सियासत के वे धुर विरोधी.. जो कभी साथ ना रहे.. लेकिन विचित्र संयोग आख़िरी चुनाव दोनों अस्पताल से लड़े और जीते..

रायपुर,3 जुलाई 2020। ये बात है सन् 1977 की, दो शख़्सियतों ने चुनाव लड़ा, और दोनों ही जीते..बस इसमें कुछ संयोग हैं बल्कि संयोगों की श्रृंखला है। दोनों एक दल में थे..दोनों का यह आख़िरी चुनाव साबित हुआ.. दोनों ने ही अस्पताल से नामांकन भरा.. दोनों ही प्रचार में नहीं जा पाए.. दोनों ही चुनाव जीत गए.. और इसके साथ यह भी संयोग है कि, दोनों एक दल में होते हुए सियासत के बिलकुल अलग अलग मुहानों पर मौजुद थे। यह क़िस्सा है अकलतरा के विधायक रहे राजेंद्र सिंह और चाँपा से विधायक रहे बिसाहूदास महंत का।

ये वो दौर था जबकि सन 52 से विधायक रहे बिसाहूदास महंत एक शक्ति स्तंभ थे, और सामने थे तब दूसरे सिरे पर मौजुद श्यामाचरण शुक्ल। जिन राजेंद्र सिंह का यहाँ ज़िक्र हो रहा है, उनकी गिनती श्यामाचरण शुक्ल के नज़दीकियों में होती थी। राजेंद्र सिंह हालाँकि केवल दो बार विधायक रहे लेकिन सियासती तानाबाना ऐसा था कि, वे महंत से दूर और शुक्ल बंधुओं के क़रीब ज्यादा रहे।

बहुत कोशिशों के बावजूद भी ऐसी कोई तस्वीर नहीं मिल पाती जहां राजेंद्र सिंह और बिसाहूदास महंत साथ हों, हो सकता है कि यह तस्वीर कहीं किसी के पास मौजुद हो..पर लंबी तलाश के बावजूद ऐसी कोई तस्वीर मिली नही। पर यदि ऐसी कोई तस्वीर होगी तो बिलाशक वह नायाब तस्वीर मानी जाएगी।

तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल और तब केंद्रीय राजनीति में संजय गांधी टीम के ख़ास प्लेयर विद्याचरण शुक्ल के साथ राजेंद्र सिंह की नज़दीकियों को जताती तस्वीरें जरुर हैं।
इन कई तस्वीरों में एक तस्वीर उस सिमेंट प्लांट के भूमिपूजन की भी हैं जिसमें श्यामाचरण शुक्ल हैं और तमाम नेताओं के साथ तत्कालीन विधायक राजेंद्र सिंह भी मौजुद हैं, लेकिन बिसाहूदास महंत मौजुद नहीं है।जबकि बिसाहूदास महंत क्षेत्र में ही था, लेकिन वे इस कार्यक्रम में नहीं गए।बताते हैं कि उनका उद्योग से विरोध नहीं था लेकिन जगह को लेकर उनकी गहरी असहमति थी।

शुक्ल बंधुओं के लिए सदैव चुनौती रहे बिसाहूदास महंत के सामने अकलतरा में राजेंद्र सिंह मनपसंद रहे, सक्रिय राजनीति में वे लंबा वक्त नहीं दे पाए। शुक्ल बंधुओं की उम्मीद बड़ी मज़बूत थी कि, वे सियासती शत्रु बिसाहूदास महंत के लिए उनके घर में ही उन्हें घेर ले जाएँगे, लेकिन कैंसर ने उन्हें असमय छीन लिया और बहुत संभव था कि यदि वे होते तो सियासत के कई पन्ने और जुड़ते, राजनीति और उनका क्षेत्र दोनों ही और समृद्ध होते।किस्सा है जिसकी पुष्टि नहीं हो पाती, ये दो ध्रुव के बीच मसला कुछ ऐसा था कि अगर संवादहीनता नहीं थी तो संवाद की भी जगह कम ही थी।कभी कोई ऐसा काम पड़ जाए जो बिसाहूदास महंत के विभाग से जुड़ा हो तो राजेंद्र सिंह भले काम ना हो पर वह बिसाहूदास महंत के पास आवेदन नहीं भेजते थे।

बल्कि वे कई बार व्यक्ति से ही पता करते थे कि, उसका ऐसा कौन परिचित हैं जो महंतजी का करीबी हो और फिर उसे सलाह दे देते थे कि, उससे कहलवा दो काम हो जाएगा। यह भी है कि बिसाहूदास ऐसे संदेशों का मूल केंद्र जान जाते थे और वाजिब होने पर मुस्कुराकर काम कर भी देते थे।

ना सही तुझसे नफ़रत तो मोहब्बत भी नही वाले अंदाज़ के साथ सियासत में मौजुद इन दो शख़्सियतों के साथ लेकिन संयोगों का दिलचस्प क्रम देखिए.. आख़िरी चुनाव दोनों ने अस्पताल से लड़ा। बिसाहूदास महंत बिलासपुर अस्पताल में भर्ती थे जबकि राजेंद्र सिंह मुंबई में। दोनों के नामांकन अस्पताल से ही भरे गए, दोनों ही प्रचार करने नहीं निकल पाए और दोनों ही जीत भी गए। बीमारी से जूझते हुए 30 जुलाई 1979 को राजेंद्र सिंह का निधन हुआ, जबकि बिसाहू दास महंत 23 जुलाई 78 को प्राण छोड़ गए।

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