ये IPS, कभी चलाया करता था टैंपो, 12वीं में हो चुका है फेल… गर्लफ्रेंड से कहा- हां कर दो, दुनिया पलट दूंगा….जानें इस आईपीएस की सफल होने की कहानी

भोपाल 20 अक्टूबर 2019.  महाराष्ट्र कैडर से IPS मनोज शर्मा की कहानी इस देश के हर युवा के लिए मिसाल है. बीते माह उनके ऊपर उनके ही साथी अनुराग पाठक ने एक किताब लिखी है. ‘12th फेल, हारा वही जो लड़ा नहीं’ शीर्षक से लिखी इस किताब में मनोज शर्मा की जिंदगी का हर वो संघर्ष दर्ज है जो एक आम इंसान को तोड़ देता है. लेकिन मनोज शर्मा ने अपनी गर्लफ्रेंड के एक वादे पर ऐसा यू टर्न लिया कि आईपीएस बन गए.

बता दें कि मनोज शर्मा 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर से आईपीएस हैं. वो फिलहाल मुंबई में एडिशनल कमिश्रनर ऑफ वेस्ट रीजन के पद पर तैनात हैं. उनकी बचपन की कहानी बेहद संघर्ष भरी है. उनका जन्म मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में हुआ था. पढ़ाई के दौरान ही वो नौवीं, दसवीं और 11वीं में थर्ड डिवीजन में पास हुए थे. बताते हैं कि वो भी 11वीं तक नकल करके पास किया. फिर 12वीं में भी इसलिए फेल हो गए क्योंकि नकल नहीं हो सकी.

  • मनोज शर्मा का जन्म मुरैना, मध्यप्रदेश में हुआ था। नौवीं, दसवीं, और ग्यारहवीं में तीसरे स्थान पर रहे। उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने नकल का सहारा लिया।
  • लेकिन 12वीं परीक्षा में नकल करना मुश्किल था इसलिए वे फेल हो गए।

शुरुआती पढ़ाई
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जन्मे मनोज 12वीं तक पढ़ाई में मामूली छात्र रहे. वे नौवीं, दसवीं और 11वीं में थर्ड डिवीजन से पास हुए. 12वीं में नकल नहीं कर पाए तो फेल हो गए थे. एक वीडियो इंटरव्यू के जरिए उन्होंने बताया, उनका प्लान 12वीं में जैसे-तैसे पास होकर, टाइपिंग सीखकर कहीं न कहीं जॉब ढूंढने का था. उन्होंने 12वीं की परीक्षा में नकल करने का भी पूरा प्लान बना रखा था. लेकिन एसडीएम ने स्कूल में सख्ती की और नकल नहीं होने दी. तब मनोज को लगा ऐसा पॉवरफुल आदमी कौन है जिसकी बात सब मान रहे हैं. उन्हें भी ऐसा ही बनना है.

वो आगे बताते हैं कि 12वीं में फेल होने के बाद रोजी रोटी के लिए मैं और मेरे भाई टेंपो चलाते थे. वहां एक दिन हमारा टेंपो पकड़ गया तो मैंने सोचा कि एसडीएम से कहकर छुड़ा सकते हैं. मैं उनसे गया तो  टेंपो छुड़वाने की बात करने था लेकिन ये कह ही नहीं पाया. बस उनसे सिर्फ ये ही पूछा कि आपने कैसे तैयारी की. मैंने उनसे ये भी नहीं कहा कि 12वीं में फेल हो गया हूं. मन में तय कर लिया कि अब यही करूंगा.

बस, कुछ ही दिन में अपने घर से थैला लेकर ग्वालियर आ गया. यहां पैसे और खर्च न होने के कारण मैं मंदिर के भिखारियों के पास सोता था. फिर ऐसा वक्त भी आया जब मेरे पास खाने तक को नहीं होता था. लेकिन किस्मत थी कि यहां लाइब्रेरियन कम चपरासी का काम मिल गया. मैं जब कवियों या विद्वानों की सभाएं होती थीं तो उनके लिए बिस्तर बिछाना और पानी पिलाने का काम करता था.

लाइब्रेरी में गोर्की और अब्राहम लिंकन को पढ़कर लगता था कि हम इनकी तरह क्यों नहीं बन सकते. यहां मैंने मुक्तिबोध जैसे कवि के बारे में जाना. फिर मैंने तैयारी करनी शुरू की. सोचा था कि एसडीएम ही बनना है. लेकिन धीरे धीरे तैयारी उच्च लेवल पर जाने लगी. वो कहते हैं कि लेकिन 12वीं फेल का ठप्पा मेरा पीछे नहीं छोड़ता था. यहां तक कि जिस लड़की से प्यार करता था, उससे भी दिल की बात नहीं कह पाता था क्योंकि लगता था कि कहीं वो कह न दे कि 12वीं फेल हो. इसलिए पढ़ाई शुरू कर दी.

बिना फीस एडमिशन, लड़की का साथ

12वीं फेल का ठप्पा पीछा नहीं छोड़ता था. जिस लड़की से प्यार किया, उससे भी दिल की बात न कह सके. डर था वो ये कह न दे 12वीं फेल हो. इसलिए फिर से पढ़ाई शुरू की. संघर्ष कर दिल्ली आए. पैसों की जरूरत थी. बड़े घरों में कुत्ते टहलाने का काम मिला. 400 रुपये प्रति कुत्ता खर्च मिलता था.

विकास दिव्यकीर्ति नाम के शिक्षक ने बिना फीस एडमिशन दिया. पहले अटेंप्ट में प्री क्लीयर किया. लेकिन दूसरे, तीसरे अटेंप्ट तक प्यार में था. जिस लड़की से प्यार करता था उससे कहा कि तुम हां करो, साथ दो तो दुनिया पलट सकता हूं. फिर चौथे अटेम्प्ट में  यूपीएससी की परीक्षा 121वीं रैंक के साथ पास कर आईपीएस बना. बता दें कि मनोज ग्वालियर से पोस्ट-ग्रैजुएशन करने के बाद पीएचडी भी पूरी कर चुके हैं.

 

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