पत्नी की बेवफाई का WhatsApp सबूत अब कोर्ट में होगा मान्य, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
Allahabad High Court : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पति अपनी पत्नी पर अडल्टरी के आरोप साबित करने के लिए वॉट्सऐप चैट को सबूत के तौर पर पेश कर सकता है. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने तकनीकी कारणों से इन चैट्स को स्वीकार करने से मना कर दिया था. अब फैमिली कोर्ट में इन डिजिटल सबूतों के आधार पर गुजारा भत्ता मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी.

पत्नी की बेवफाई का WhatsApp सबूत अब कोर्ट में होगा मान्य, इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
Allahabad High Court Decision on WhatsApp Chat : प्रयागराज : फैमिली कोर्ट में चल रहे गुजारा भत्ता के मुकदमों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पति अपनी पत्नी पर एडल्टरी का आरोप लगाता है, तो वह सबूत के तौर पर वॉट्सऐप चैट पेश कर सकता है. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस पुराने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें इन चैट्स को सबूत मानने से इनकार कर दिया गया था.
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक ट्रायल कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को हर महीने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता दे. पति ने इस फैसले का विरोध करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी किसी दूसरे शख्स के साथ प्रेम संबंध में है और अडल्टरी में रह रही है. कानून के मुताबिक अगर पत्नी एडल्टरी में है, तो वह पति से मेंटेनेंस पाने की हकदार नहीं होती. अपने दावे को सच साबित करने के लिए पति ने पत्नी और उस दूसरे शख्स के बीच हुई अश्लील वॉट्सऐप चैट कोर्ट में पेश करनी चाही, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने इसे तकनीकी कारणों से ठुकरा दिया था.
ट्रायल कोर्ट ने क्यों किया था इनकार
निचली अदालत का कहना था कि पति ने इन इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65B के तहत जरूरी सर्टिफिकेट जमा नहीं किया है. बिना इस सर्टिफिकेट के डिजिटल सबूतों को कानूनी तौर पर मान्य नहीं माना जाता. इसी आधार पर कोर्ट ने पति की दलीलों को अनसुना कर दिया था.
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी
जब यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँचा, तो जस्टिस मदन पाल सिंह ने ट्रायल कोर्ट के नजरिए को गलत ठहराया. हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा-14 अदालतों को विशेष शक्ति देती है. इसके तहत, अगर कोई सबूत किसी विवाद को सुलझाने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है, तो कोर्ट उसे स्वीकार कर सकता है, भले ही वह इंडियन एविडेंस एक्ट के कड़े पैमानों पर फिट बैठता हो या नहीं.
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि बिना सबूतों की जांच किए उन्हें सीधे खारिज कर देना न्यायसंगत नहीं है. हाई कोर्ट ने अब इस मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया है और निर्देश दिया है कि पत्नी पर लगे एडल्टरी के आरोपों और उन वॉट्सऐप चैट्स पर नए सिरे से विचार किया जाए. कोर्ट ने साफ किया कि अब दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी और इन डिजिटल सबूतों के आधार पर ही तय होगा कि पत्नी मेंटेनेंस की हकदार है या नहीं.
क्या होती हैं एडल्टरी
सरल भाषा में कहें तो एडल्टरी का अर्थ है किसी शादीशुदा व्यक्ति का अपने जीवनसाथी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपसी रिश्ते में रहना और सहमति से शारीरिक संबंध बनाना. इसे हिंदी में व्यभिचार भी कहा जाता है. हालांकि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अब इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है, यानी इसके लिए अब जेल नहीं होती, लेकिन यह आज भी तलाक लेने का एक ठोस कानूनी आधार है. साथ ही, अगर कोई पत्नी अडल्टरी में रह रही है, तो कानूनन वह अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं रह जाती है.
