
दंतेवाड़ा जिले की ‘देवगुड़ी’ स्थल को विश्व पटल पर मिली अलग पहचान
रायपुर 31 जुलाई 2021. आस्था से समृद्धि की कड़ी जोड़कर आदिवासी क्षेत्र के उत्थान की अनूठी पहल दंतेवाड़ा में शुरू हुई है। आदिवासियों के आस्था स्थल देवगुड़ी को संवारकर ना सिर्फ उन्हें परंपरा से जोड़कर रखा गया है, बल्कि इस योजना के जरिये आदिवासियों को स्वच्छता, स्वास्थ्य और विकास के क्षेत्र में भी आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। यूं तो दंतेवाड़ा पहले ही मां दंतेश्वरी की वजह से अध्यात्म और पर्यटन का बड़ा केंद्र बना हुआ है। सांस्कृतिक धरोहर सरंक्षण और संवर्धन से सामूहिक विकास की नई पहल
जिला दंतेवाड़ा में आस्था का केन्द्र मां दन्तेश्वरी शक्ति पीठ है। जहां आसपास के जिलों समेत अन्य राज्यों से भी सैलानी आकर मां दन्तेश्वरी के दर्शन करते है। सैलानी दंतेवाड़ा के पर्यटन स्थल के भ्रमण के दौरान मां दन्तेश्वरी मंदिर, भैरव बाबा मंदिर, ढोलकल, बारसूर के बत्तीसा मंदिर मामा भांजा मंदिर, गणेश मंदिर की दर्शन करने के साथ-साथ मुचनार एवं सातधार के आलोकिक दृष्यों का लुफ्त उठाते है। जिससे वे अंचल की खूबसूरती को और करीब से महसूस करते है। लेकिन अब जिस तरह से सरकार ने आदिवासियों की परंपरागत देवगुड़ी को आधुनिक स्थल के रूप में बदला है, उसने सैलानियों को देवगुड़ी की तरफ से आकर्षित किया है। जिला प्रशासन इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 143 ग्राम पंचायतों में ‘देवगुड़ी स्थल कायाकल्प’ कर उसे पर्यटन केन्द्र के रूप स्थापित करने एवं यहां की अमूल्य संस्कृति एवं धरोहर को संजोने का कार्य कर रहा है। जिससे दन्तेवाड़ा जिले के विभिन्न संस्कृति, सभ्यता, खानपान, रहन-सहन, आभूषण एवं बोली-भाषा से यहां आने वाले सैलानी परिचित हो सकेंगे। साथ ही उन्हें पहली बार एक ऐसा स्थान मिलेगा जहां आदिवासी अंचल की सभ्यता एवं संस्कृति जानने-पहचानने के साथ करीब से महसूस कर सकेंगे। सैलानियों के माध्यम से इसका प्रचार-प्रसार स्वतः होगा, एवं इसे विश्व पटल पर अलग पहचान मिलेगी, जिससे आदिवासी संस्कृति और समृद्ध होगी।
क्या है देवगुड़ी
देवगुड़ी में गांव वालों की आस्था बसती है। गांव में कोई भी त्यौहार विना देवगुड़ी के पूजा अर्चना किये बिना सम्पन्न नहीं होता है। दंतेवाड़ा जिला विभिन्न आदिवासी संस्कृतियों को संजोये हुए है, यहां हर गांव में परंपरा अनुसार एक आस्था स्थल है। उस स्थान को ही वनवासी पारंपरिक भाषा में देवगुड़ी कहते हैं। देवगुड़ी में गांववालों की आस्था बसती है, गांव में कोई भी त्योहार बिना देवगुड़ी के सम्पन्न नहीं होता है। गांवों में आस्था के प्रतीक स्वरूप इसी देवगुड़ी का संरक्षण एवं कायाकल्प करने का बीड़ा जिला प्रशासन ने उठाया है। देवगुड़ी कायाकल्प योजना के लिए जिले की सभी 143 पंचायतों में प्रति पंचायत एक देवगुड़ी हेतु 1073.93 लाख रूपए की स्वीकृति प्रदान की गई है।
जिसमें मुख्यतः देवगुड़ी का जीर्णोद्वार कार्य, देवगुड़ी परिसर में फलदार, छायादार, वृक्षारोपण कार्य, श्रदालुओं हेतु पेय जल व्यवस्था देवगुड़ी हेतु शेड निर्माण कार्य जिसमें ग्रामीण आराम से बैठकर अनुष्ठान एवं पूजा अर्चना कर सकें। नियत स्थान पर प्रसाधन हेतु शौचालय निर्माण कार्य एवं देवगुड़ी परिसर को चैयन लिंक तार फैंसिंग कार्य कराया गया है। देवगुड़ी कायाकल्प कार्य निर्माण कार्य ही नहीं, बल्कि ये ग्रामवासियों के सामाजिक, व्यवहारिक जीवन शैली में भी अप्रितम परिर्वतन लायेगा।

देवगुड़ी को हम सहेज और संवार रहे: दीपक सोनी
