लॉकडाउन में शहरों के वायु, पानी और ध्वनि प्रदूषण में भारी गिरावट, हर साल 15 दिन की संपूर्ण छुट्टी की ठोस योजना बनाई जाए

अतुल सिंघल

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को आदेश दिया है कि लॉक-डॉउन के दौरान यमुना नदी के पानी के साफ होने पर रिपोर्ट पेश करे। दरअसल सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरें वायरल हो रही हैं कि लॉक-डॉउन की अवधि के दौरान यमुना का पानी बिलकुल साफ नजर आ रहा है। माना रहा है कि लॉक-डॉउन की वजह से दिल्ली एनसीआर में यमुना के किनारे बने शहरों के कल-कारखानों के बाद होने से उनका कचरा और गंदा पानी यमुना में नहीं जा रहा लिहाजा यमुना का जल साफ दिखाई दे रहा है।
दरअसल, लॉक-डॉउन के सहारे प्रकृति ने सारी दुनिया को एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। अगर इस संदेश को समझे तो पाएंगे कि दुनिया के अधिकांश शहरों में सांस तोड़ती हवा साफ हुई है। हर समय धुएं से काला रहने वाला दिल्ली जैसे महानगरों का आसमान नीला दिखाई देने लगा है और रात को तारे चमकने लगे हैं।

चार दशक के बाद जालंधर से हिमालय की बर्फीली चोटियों के दृश्य ने रोमांचित कर दिया। दिल्ली में हर रोज 11 लाख गाड़ियां दूसरे शहरों से आती है जो लॉक-डॉउन के बाद राजधानी में नहीं घुस पाईं। लिहाजा दिल्ली की दमघोटूं हवा साफ नजर आने लगी। यहां तक की राजधानी के प्रमुख चौराहों पर भी वायु प्रदूषण नाम की कोई चीज नहीं बची। जबकि शहरों की सड़कों पर जंगली जानवर नजर आने लगे।

दिल्ली से सटे नोएडा के सबसे व्यस्त समझे जाने वाले मॉल जीआईपी के सामने नील गायेंं और हिरण घूमते देखे गए। ओखला पक्षी विहार में पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगा और एनसीआर के शहरों के पॉर्कों से गायब तोते और दूसरी चिड़ियों की आमद शुरू हो गई। हरिद्वार से आए एक वीडियो में बताया गया कि राजाजी नेशनल पार्क से आया हाथी हर की पौड़ी के नजदीक गंगा में स्नान कर रहा है। गंगा भी बिल्कुल निर्मल हो गई हैं।

दक्षिण के किसी समुद्री तट पर एक हिरन अटखेलियां करता नजर आया। लॉक डाउन के कारण मृत्यु दर में भी खासी कमी आई है। राजधानी के सबसे बड़े, व्यस्त और व्यवस्थित समझे जाने वाले अंतिम संस्कार स्थल निगम बोध घाट पर भी इन दिनों आम दिनों से 25 फीसदी कम शव ही अंतिम संस्कार के लिए पहुंच रहे हैं।

लोधी रोड, पंजाबी बाग स्थित शमशान घाटों पर भी अंतिम संस्कार के लिए आने वाले शवों में भी 25 से 50 प्रतिशत तक की कमी आई है। अगर इसका सही से विश्लेषण करें तो पाएंगे कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण होने वाली मृत्यु समाप्त प्रायः हो गईं। प्रदूषण के चलते सांस के मरीजों को दिल्ली में नया जीवन मिला है और तनाव कम होने से हृदयाघात भी घटे हैं। यही नही अपराधों में भी बेतहाशा कमी आई है।

लोग एकाकी से संयुक्त परिवार की तरफ लौटेंगे। परिवार के साथ क्वालिटी समय बिताना एक अनूठा अनुभव साबित हुआ है। स्लम बन चुके महानगरों से प्रवासी लोगों का अपने गांवों की तरफ लौटना भी एक दृष्टि से सही ही है। इस बहाने लोग प्रकृति की तरफ लौटेंगे। बुजुर्गों ने ठीक कहा है कि हिंदुस्तान की आत्मा यहां के गांवों में बसती है। लेकिन अंधाधुंध पैसा कमाने और आधुनिकता की दौड़ ने पिछले कुछ दशकों में गांवों और शहरों के बीच एक असंतुलन बना दिया है।

प्रकृति के लिए यह बहुत अच्छा संकेत है। लॉक-डॉउन के चलते देश के महानगरों में वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण में भारी गिरावट आई है। बेशक यह क्षण कुछ ही दिनों के लिए है। लेकिन पर्यावरणविद इसे प्रकृति के संरक्षण के लिए एक अच्छी पहल मान रहे हैं।

दरअसल, कोरोना जैसे वायरस का आक्रमण भी प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से हुआ है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में आज पूरी दुनिया ने प्रकृति का बेशुमार दोहन किया है। पर्यावरण के जानकार कह रहे हैं कि चीन में जंगली जानवरों को इंसान ने अपना ग्रास बनाना शुरू कर दिया है। जिसका परिणाम सारा विश्व भोग रहा है। भौतिकतावादियों का तर्क है कि किसी बीमारी या महामारी की वजह से सारी दुनिया को घरों में कैद नहीं किया जा सकता। हालांकि अभी तक कोरोना के इलाज का जवाब यह भौतिकतावादी नहीं खोज पाए।

दूसरी तरफ दुनियाभर के पर्यावरणविद और प्रकृति प्रेमियों का कहना है कि जिस तरह से लॉक-डॉउन के बाद सारी दुनिया में सकारात्मक प्रभाव देखे गए। उससे यह अनुभव सामने आया कि ठोस नीति बनाकर स्वेच्छा से अलग-अलग शहरों में साल में एक बार लॉक-डॉउन करके प्रकृति के संतुलन को साधा जा सकता है।

इसे इस तरीके से समझा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति में व्रत रखने का महत्व है। वैज्ञानिक दृष्टि से व्रत के दौरान हमारा शरीर स्वयं का शोधन करता है। जिससे शरीर की कई बीमारियां स्वतः ठीक हो जाती हैं। इसी प्रकार साल में 15 दिनों के लिए लॉक डाउन करके प्रकृति को अपनी पुरानी रंगत में लौटने का अवसर मिल जाएगा।

आज हाथ मिलाने की जगह हाथ जोड़कर प्रणाम करने, शाकाहार अपनाने, मृत व्यक्तियों का दाह संस्कार करने जैसी भारतीय सनातन पंरपरा की तारीफ अमेरिका, स्पेन, इटली, जापान, कोरिया और जर्मनी के लोग भी कर रहे हैं और इसे अपनाने की वकालत भी रहे है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं असम के राज्यपाल के मीडिया सलाहकार हैं, यह उनका निजी विचार हैं)

 

 

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