर की चीज हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि बहू को बिना किसी कानूनी प्रावधान के सास-ससुर को पैसे देने के लिए फोर्स नहीं किया जा सकता।

Ragib Asim

Ragib Asim is a seasoned News Editor at NPG News with 15+ years of excellence in print, TV, and digital journalism. A specialist in Bureaucracy, Politics, and Governance, he bridges the gap between traditional reporting and modern SEO strategy (8+ years of expertise). An alumnus of Jamia Millia Islamia and Delhi University, Ragib is known for his deep analytical coverage of Chhattisgarh’s MP administrative landscape and policy shifts. Contact: [email protected]

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