जिला प्रशासन दंतेवाड़ा और कलेक्टर दीपक सोनी दक्षिण बस्तर के वास्तविक स्वरूप में छेड़छाड़ न कर उसे सहेजने एवं संवारने में भरोसा रखते हैं। दीपक सोनी ने बताया कि देवगुड़ी और यहां के गांव अपने आप में बहुत ज्यादा समृद्ध हैं। और हम उन्हें संरक्षण देने का काम कर रहे हैं, ताकि सभी लोग इसे देख सकें। उन्होंने गामावाड़ा ग्राम के देवगुड़ी में पूजा अर्चना कर दंतेवाड़ा की जनता के लिए सुख और समृद्धि की कामना की। अब ये देवगुड़ी बहुत ही सुंदर लग रहा है। मां दंतेश्वरी और अन्य चित्र यहां स्थित पत्थरों में उकेरे गए हैं, जिसे लोग देखना जरूर पसंद करेंगे।
नंबर देकर पंचायतों को करेंगे प्रोत्साहित
देवगुड़ी कायाकल्प कार्य पूर्ण होने के उपरांत सभी ग्रामवासी किरिया यानी कसम लेंगे कि उनके ग्राम पंचायत में कुपोषण मुक्त, मलेरिया मुक्त, सौ प्रतिशत स्कूल बच्चों का नामांकन, सौ प्रातिशत गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव, एनीमिया मुक्त पंचायत, संपूर्ण स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण जैसे सात बिन्दुओं प्रदर्शन के आधार पर श्रेणी तैयार किया जाता है। श्रेणी में प्रथम स्थान 100-91 अंक के बीच हरा रंग, द्वितीय स्थान में 90-75 अंक के बीच पीला रंग और तीसरे स्थान पर 75 अंक से नीचे प्रदर्शन रहने पर सफेद रंग से चिन्हांकित किया जाएगा। इन सूचकांकों में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पंचायतों में अन्य विकास कार्यों में प्राथमिकता दी जाएगी। जिससे कम श्रेणी प्राप्त करने वाले पंचायत भी उक्त सूचकांकों में अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे। इस प्रकार ग्राम पंचायतों में ही आपस में स्वस्थ प्रतिद्वन्द स्थापित होगा। जिससे इन सूचकांको में हमारा जिला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेगा। इस प्रकार हमारा जिला स्वच्छ, स्वस्थ समृद्धशाली बन सकेगा।

आदिवासी समाज में पेड़ों का धार्मिक
और सांस्कृतिक महत्व
गांवों में आदिवासियों की परंपराएं और संस्कृति जंगल और पेड़ों की छांव में अपनी खूबसूरती के साथ जिंदा है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के धुरली गांव के निवासी जोगा राम आदिवासी समाज में गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखने वाले पवित्र पेड़ों के बारे में बात करते हुए गंभीर लगते हैं। छत्तीसगढ़ के पवित्र उपवनों को देवगुडी के नाम से जाना जाता है, जो बहुत पहले का है, जब गांव पहली बार आए और समुदाय बस गए। देवगुड़ी या उपवन हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित किए गए थे। हम साल में केवल तीन बार उनके पास जाते हैं, लेकिन मंगलवार को मातागुड़ी गांव में पूजा करते हैं, जो देवी के लिए एक धार्मिक मंदिर है। जोगाराम बताते हैं कि अधिकांश गांवों में देवगुड़ी के साथ-साथ मातागुड़ी भी हैं और ये स्थान पेड़ों से लदे हैं। महुआ के पेड़ को छत्तीसगढ़ में पवित्र माना जाता है जबकि साल झारखंड में एक पवित्र प्रजाति है। ऐसी कई महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजातियां पवित्र उपवनों में पाई जाती हैं। बालूद गांव निवासी जय नारायण बस्तरिया बताते हैं कि कुछ परिवारों या समुदायों की अपनी देवगुडियां हैं। समस्त गांव में दीवाली के बाद दियारी नामक एक दिवसीय उत्सव मनाया जाता है। जिसमें ग्रामीण खेत से लाए गए नए धान की पूजा करते हैं और फिर उसे घर ले जाते हैं। इन उपवनों के आसपास की ऐसी परंपराओं और प्रथाओं को संरक्षित किया जा रहा है।
